भूल जाता हूँ

o मुहम्मद नासिर
लिखने बेठूं तो भूल जाता हूँ
कैसी हालत में खुद को पाता हूँ
तेरा पैकर मेरी निगाह में है
तेरी सूरत भी मेरी चाह में है

साथ तेरे गुज़ारे जो लम्हे
वो मेरी सांस में बस्ते।
तेरी हर एक अदा का शेदाई
कान में कहती आ के पुरवाई

क्यों फँसाने को आम करता है
जो ना अच्छा वो काम करता है।
बात उसकी समझ में आने लगी
प्यार की जोत जगमगाने लगी
इसलिए ज़हन जब संवरता है

और काग़ज़ को वो पकड़ता है
हाथ में वो कलम भी लेता है
लिखूं ये फैसला भी करता है।
फिर भी सब कुछ मैं भूल जाता हूँ
ज़िक्र तेरा जो लिखने आता हूँ।

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