एक कोना भर बुढ़ापा
० श्याम कुमार कोलारे ० शहर से लौटते हुए कदम खुद-ब-खुद उस रास्ते की ओर मुड़ गए, जहाँ कभी मेरी ज़िंदगी की सबसे कीमती सीखें मिला करती थीं। वो पुराना सा घर, जिसके आँगन में खेलते हुए मैंने बचपन जिया था। वहीं खाट पर बैठा एक बूढ़ा चेहरा, जो कभी मेरी हर जिज्ञासा का जवाब होता था—आज एक थकी हुई परछाई बन गया था। "बाबा!" मैंने पुकारा। धूप से झुलसी झुर्रियों वाली आँखें हल्के से खुलीं और एक धीमी आवाज आई— "कौन? कान्हा है क्या?" "हाँ बाबा, मैं ही हूँ..."वो हल्की सी मुस्कराहट, जिसमें एक बनावटी जीवन्तता छिपी थी, चेहरे पर उभरी। "कैसे हो बाबा? बड़े कमजोर लग रहे हो…"बाबा ने मज़ाकिया लहजे में कहा,"कमजोर तो हूँ बेटा, उम्र तो 60 की है, पर लगता है जैसे 80 पार कर चुका हूँ…"मैं मुस्कुराया, पर उस मुस्कान में चिंता थी।"पर बाबा, सब तो ठीक है न? अच्छा घर है, सब साथ हैं, फिर क्या हुआ जो आप इतने बुझ से दिखते हैं? एक साल पहले जब मैं गया था, तो आप वही सजीले, ऊर्जावान बाबा थे... अब ये उदासी क्यों?"शायद मेरे सवाल ने उनके भीतर की चुप्पी को तोड़ दिया। उन्होंने मु...