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आशाओं के दीप जलाऊँ

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०  सुषमा भंडारी ०  आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग हो न जाए हादिसा कहीं हो न जाए जंग डोलती हैं सब दिशाएँ बोलती हैं माँ की आहें फीके हैं त्यौहार सारे फीके हैं सब रंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग हर कली घबराई - सी तुलसी भी कुम्हलाई - सी माली लूटे वाटिका को देखकर होती मैं दंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग महिमा है अब लूट की हिंसा की और झूठ की ऐसे में लोगों की जग में उड़ती आज पतंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग अधरों पे अब नहीं मिलता क्यों मनमीत नहीं वीणा भी खामोश है काँप रहा मृदंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग हो रहे गद्दार सब लूटते हैं प्यार सब रूप अपनों का धरें हैं आस्तीनों में भुजंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग दर्द है मुस्कान में भीड़ है शमशान में जीना है दुश्वार- सा अब रूठ बैठी है उमंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग दीप बन जा आस का सत्य का विश्वास का दूर हो आंधियार मन का हो कोई जीने का ढंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग हो न जाए हादिसा कहीं हो न जाए जंग

बिन तेरे मेरे प्रभु, नहीं मेरी पहचान

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०  सुषमा भंडारी ०  है जिसमे तेरी रजा, उसमे मेरी शान । बिन तेरे मेरे प्रभु, नहीं मेरी पहचान।। हिय हर्षित हो कह रहा, आओ बिराजो नाथ। तुम्हरे ही आशीष से जीवन मे प्रभात।। लिप्त हुआ संसार में, मोह माया का फेर। सब कुछ तेरे हाथ में, हम माटी का ढेर।। पूर्ण समर्पण हो जहाँ, वहीं आस- विश्वास। जिस दिल मे राघव बसे, चहुँदिस है उल्लास।। राघव तेरा द्वार हो, जब भी खोलूँ नैन। तेरा सिमरन जब मिले,पाऊँ प्रभु जी चैन।। मन का रावण हो स्वाह , मन में हों बस राम। जितनी हों कठिनाइयां, जाऊं सीधे धाम।। दीपों की सुंदर लड़ी , जगमग जगमग होय। रात अमावस थी मगर, पूनम जैसी होय।। मन के क्लेश मिट गए , मिटा है सब अंधियार। सच्चाई की जीत है , गया झूठ अब हार।।

"ख़ुशबू तो बचा ली जाए" एक विश्लेषण

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० सुषमा भंडारी ०  डॉ लक्ष्मीशंकर वाजपेयी मंचीय कवि के रूप में ख्यात हैं लेकिन वे मंच की फूहड़ और चुटकुला प्रवृति से दूर उस परंपरा के कवि हैं जिन्होंने मंच पर साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से मंच की गरिमा को बनाए रखा । इन्होंने देश भर में अनेक अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों में न सिर्फ़ शिरकत की बल्कि कवि सम्मेलनों और मुशायरों का सफल संचालन भी किया। भारतीय प्रतिनिधि के रूप में इन्होंने ब्रिटेन , पोलैंड , त्रिनिनाड, टुबैको और सूरीनाम जैसे देशों में जाकर काव्यपाठ किया और अपनी कविताओं गीतों और शायरी से वहां भी भारतीयता के झंडे को बुलंद किया। इन्होंने " सार्क सम्मेलन " में भी भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए हिंदी कविता को वैश्विक पहचान दिलवाई । डॉ हरीश अरोड़ा के प्रोत्साहन और वाजपेयी जी की अद्भुत और अंतस तक उतर जाने वाली रचनाओं ने मुझे इनकी पुस्तक " ख़ुश्बु तो बचा ली जाए" पर शोध कार्य करने के लिए दृढ़ निश्चय प्रदान किया। चूँकि डॉ लक्ष्मीशंकर वाजपेयी पर यह पहला ही शोध कार्य है तो सामग्री जुटाना भी आसान नहीं लेकिन बाजपेयी जी से अक्सर विभिन्न गोष्ठियों के दौरान मिलने के क...

गणेश चतुर्थी : नमन करूं वंदन करूं गौरी पुत्र

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०  सुषमा भंडारी ०  नमन करूं वंदन करूं गौरी पुत्र गणेश। पूरी करते कामना, तुम तो हो विघ्नेश।। गणपति का पूजन करूं , प्रथम करूं प्रणाम। मंगल काज सँवारते, करते सारे काम।। विद्या बुद्धि दे मुझे , गणपति किया निहाल। सुख समृद्धि बाँटते, करते मालामाल।। शुभ दायक वरदान की झोली भरो अपार। लक्ष्मी संग विराजते, पूजे सब संसार।। गणपति बप्पा मोरया चहुंदिश हो जयघोष। मंगलमूर्ति हे प्रभु मिट जाएं सब रोष।। हर मन में श्रद्धा तेरी हर मन करे पुकार। मोदक लड्डू धूप से सजा तेरा दरबार।। मन अनंत अंधियारा मिटे दीखे उज्ज्वल रूप। देवों में प्रथम तुम्हीं रिद्धि _ सिद्धि अनूप।। शंख, मृदंग, घंटनाद से, होती जय जयकार । आओ बिराजो गणपति जग के पालनहार।। ==============================  क्षणिकाएं सृजन प्रसव-वेदना संवेदना, वेदना का ही दूसरा नाम सृजन है । बूँद जैसे ओस की एक -एक बूँद समाती है धरा में तब कहीं जाकर उमड़ता है सागर पृथ्वी पर वैसे ही बूंद - बूंद जुड़ती रहती है आंसुओं की , भीतर ही तब कहीं जाकर उमड़ता है हृदय सागर। आकाश बूढ़ी आँखों से सब कुछ देखने ,सहने के बाद भी ये आँखें खुली रहना चाहती हैं उन अपनों को दे...

बिन तेरे मेरे प्रभु, नहीं मेरी पहचान

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०  सुषमा भंडारी ०   मातृभूमि , मातृभाषा मेरा है अधिकार मैं इनसे और ये मुझसे करते देखो प्यार___ मातृभूमि की सेवा करके पाऊं मैं सम्मान जब - जब मैं धरती को पूजूं आ जाए मुस्कान संकट के बादल जब छाएं हो जाऊं तैयार मातृभूमि की खातिर जन - जन मेरा है परिवार___ सच्ची सेवा मातृ भूमि की सह न सकूं अपमान दुश्मन की खातिर तो मैं भी कर दूं बस ऐलान मर जाऊं या मार गिराऊं मानूं कभी न हार शांति और सत्य के पथ पर चलने को तैयार___ मातृभूमि की आन बान का रखूं हरदम ध्यान तीन रंग का मेरा झंडा मातृभूमि की शान मातृभूमि की रक्षा को समझूं कभी न भार दुश्मन की खातिर बन जाऊं दोधारी तलवार__ आस-पास देखूं मैं जब भी फैला भ्रष्टाचार फूलों की मैं रक्षा कर लूं फ़ेकूँ सारे खार लालच को मैं कभी न सींचू ,झूठा जाए हार__ मातृभूमि, मातृभाषा मेरा है अधिकार मैं इनसे और ये मुझसे करते देखो प्यार____ ============================  बालगीत -- नानी मेरी नानी मेरी आँख का तारा कहती मुझको राजदुलारा मुझे नाचती मुझे हँसाती झूम- झूम कर गीत सुनाती रूठ कभी मैं जाता हूँ तो प्यार से मुझको गले लगाती कहती मुझको चाँद - सितारा नानी मेरी आ...

खुद में खुद को जिंदा रख भीतर एक परिंदा रख

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० Sushma Bhandari ०   कण कण में विज्ञान कहाँ नहीं विज्ञान बताओ कहाँ नहीं विज्ञान भूत-भविष्य का ज्ञाता है , वर्तमान की शान भू गर्भ से लेकर ये अन्तरिक्ष तक जाये जैविक, भौतिक, मौसम और रसायन भी समझाये माटी के कण कण में सब है,पानी, हवा व आग करता है विज्ञान खुलासा, क्या है जीवन राग जीवन से मृत्यु तक का देता यही हिसाब क्या होती है मूल हकीकत क्या होता है ख़्वाब  विविध समस्यायें हल करता सबका यही जवाब कण कण में विज्ञान छिपा है कण कण में विज्ञान =================================  ........परिंदा..... खुद में खुद को जिंदा रख भीतर एक परिंदा रख सभी लुटेरे बैठे हैं रिश्ते ज़रा चुनिंदा रख इतनी गहरी नींद न ले आँख जरा उनिंदा रख भीतर भी तो झांक ज़रा हरदम न परनिंदा रख जिसने रची है ये सृष्टि उसमें खुद को जिंदा रख ==================== अब पनघट सूने हुए , सूने हार श्रृंगार डगर -डगर सूनी हुई , दीखे न परिवार। तक-तक बाट निहारते ,कब आयें मेहमान जब से अपनापन गया , रूठी है मुस्कान।। मटक-मटक कर चल रहे, कान्हा मटकी फोड़ दरस दीवानी गोपियाँ, लगी हुई है होड़। =============================== अपनी - अपनी...

दोहा 13-11 की मात्राओं में बंधा एक ऐसा छंद जो अपना अस्तित्व जन्मों से लिए

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०  सुषमा भंडारी ०  मेरी पसंदीदा विधाओं में से एक है दोहा 13-11 की मात्राओं में बंधा एक ऐसा छंद जो अपना अस्तित्व जन्मों से लिए है हमारे पुरखों ने भी पढ़ा , गुनगुनाया और आगे आनेवाली पीढ़ियाँ भी इस पर चिंतन , मनन करती रहेंगी । " दोहा " हमारी संस्कृति और सभ्यता से जुड़ा है । हम सब कबीर , बिहारी ,रहीम को पढ़कर बड़े हुए है ,शोध होते आ रहे हैं और होते रहेंगे ।  मुझे तो वैसे ही संक्षिप्तता में लिखना बहुत पसंद है यूं कहें " गागर में सागर " दो पंक्तियों में जीवन का सार दोहा ही दे सकता है जैसे रहीम कहते हैं अपने दोहे में " रहिमन धागा प्रेम का ,मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर न जुड़े , जुड़े गांठ पड़ जाय।। कबीर कहते हैं " बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर । पंछी को छाया नहीं , फल लागे अति दूर ।। रीतिकाल के महान कवि बिहारी को तो दोहा सम्राट कहा गया । उनकी भाषा शैली और शब्दों के भाव का कोई दूसरा नहीं उनके दोहों को देखें  बिहारी सतसई से " सतसइया के दोहरा , ज्यों नाविक के तीर। देखन में छोटे लगें , घाव करें गम्भीर।। " कहत , नटत , रीझत , खिझत , मिलत , खिलत , लजियात ...

यूं ही किसी मोड़ पर ' जब कोई मिल जाता है,कोई बिछुड़ जाता है

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०  सुषमा भंडारी ०  यूं ही किसी मोड़ पर ' जब कोई मिल जाता है,कोई बिछुड़ जाता है या कुछ ऐसा घटित हो जाता है जो अविस्मरणीय हो,तब यह हृदय द्रवित होता है,भावनाएं उद्वेलित होती हैं और रचना का जन्म होता है , जो भाव हृदय से प्रस्फुटित होकर, शब्द बनकर काग़ज़ पर उतरते हैं,वो ईश्वर - प्रदत्त साक्षात् रचना होती है, ठीक नवजात शिशु की भांति,मैं इस रचना क्रम से बहुत प्यार करती हूँ। यह काव्य संग्रह विभिन्न भावनाओं का ऐसा ही समुच्चय है। इस पुस्तक की कविताएं आपके समक्ष  माँ की चप्पल से से जब बाहर होने लगा बेटी का पैर तभी से लड़की उस घर के लिए हो गई ग़ैर! चिंता के दर्द में डूब गया परिवार देखो भाई जल्दी कोई घरबार ! सुन - सुन कर ऐसी बातें लड़की की हो गई बेचैन रातें क्या ये उसका नहीं है घर क्या होगा? लगा रहता था डर क्या ? झूठा प्यार था, जो अब तक इस घर में मिला ! कैसा है? ये सिलसिला कैसी ये विडंबना ? कैसा ये प्रपंच ? जीवन का कुछ नाटक इस घर में किया है अब ढूंढो दूसरा मंच! ( मॉड्यूलर किचन ) मॉड्यूलर किचन बनवाना है ढूंढ रही हूँ कारीगर! करती हूँ बात दिन - प्रतिदिन! पूछती हूँ दाम लकड़ी का, सीमेंट...

" मैं सफ़र में हूँ "पुस्तक की दो गज़ल आपके समक्ष

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०  सुषमा भंडारी ०  गज़ल का अपना अनुशासन अपनी बंदिशें होती हैं ये पंक्तियां देवेंद्र मांझी ने मेरी पुस्तक " मैं सफ़र में हूँ " की भूमिका में लिखा है। मैं अपने विषय में व्यक्तिगत रूप से कहूँ तो लेखन में मुझे स्वतंत्रता चाहिए मगर छंद तो छंद हैं जो लेखन की खूबसूरती को बढ़ाते हैं उनके श्रृंगार के समान हैं ,  हाँ ये जरूर कहूँगी गज़ल का मीटर बहुत ही मुश्किल है मुझे तख्ती हाथ में उठानी पड़ी। अब भी मुझसे त्रुटियां हो जाती हैं बहुत प्रयास करना पड़ता है यही कारण है अब तक दूसरा संग्रह तैयार नहीं हुआ है कोशिश जारी है। खैर इस संग्रह की सभी गज़ल मुझे प्रिय हैं मगर छोटी बहर 2122 2122 212 अति प्रिय है । पुस्तक की दो गज़ल आपके समक्ष  सच कहा तो पत्थरों से दी सज़ा क्या यही है ज़िंदगी का आईना दिल मेरे से खेल कर न जाइए दिल मेरा नाज़ुक बहुत है कांच - सा अपने दिल में आप ग़र देते जगह क्या बिगड़ जाता बताओ आपका गुलशनों का है नहीं नामों - निशां दूर तक मंज़र है रेगिस्तान का झेलती ' सुषमा ' रही है हर समय हादसा - दर - हादसा - दर - हादसा कोई तूफ़ां सचमुच उससे हारा होगा नैया को तब जाकर मिला ...

माहिया तेरे लिए " पुस्तक से माहिया विधा में कुछ गीत

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०  सुषमा भंडारी ०  माहिया तेरे लिए " पुस्तक से माहिया विधा में कुछ गीत प्रस्तुत हैं। माहिया - पंजाबी का शब्द है जिसका अर्थ है "मीत" अर्थात् " मित्र"। मित्र कोई भी हो सकता है - परमात्मा , पति , प्रेमी, या फिर सखी - सहेली , प्रकृति। पंजाब की मिट्टी की खुशबू ,सौंधी - सौंधी गंध लिए है। ये तीन - तीन अवलियों ( पंक्तियों) की छोटी कविताएं जीवन के राग से आप्लावित हैं , जीवनानुभूतियों से भरी हैं । ये त्रिवालियां जन - जन की भाषा बोली हैं इसलिए इनमें अपनापन झलकता है। छंद विधान के अनुसार माहिया तीन पंक्तियों का मात्रिक लयात्मक , गेयात्मक गीत ( पंजाब का टप्पा) है । प्रथम पंक्ति में 12 मात्रा,द्वितीय पंक्ति में 10 मात्रा एवं तृतीय पंक्ति में पुनः 12 मात्राओं का निर्वहन करना होता है । इसकी एक खास लय है जो अक्सर सब ने सुनी होगी । खेतों में काम करते किसान , प्रेमी जोड़े इसे गुनगुनाते हैं इसका उदाहरण कई चलचित्रों ( फिल्मों) में है। पंजाब में ब्याह - शादियों में इन गीतों को गाना आम बात है। इन्हीं गीतों सवाल, जवाब वाली शैली भी पंजाब में मशहूर है । माहिया , त्रिवालियां , गीत , अहसा...

"स्वर मौन के" ( हाइकु )

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०  सुषमा भंडारी ०  गैर कानूनी कुछ नहीं है अब खोजें तरीके मौका परस्त व्यक्ति ही तो करता व्यवस्था ध्वस्त ढर्रे - ढर्रे में घुसा है भ्रष्टाचार जर्रे - जर्रे में शैताँ हो गए मायावी लोग यहाँ इंसाँ हो गए धर्म का नाम लेकर कराते हैं लोग फसाद गूंगी बहरी सरकार हमारी चिल्लाते रहो दीप धर्म का जला जिस समय हुआ उजाला स्वर मौन के हिला देते हैं नींव लगता डर सीना तान के खड़े हैं सीमा पर वीर सपूत हर पहर कंटकों की डगर फौजी सफ़र

बाल कहानी "स्वर लहरी"

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०  सुषमा भंडारी ०  अ___अरे! कौन आया है ? माँ ने पूछा। आ___ आशा हूँ आँटी जी , पड़ौस की राधा की बेटी। अरे आशा , आओ बैठो। आशा बैठ गई। इ ___ इस बैग में क्या लाई हो आशा ? ई __ईशा ने पूछा। ईशा यानि जिनके घर आशा आई थी, ऋषभ की माँ , ऋषभ आशा का दोस्त भी था । उ___उई माँ ---ये बैग। मैं तो आपको देना ही भूल गई। ऊ __ ऊन - सिलाई है इसमें,  माँ ने कहा था आपको स्वेटर बनाना आता है।  क्या आपको स्वेटर बनाना आता है ? क्या आप मेरी गुड़िया का स्वेटर बना देंगी आंटी। ऋ __तभी घर में ऋषभ आया और हैरान होकर पूछने लगा ,  आशा! तुम यहाँ ? हाँ, क्यूँ मैं यहाँ नहीं आ सकती क्या ? आशा ने कहा। आ सकती ही भई। फिर दोनों हँसने लगे, ईशा भी हँसने लगी । ए___एक बात है आशा , मैं स्वेटर कैसे बुनूँगी, मेरी आँखे कमजोर हैं और मेरी ऐनक ! ऐ __ ऐनक टूट गई थी, जो मरम्मत के लिए दे रखी है। ऐनक के आते ही स्वेटर बना दूँगी ओ ___ओ हो! आँटी जी , परेशान होने की कोई बात नहीं, मैं फिर आ जाऊँगी। मैं घर जा रही हूँ आप आराम करें। औ___ जल्दी से घर जाती हूँ, आज मम्मी औरियो के बिस्कुट लाएगी ,  मुझे ...

" स्वर मौन के "इस पुस्तक की विधा को जानने के लिए जरूरी हैं ....

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० साहित्य संपादक ०  हिंदी साहित्य में एक स्थापित और चर्चित लेखिका सुषमा भंडारी की पुस्तक " स्वर मौन के " से कुछ  पंक्तियां प्रस्तुत हैं जो इस पुस्तक की विधा को जानने के लिए जरूरी हैं आज से हम इस पुस्तक की सामग्री आप के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं । हाइकु मूलतः जापानी साहित्य की प्रमुख विधा है । आज हाइकु जापानी साहित्य की सीमाओं को लांघकर विश्व साहित्य की निधि बन चुका है । हाइकु चरम क्षण की कविता है ,इस क्षण की जो गूंज हमारी चेतना में उभरती है। हाइकु कविता को भारत में लाने का श्रेय कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर को जाता है । भारतीय भाषाओं में रविन्द्र नाथ ठाकुर ने जापान यात्रा से लौटने के पश्चात 1919 में "जापानी यात्री" में हाइकु की चर्चा करते हुए बंगला में दो कविताओं के अनुवाद प्रस्तुत किए । हाइकु में " पांच - सात - पांच" का अनुशासन रखना जरूरी है। आधे वर्ण की आवृत्ति चाहे बार - बार , महत्वपूर्ण होने के बावजूद भी गिनती में शामिल नहीं होता जैसे - स्नेह मिले तो ये शब्द पुष्प यूँ ही खिल जायेंगे । इसमें आधे अक्षर महत्वपूर्ण हैं पढ़े भी जा रहे हैं मगर गिनती में शामिल ...

जग जननी माँ तारिणी, तेरे रूप अनेक

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०  सुषमा भंडारी ०  जग जननी माँ तारिणी, तेरे रूप अनेक। जीवन ज्योति अम्बिके ,जाने है प्रत्येक।। नौ रूपों में है अलग,देती तू संदेश। माँ दुर्गा माँ चण्डिके ,तेरे लम्बे केश।। खडगधारिणी मैं करूँ, शत-शत यूँ प्रणाम । तुझसे ही माँ आसरा, तुझसे बनते काम।। शेर सवारी तू करे, करे रक्त का पान। माँ मुझको तो दे सदा, होंठो पर मुस्कान।। प्यार सदा तुझसे करूँ,ऐसा दे वरदान। चर्चाओं में मैं तेरा ,सदा करूँ गुणगान।। बहुत अंधेरों ने दिये,काले दिन और रात। मैया मुझको चाहिए ,खुशियों का प्रभात।। भोर गई , दिन भी गया,बची हुई है शाम। लेकिन बाकी हैं अभी, मेरे सारे काम।। तेरे अष्टम रूप पर,दुनिया हुई निहाल। माँ मैं तेरी बालिका, कर दे मालामाल।। मैया तेरे रूप पर,वारी- वारी जाऊँ। मैं हूँ तेरी लाडली, हरदम मैं मुस्काऊँ।। झूठा सर चढ़ बोलता, सच्चाई खामोश। चला जरा अपना खड़ग,आ जाये सब होश।।

डॉ हाफ़िज़ कर्नाटकी द्वारा हबीब सैफ़ी की किताब का विमोचन

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० इरफ़ान राही ०  नयी दिल्ली : जामा मस्जिद के नजदीक पहाड़ी इमली वाली स्थित दिल्ली यूथ वेल्फेयर एसोसिएशन के अंतर्गत संचालित शाह वली उल्लाह पब्लिक लाइब्रेरी में "21 वीं सदी में दिल्ली में उर्दू अदब ए अतफाल का इरतिक़ा" नामक पुस्तक का लोकार्पण सौ से अधिक पुस्तकों के लेखक और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता हाफ़िज़ कर्नाटकी ने किया वहीं उनके सम्मान में साहित्यिक सत्र का आयोजन भी किया गया। संस्था डाईवा के पदाधिकारियों जिनमें सिकंदर मिर्ज़ा चंगेज़ी, नायब सदर मोहम्मद तकी सैफी, तंज़ीम रज़ा, शरीफ़ कुरैशी ने सभी मेहमानों का इस्तकबाल किया। डॉक्टर अमीर हम्ज़ा ने मुख्य अतिथि हाफ़िज़ कर्नाटकी का परिचय और उनके बाल साहित्य के योगदान के बारे में जानकारी दी। डॉ. हाफ़िज़ कर्नाटकी ने कहा कि मैं दर्जनों बार दिल्ली आया हूँ, लेकिन मुझे कभी भी पुरानी दिल्ली की संकरी गलियों में छिपे अनमोल ख़ज़ानों तक पहुँचने का अवसर नहीं मिला। इसके लिए मैं आप सभी ज़िम्मेदार लोगों का आभारी हूँ कि शाह वलीउल्लाह लाईब्रेरी जैसा ऐतिहासिक साहित्यिक केंद्र मेरे लिए उपलब्ध है। आप सभी की तरह इसका सेवक बनना मेरी हार्दिक इच्छा है, ...

आद्यांतरा का 5वाँ शब्दोत्सव : हिंदी कविता,अभिव्यक्ति और साहित्यिक संवाद

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० योगेश भट्ट ०  नई दिल्ली : भारतीय कला, साहित्य और सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देने के लिए निरंतर कार्यरत संस्था आद्यांतरा ने दिल्ली में 5वें शब्दोत्सव–काव्य बैठक का आयोजन किया। हिंदी दिवस एवं हिंदी पखवाड़े के अवसर पर आयोजित इस साहित्यिक आयोजन में कवियों, साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों ने कविता, भाषा की शक्ति तथा समकालीन समाज में साहित्य की भूमिका पर सार्थक संवाद किया। काव्य बैठक में परिवार में बेटियों की भूमिका, भाषाई पहचान, सामाजिक सरोकार, समकालीन मीडिया और साहित्य का संबंध तथा विभिन्न समुदायों एवं भौगोलिक क्षेत्रों में हिंदी की भूमिका जैसे विविध विषयों पर काव्यपाठ और विचार-विमर्श हुआ। कार्यक्रम में दीप्ति अग्रवाल और नीलम वर्मा ने गिरमिटिया समाज और हिंदी से जुड़ी उनकी सांस्कृतिक पहचान पर केंद्रित कविताएँ प्रस्तुत कीं। डॉ. माधुरी सुबोध ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की पृष्ठभूमि से जुड़ी कविता प्रस्तुत की, जिसने कार्यक्रम में देशभक्ति का भाव भर दिया। हर्षबाला शर्मा, अरुणा गुप्ता, इला कुमार, भगवती सक्सेना, प्रियंका सिंह, पारुल शर्मा और निर्मला नेगी सहित अन्य कवियों की रचनाओं ने काव्य बैठ...

"मन के मनके" माहिया संग्रह में कहीं उलाहना कहीं कटाक्ष और कहीं श्रृंगार को पिरोया है

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० सतेन्द्र धारीवाल 'धारी' ०  अमरोहा, उत्तर प्रदेश : "मन के मनके" एक ऐसा साझा संग्रह जिसमें 61 रचनाकारों ने अपने मनोभावों की अभिव्यक्ति को माहिया छंद के रूप में व्यक्त किया सभी रचनाकारों का प्रयास अतुल्यनीय रहा। इस संग्रह की संपादिका डॉ. संतोष कुमारी संप्रीती ने निश्चित रूप से गहन निष्ठा और लगन के साथ इस संग्रह को संपादित किया।  वह पूरी निष्ठा के साथ अपने इस संकल्पित कार्य में लगी रहीं और अंततः इसे पूरा किया। संतोष संप्रीती स्वयं साहित्यकार के रूप में बड़ा नाम है जो लगभग हर विधा में अपनी लेखनी को अनवरत चलाती रहती हैं। जहां तक रचनाकारों का प्रश्न आता है तो सभी रचनाकारों ने अपनी अहम् भूमिका निभाई और लेखन में पूरी निष्ठा के साथ लगे रहे और अपना श्रेष्ठ देने का प्रयास किया।  सभी रचनाकारों ने अलग-अलग विषयों पर माहिया छंद लिखे इस माहिया संग्रह को संग्रहित करने में संतोष संप्रीती जी का अहम् योगदान रहा है  मैंने सभी रचनाकारों के माहिया छंदों को, एक-एक शब्द को, एक-एक अक्षर को और उनके भावों को पढ़ा है। इसके साथ ही छंदों में मात्राओं के भार को भी सही करने में अपना अथक प्रयास...

पुस्तक ‘संघर्ष : सड़कों से सलाखों तक’ का लोकार्पण

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० आशा पटेल ०  जयपुर : स्वतंत्रता सेनानी स्व. रघुवर दयाल चतुर्वेदी के जेल अनुभवों पर आधारित पुस्तक ‘संघर्ष: सड़कों से सलाखों तक’ का लोकार्पण नारायण सिंह सर्किल स्थित पिंक सिटी प्रेस क्लब में किया गया। इस अवसर पर ‘भारतीय युवा एवं पूर्ण स्वराज’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन भी हुआ, जिसमें देश के प्रतिष्ठित विचारकों और राजनेताओं ने अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम में गांधी शांति प्रतिष्ठान दिल्ली के अध्यक्ष कुमार प्रशांत, आदर्श नगर विधायक रफीक खान, शिक्षाविद मृदुला सामवेदी, गांधीवादी शिक्षाविद बीएम शर्मा और वक्ता दीपक राय सहित कई गणमान्य लोग शामिल हुए। वक्ताओं ने स्वतंत्रता संग्राम के संघर्षों को याद करते हुए आज की युवा पीढ़ी के लिए 'पूर्ण स्वराज' के संदेश पर चर्चा की।  कुमार प्रशांत ने कहा कि महात्मा गांधी का तरीका हमेशा से झूठ का मुकाबला करने का रहा है। आज की 'जेन जी' पीढ़ी में गांधीवादी विचार प्रवेश कर रहे हैं, जिसका जीवंत उदाहरण हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों में देखने को मिला। उन्होंने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन के समय गांधी जी ने लोकतंत्र की असली ताकत आम लोगों के ...

राज्यसभा उपसभापति हरिवंश ने भारतीय लोकतंत्र के 75 वर्षों पर आधारित ऐतिहासिक पुस्तक किया विमोचन

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० आशा पटेल ०  नई दिल्ली। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने नई दिल्ली स्थित अपने सरकारी आवास पर "75 Years of Indian Democracy: The Indian Election Story in Facts & Figures (1950–2025)" पुस्तक का विमोचन किया। इस अवसर पर उन्होंने दो त्रैमासिक शोध पत्रिकाओं—इंडियन जर्नल ऑफ इलेक्टोरल स्टडीज़ तथा इंडियन जर्नल ऑफ सोशियो-इकोनॉमिक स्टडीज़ —के प्रथम अंकों का भी विमोचन किया। इंडियास्टैट पब्लिकेशन्स द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक वर्ष 1950 से 2025 तक भारत की लोकतांत्रिक एवं निर्वाचन यात्रा का व्यापक, तथ्यपरक और प्रामाणिक दस्तावेज प्रस्तुत करती है। इसमें आम चुनावों के सांख्यिकीय आँकड़े, ऐतिहासिक घटनाक्रम, निर्वाचन क्षेत्रवार जानकारी, विषयगत विश्लेषण, मानचित्र तथा चित्रात्मक प्रस्तुतियाँ सम्मिलित हैं। यह भारतीय लोकतंत्र से संबंधित निर्वाचन आँकड़ों एवं तथ्यात्मक जानकारी के सबसे व्यापक संकलनों में से एक है। पुस्तक में 1951–52 के प्रथम आम चुनाव से लेकर प्रत्येक लोकसभा चुनाव का विवरण तथा 1950 से 2025 तक के प्रमुख संवैधानिक, संस्थागत एवं राजनीतिक विकास का क्रमबद्ध आलेखन किया गया है। इसकी समसामयिक उ...

नेवर से रिटायर्ड – 60 नॉट आउट' का लोकार्पण

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० योगेश भट्ट ०  वृंदावन। वरिष्ठ नागरिकों के सक्रिय, सम्मानजनक और उद्देश्यपूर्ण जीवन का संदेश देने वाली, लेखक विजय मारू की पहली पुस्तक 'नेवर से रिटायर्ड – 60 नॉट आउट' का लोकार्पण वृंदावन में पूज्य दीदी मां साध्वी ऋतंभरा एवं स्वामी गिरिशानंद सरस्वती के करकमलों से सम्पन्न हुआ। विजय मारू पिछले कई वर्षों से केवल वरिष्ठ नागरिकों के जीवन, उनकी चुनौतियों, संभावनाओं और दूसरी पारी को केंद्र में रखकर नियमित लेखन कर रहे हैं। अब तक वे इस विषय पर 110 से अधिक लेख लिख चुके हैं और इनकी लेखनी जारी है, जो देश के विभिन्न समाचार-पत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। वरिष्ठ नागरिकों के जीवन पर इतने व्यापक और सतत लेखन के उदाहरण बहुत कम मिलते हैं। इस पुस्तक में उन्हीं लेखों में से 60 चयनित लेख संकलित किए गए हैं। इनका उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को यह विश्वास दिलाना है कि जीवन के स्वर्णिम वर्ष निष्क्रियता के नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सक्रियता, आत्मनिर्भरता, सीखने, योगदान देने और आनंदपूर्वक जीने के वर्ष हो सकते हैं। पुस्तक के शीर्षक में "60" का चयन भी प्रतीकात्मक है, क्योंकि हमारे समाज में साम...