पारंपरिक खेल : शारीरिक,मानसिक विकास का आधार
० श्याम कुमार कोलारे ० मनुष्य के विकास में खेलों की भूमिका सदियों से महत्वपूर्ण रही है। विशेष रूप से पारंपरिक खेल न केवल मनोरंजन का साधन रहे हैं, बल्कि वे बच्चों और युवाओं के शारीरिक, मानसिक, संज्ञानात्मक, सामाजिक और नैतिक विकास में भी अत्यंत सहायक सिद्ध हुए हैं। परंतु वर्तमान समय में आधुनिकीकरण, शहरीकरण और मोबाइल क्रांति ने इन खेलों की जगह आधुनिक डिजिटल खेलों को दे दी है, जिससे बच्चों का जीवन-शैली और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। भारत की सांस्कृतिक विरासत में पारंपरिक खेलों का विशेष स्थान रहा है। कबड्डी, खो-खो, कुश्ती, कंचे, लंगड़ी टांग, पिट्टू, गिल्ली-डंडा, टायर दौड़, लुका-छिपी, गदा-पीठी, घरगुला आदि खेल गाँवों और शहरों दोनों में लोकप्रिय थे। इन खेलों में केवल मनोरंजन ही नहीं था, बल्कि इनमें जीवन के लिए आवश्यक अनेक गुण भी छिपे होते थे।पारंपरिक खेलों में दौड़ना, कूदना, झुकना, पकड़ना, गिरना और उठना जैसी गतिविधियाँ होती हैं, जो बच्चों की मांसपेशियों, हड्डियों और सहनशक्ति को मजबूत बनाती हैं। बच्चे खुले मैदान में खेलने से ताजा हवा और प...