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मशाल जुलूस निकालकर मानवाधिकार दिवस के अवसर पर किया जागरूक
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० आशा पटेल ० राजातालाब । अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस पर लोक समिति, विश्व ज्योति जन संचार समिति के कार्यकर्ता और दिहाड़ी मजदूरों ने पयागपुर गांव में मशाल जुलूस निकाली। सैकड़ो की संख्या में ग्रामीण गांव के दलित बस्ती में एकत्रित होकर सभा किया फिर हाथ में मशाल लेकर तख्ती, बैनर के साथ गांव की विभिन्न बस्तियों में रैली निकाली। इस दौरान लोगों ने रोटी कपड़ा और मकान, माँग रहा मजदूर किसान,भीख नही अधिकार चाहिये जीने का सम्मान चाहिए, जुल्म करेंगे नहीं जुल्म सहेंगें नही आदि नारे लगाकर मानवाधिकार के प्रति ग्रामीणों को जागरूग किया. सभा में विश्व ज्योति जन संचार समिति के निदेशक फादर प्रवीण ने कहा कि सभी को बिना भेदभाव के जीने का अधिकारी होना चाहिए। आज भी कुल मजदूरों के 93% प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जिनकी कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है. वे गरीबी से भयंकर रूप से लड़ रहे हैं. जिनके मानवाधिकारों की रक्षा करना जरुरी है। इस अवसर प्रेरणा कला मंच द्वारा मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास पर आधारित नाटक प्रेम की बोली बोल प्रस्तुत किया. लोक समिति संयोजक नन्दलाल मास्टर ने कहा कि मानवाधिकार यह...
जिस विचारधारा के लोगों ने आजादी के आंदोलन में कभी वंदे मातरम उद्घोष नहीं किया,झूठे दावे करने से बाज आएं : अजय खरे
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० आशा पटेल ० रीवा। समता सम्पर्क अभियान के राष्ट्रीय संयोजक लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने कहा कि वंदे मातरम राष्ट्रीय गीत को लेकर इधर मोदी सरकार के द्वारा जनसाधारण को गुमराह करने की कोशिश अत्यंत आपत्तिजनक और निंदनीय है। यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के साथ क्रूर मजाक है। खरे ने कहा कि वंदे मातरम गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में ही राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनी पहचान बना ली थी। हर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वंदे मातरम गीत गाने में फक्र महसूस करता आया। जबकि अंग्रेजी हुकूमत वंदे मातरम बोलने वाले को स्वतंत्रता आंदोलन का पक्षधर मानते हुए प्रताड़ित करती थी। इसके बावजूद बहुत सारे लोग निर्भय होकर बेंतों की सजा के दौरान भी वंदे मातरम बोलते थे। वंदे मातरम' पहली बार 1896 में कलकत्ता (कोलकाता) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था, जिसे रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया था। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस गीत को उनके उपन्यास 'आनंदमठ' (1882) में शामिल किया गया था और यह गीत स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। आजाद भारत में वंदे मातरम् को 24 जनवरी...