आधी आबादी के संघर्ष की दास्तान : नीलिमा टिक्कू के “फ़ैसले” पर चर्चा

० आशा पटेल ० 
जयपुर । स्पंदन महिला साहित्यिक एवं शैक्षणिक संस्थान और राजस्थान प्रौढ शिक्षण संस्थान के तत्वावधान में नीलिमा टिक्कू के उपन्यास “फ़ैसले” पर चर्चा आयोजित की गई। चर्चा में प्रो. लाड कुमारी जैन, नन्द भारद्वाज, डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल,डॉ. सुषमा सिंघवी, डॉ. विद्या जैन, डॉ. रेखा गुप्ता और प्रो. प्रबोध कुमार गोविल ने उपन्यास पर अपने विचार रखे । प्रौढ शिक्षा अध्यक्ष राजेन्द्र बोड़ा ने अतिथियों का स्वागत किया ।
डॉ. सुशीला शील ने नीलिमा का परिचय देते हुए कहा कि ये नीलिमा जी का दूसरा उपन्यास है। इससे पहले इनके पांच कहानी संग्रह, उपन्यास, व्यंग्य संग्रह,लघुकथा संग्रह और बाल कथा संग्रह , तीन संपादित किताबों सहित तेरह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं । राजस्थान साहित्य अकादमी के लिए भी इन्होंने एक किताब संपादित की है। राजस्थान साहित्य अकादमी की सरस्वती सभा की सदस्य भी रह चुकी हैं।
उपन्यास पर चर्चा करते हुए प्रो.लाड कुमारी जैन ने कहा उपन्यास आधी आबादी के संघर्ष उनकी अस्मिता की सशक्तता का जीवन्त दस्तावेज है।आज भी महिलाओं के लिए कदम कदम पर मुश्किलें हैं लेकिन अगर ठान लें तो अपनी लड़ाई खुद लड़ सकती हैं ।बदलाव ला सकती हैं । डॉ. सुषमा सिंघवी ने कहा नारी विमर्श का एक सशक्त उपन्यास है। इसे पाठ्यक्रम में लगाया जाना चाहिए । डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने कहा बहुत बारीकी से स्त्री समस्याओं को रखते हुए सशक्त नारी चरित्र गढ़े गए हैं।
डॉ. विद्या जैन ने कहा संघर्ष के बिना जीवन से पार नहीं पाया जा सकता ।इस उपन्यास में स्त्री अस्मिता को प्रमुखता से दर्शाया है। महिला पात्रों की सशक्तता दृष्टव्य है । डॉ. रेखा गुप्ता ने कहा इस उपन्यास में नारी जीवन की विभिन्न समस्याओं के साथ ही ग्रामीण महिलाओं और शहरी महिलाओं के किरदारों को विभिन्न रूढ़ियों , पितृसत्तात्मक पुरुष फरमानों के बीच अपने फैसलों के साथ किस तरह अपना जीवन जिया जा सकता है ख़ूबसूरती से दर्शाया गया है ।

प्रो. प्रबोध गोविल ने कहा उपन्यास काल्पनिक नहीं बल्कि वर्तमान में हो रही घटनाओं के आधार पर स्त्री दुखों की दास्तान है। सशक्त महिला किरदारों द्वारा संघर्ष से निकल कर खुली हवा में साँस लेने का सुखद संदेश निहित है । नन्द भारद्वाज ने कहा-यह उपन्यास स्त्री संघर्ष का केंद्र बिंदु है। इसमें तीन तरह की स्त्रियों के संघर्ष का मार्मिक-रोंगटे खड़े कर देने वाली मार्मिक कहानियाँ पिरोई गईं हैं। ग्रामीण, मध्यमवर्गीय और आधुनिक । स्त्रियों को संगठित होकर सशक्त बनने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण उपन्यास है।

कार्यक्रम के अंत में प्रश्न उत्तर सत्र हुआ जिसमें लेखिका नीलिमा टिक्कू से रूबी खान और दीपा माथुर ने प्रश्न किए। कार्यक्रम में शहर के प्रतिष्ठित साहित्यकार शिक्षाविद उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सुशीला शील ने किया।

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