School Bags : भारी बस्ते के बोझ तले दबता बचपन
० श्याम कुमार कोलारे ० शिक्षा का उद्देश्य केवल विषयों का ज्ञान देना नहीं है, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाना है। अगर वही शिक्षा बच्चों के स्वास्थ्य पर भार बन जाए तो वह कैसी शिक्षा है? क्या हम ऐसे भविष्य की कल्पना कर रहे हैं जहाँ बच्चे कुर्सियों पर झुक कर बैठने को मजबूर हों, पीठ दर्द से जूझ रहे हों और मानसिक तनाव में हों? बस्ते का यह वजन कोई अपवाद नहीं है, बल्कि एक सामान्य स्थिति है। यह कहानी हर उस छात्र की है जो रोज़ स्कूल का बोझ अपने कंधों पर ढोता है, जिसकी उम्र खेलने-कूदने की होती है। आज स्कूल शिक्षा का मंदिर कम और किताबों के बोझ का गोदाम अधिक बनते जा रहे हैं। अक्सर देखा गया है कि स्कूल बच्चों को महंगी और भारी पुस्तकों के सेट खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। ये किताबें किसी एक प्रकाशक से जुड़ी होती हैं, हर विषय के लिए अलग-अलग कार्यपुस्तिकाएं, प्रैक्टिस बुक्स और गाइड्स बच्चों के बैग का भार बढ़ाती हैं। इस पूरे परिदृश्य में अभिभावकों की स्थिति अत्यंत दयनीय होती है। वे जानते हैं कि यह बोझ बच्चों के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है, फिर भी वे चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते। विरोध कर...