School Bags : भारी बस्ते के बोझ तले दबता बचपन
शिक्षा का उद्देश्य केवल विषयों का ज्ञान देना नहीं है, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाना है। अगर वही शिक्षा बच्चों के स्वास्थ्य पर भार बन जाए तो वह कैसी शिक्षा है? क्या हम ऐसे भविष्य की कल्पना कर रहे हैं जहाँ बच्चे कुर्सियों पर झुक कर बैठने को मजबूर हों, पीठ दर्द से जूझ रहे हों और मानसिक तनाव में हों? बस्ते का यह वजन कोई अपवाद नहीं है, बल्कि एक सामान्य स्थिति है। यह कहानी हर उस छात्र की है जो रोज़ स्कूल का बोझ अपने कंधों पर ढोता है, जिसकी उम्र खेलने-कूदने की होती है। आज स्कूल शिक्षा का मंदिर कम और किताबों के बोझ का गोदाम अधिक बनते जा रहे हैं।
अक्सर देखा गया है कि स्कूल बच्चों को महंगी और भारी पुस्तकों के सेट खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। ये किताबें किसी एक प्रकाशक से जुड़ी होती हैं, हर विषय के लिए अलग-अलग कार्यपुस्तिकाएं, प्रैक्टिस बुक्स और गाइड्स बच्चों के बैग का भार बढ़ाती हैं। इस पूरे परिदृश्य में अभिभावकों की स्थिति अत्यंत दयनीय होती है। वे जानते हैं कि यह बोझ बच्चों के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है, फिर भी वे चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते। विरोध करने पर स्कूलों द्वारा बच्चों के साथ भेदभाव किए जाने का डर बना रहता है। यह चुप्पी धीरे-धीरे एक सामूहिक असंतोष में बदल रही है।
भारत सरकार द्वारा 2020 में जारी की गई नई शिक्षा नीति (NEP 2020) और राज्य सरकारों द्वारा बनाई गई स्कूल बैग नीतियों में इन समस्याओं को गंभीरता से लिया गया था। मध्य प्रदेश सरकार की नीति भी बच्चों के बैग का भार कम करने पर बल देती है। इसमें कक्षा-वार वजन सीमा तय की गई है, सप्ताह में एक दिन 'बैग-लेस डे' रखने का निर्देश दिया गया है, और शिक्षकों को यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है कि बच्चों को केवल आवश्यक सामग्री ही लानी पड़े। लेकिन ये नीतियां सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई हैं। ज़मीनी हकीकत यह है कि स्कूलों में इनका पालन नहीं हो रहा।
भारत सरकार द्वारा 2020 में जारी की गई नई शिक्षा नीति (NEP 2020) और राज्य सरकारों द्वारा बनाई गई स्कूल बैग नीतियों में इन समस्याओं को गंभीरता से लिया गया था। मध्य प्रदेश सरकार की नीति भी बच्चों के बैग का भार कम करने पर बल देती है। इसमें कक्षा-वार वजन सीमा तय की गई है, सप्ताह में एक दिन 'बैग-लेस डे' रखने का निर्देश दिया गया है, और शिक्षकों को यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है कि बच्चों को केवल आवश्यक सामग्री ही लानी पड़े। लेकिन ये नीतियां सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई हैं। ज़मीनी हकीकत यह है कि स्कूलों में इनका पालन नहीं हो रहा।
जिम्मेदार अधिकारी निरीक्षण नहीं करते, स्कूल प्रबंधन जवाबदेह नहीं होता और अभिभावक चुपचाप यह सब सहते रहते हैं। क्या स्कूल ज्ञान दे रहे हैं या रीढ़ की हड्डी तोड़ रहे हैं? यह सवाल तब और गूंजने लगता है जब हम एक मासूम छात्र का भारी भरकम स्कूल बैग देखते हैं, जिसका वजन 7.35 किलोग्राम है—वह भी बिना लंच बॉक्स के। यह बच्चा महज छठवीं कक्षा में पढ़ता है। यह दृश्य न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह हमारे शिक्षा तंत्र पर गहरी चोट करता है। मध्य प्रदेश सरकार की स्कूल बैग नीति 2024-25 के अनुसार, कक्षा VI के लिए बैग का अधिकतम वजन 3.0 किलोग्राम निर्धारित है। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।
ऐसे में स्कूल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। स्कूल न केवल शिक्षा देने का केंद्र है, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास का आधार भी है। एक ज़िम्मेदार संस्थान के रूप में स्कूल का दायित्व बनता है कि वह नीतियों का पालन सुनिश्चित करे, किताबों की अनावश्यक सूची से बचाए, और छात्रों के स्वास्थ्य की प्राथमिकता बनाए रखे। शिक्षकों को चाहिए कि वे स्मार्ट योजना बनाएं जिससे हर दिन बच्चों को सभी किताबें लाने की जरूरत न हो। साथ ही स्कूल प्रबंधन को चाहिए कि बैग का वजन नियमित रूप से जांचे और इस पर रिपोर्टिंग की जाए। यदि कोई छात्र निर्धारित वजन से अधिक बोझ लेकर आ रहा है, तो उस पर संज्ञान लिया जाना चाहिए।
यह वक्त है जब सरकार को नीतियों के अमल पर ध्यान देना होगा। शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन को ज़िम्मेदार ठहराना होगा। आवश्यक हो तो स्कूलों को समय-समय पर निरीक्षण के लिए बाध्य किया जाए और निर्धारित सीमा से अधिक वजन वाले बैग पाए जाने पर सख्त कार्यवाही की जाए। साथ ही, डिजिटल शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जाए ताकि बच्चों को हर विषय की किताब अपने बैग में ना ढोनी पड़े। लाइब्रेरी आधारित शिक्षण प्रणाली को बढ़ावा देना होगा, जहाँ किताबें स्कूल में उपलब्ध हों और बच्चा आवश्यकता अनुसार उपयोग करे। शिक्षक अपने पाठ्यक्रम की योजना इस तरह बनाएं कि बच्चों को हर दिन सारी किताबें लाने की आवश्यकता न हो। साथ ही स्कूल बैग का सप्ताहिक वजन जांचने की व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।
यह एक छोटी सी शुरुआत हो सकती है, लेकिन इसका असर बहुत गहरा होगा। बच्चों को एक ऐसा वातावरण मिलेगा जिसमें वे खुलकर सीख सकेंगे, बिना किसी शारीरिक बोझ के। यह पहल न केवल बच्चों को स्वस्थ रखेगी, बल्कि शिक्षा को उनके लिए एक सुखद अनुभव बना देगी। आज की तस्वीर 7.35 किलोग्राम का बैग उठाए एक छात्र की हमें आईना दिखाती है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस दृश्य को सामान्य न मानें। यह हमारे भविष्य का प्रश्न है। सवाल केवल एक बैग का नहीं, एक पूरी पीढ़ी के स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास का है। अब समय आ गया है कि हम मिलकर आवाज़ उठाएं। सरकार, स्कूल प्रशासन और अभिभावक सभी को एक मंच पर आना होगा। बच्चों के कंधों से यह बोझ हटाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। शिक्षा को बोझ नहीं, जीवन का प्रकाश बनाएं।
ऐसे में स्कूल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। स्कूल न केवल शिक्षा देने का केंद्र है, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास का आधार भी है। एक ज़िम्मेदार संस्थान के रूप में स्कूल का दायित्व बनता है कि वह नीतियों का पालन सुनिश्चित करे, किताबों की अनावश्यक सूची से बचाए, और छात्रों के स्वास्थ्य की प्राथमिकता बनाए रखे। शिक्षकों को चाहिए कि वे स्मार्ट योजना बनाएं जिससे हर दिन बच्चों को सभी किताबें लाने की जरूरत न हो। साथ ही स्कूल प्रबंधन को चाहिए कि बैग का वजन नियमित रूप से जांचे और इस पर रिपोर्टिंग की जाए। यदि कोई छात्र निर्धारित वजन से अधिक बोझ लेकर आ रहा है, तो उस पर संज्ञान लिया जाना चाहिए।
यह वक्त है जब सरकार को नीतियों के अमल पर ध्यान देना होगा। शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन को ज़िम्मेदार ठहराना होगा। आवश्यक हो तो स्कूलों को समय-समय पर निरीक्षण के लिए बाध्य किया जाए और निर्धारित सीमा से अधिक वजन वाले बैग पाए जाने पर सख्त कार्यवाही की जाए। साथ ही, डिजिटल शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जाए ताकि बच्चों को हर विषय की किताब अपने बैग में ना ढोनी पड़े। लाइब्रेरी आधारित शिक्षण प्रणाली को बढ़ावा देना होगा, जहाँ किताबें स्कूल में उपलब्ध हों और बच्चा आवश्यकता अनुसार उपयोग करे। शिक्षक अपने पाठ्यक्रम की योजना इस तरह बनाएं कि बच्चों को हर दिन सारी किताबें लाने की आवश्यकता न हो। साथ ही स्कूल बैग का सप्ताहिक वजन जांचने की व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।
यह एक छोटी सी शुरुआत हो सकती है, लेकिन इसका असर बहुत गहरा होगा। बच्चों को एक ऐसा वातावरण मिलेगा जिसमें वे खुलकर सीख सकेंगे, बिना किसी शारीरिक बोझ के। यह पहल न केवल बच्चों को स्वस्थ रखेगी, बल्कि शिक्षा को उनके लिए एक सुखद अनुभव बना देगी। आज की तस्वीर 7.35 किलोग्राम का बैग उठाए एक छात्र की हमें आईना दिखाती है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस दृश्य को सामान्य न मानें। यह हमारे भविष्य का प्रश्न है। सवाल केवल एक बैग का नहीं, एक पूरी पीढ़ी के स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास का है। अब समय आ गया है कि हम मिलकर आवाज़ उठाएं। सरकार, स्कूल प्रशासन और अभिभावक सभी को एक मंच पर आना होगा। बच्चों के कंधों से यह बोझ हटाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। शिक्षा को बोझ नहीं, जीवन का प्रकाश बनाएं।

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