ग़ज़ल

० मुहम्मद नासिर ० 
बात को पहले समझना चाहिए
बे वजह यूँ हीं ना हंसना चाहिए

महफिलों में मस्त रहने वाले सुन
कुछ लँम्हे तन्हा भी रहना चाहिए

होती है तकलीफ सब हैं मानते
दर्द को थोड़ा तो सहना चाहिए

एक तरफा बात के माहौल में
आपको भी कुछ तो कहना चाहिए

कर के जाया क़ीमती लम्हात को
आज नासिर को ना रोना चाहिए

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