ग़ज़ल

० मुहम्मद नासिर ० 
ले के इन बातों का कुछ भी ना असर
हो गए हो आप कितने बे खबर
आ रहा है दूर से तूफान इक
किस तरह से अब बचेगा यह शहर?

देखना है इस सफर के बाद मे
ले के जायेगा मुक़द्दर अब किधर ?
देखता हूँ उस पे मेरी बात का
हो रहा है थोडा थोडा सा असर!

रात के गहरे अंधेरे देख ले
मुस्कुराती आ गई फिर से सहर
गम खुशी के आते जाते खेल में
जिंदगी होती रही यूँ ही बसर

केसे बतलाएगा नासिर आज, कि
दिख रहा क्यों चाँद इतना बे असर

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