तन्हा लफ्ज़

मुहम्मद नासिर ० 
हवा की चादर पर
पलकों की कोरों से,
और उदास रोशनी के रंग से
तुमने लिखा था
एक लफ्ज़।

वो लफ्ज़
धुल गया
वक़्त की बरसात में।
जब भी आती है तुम्हारी याद
मेरे अहसास के तिनको तले
उग आता है

उस लफ्ज़ का अक्स
और मुझे
एक बार फिर
उदास कर जाता है।

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