बेटी हूँ मैं भी घर की

o मुहम्मद नासिर o 
नाज़ से पाली हुई बेटी
शादी के बाद
जब ससुराल जाती है
तो वो पराई नहीं लगती है।

शादी के बाद
जब माईके आकर
हाथ मुँह धोने के बाद
सामने टंगे तोलिए के बजाय
अपने बैग से

छोटा सा रुमाल निकाल कर
मुँह पोंछती है
तो पराई लगती है।
जब वो
बावर्ची खाने के दरवाजे पर

ना मालूम सी
खड़ी हो जाती है।
अंदर घुसने मे हिचकिचाती है
तो पराई सी लगती है।

जब मेज़ पर खाना लगने के बाद भी
बर्तन खोल कर नहीं देखती
तब प्राई लगने लगती है।
जब बात बात पर
गैर जरूरी क़हक़हा लगा कर

खुश होने का नाटक करती है
और जाते वक़्त
"कब आयेगी " के जवाब में
" देखो कब आना होता है
कह कर जवाब देती है

तो हमेशा के लिए पराई हो गई।
ऐसा लगता है।
लेकिन
दरवाजे से बाहर निकल कर
गाड़ी में बैठते वक़्त

चुपके से अपनी आँखें
खुश्क करने की कोशिश करती है
तो सारा परायापन
एक झटके में कही खो जाता है
और कलेजा कट कर

मुँह को आ जाता है।
खामोशी की ज़बान में
आँसू के भीगे कलम से
दिल के ज़खमों से साफ लिखती है

" हिस्सा नहीं चाहिए भाई
मैका मेरा सजाय रखना।
कुछ ना देना मुझे।
सिर्फ मुहब्बत बरकरार रखना।

बाप के इस घर में
मेरी यादों को सजाय रखना।
बच्चों के ज़हनों में
मेरा मान बरक़रार रखना।
बेटी हूँ में भी इस घर की
ये अहसास सजाय रखना।

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