जिस विचारधारा के लोगों ने आजादी के आंदोलन में कभी वंदे मातरम उद्घोष नहीं किया,झूठे दावे करने से बाज आएं : अजय खरे
० आशा पटेल ०
रीवा। समता सम्पर्क अभियान के राष्ट्रीय संयोजक लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने कहा कि वंदे मातरम राष्ट्रीय गीत को लेकर इधर मोदी सरकार के द्वारा जनसाधारण को गुमराह करने की कोशिश अत्यंत आपत्तिजनक और निंदनीय है। यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के साथ क्रूर मजाक है। खरे ने कहा कि वंदे मातरम गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में ही राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनी पहचान बना ली थी। हर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वंदे मातरम गीत गाने में फक्र महसूस करता आया।
वंदेमातरम्’ को जब मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम विरोधी बताया था तो इस पर 6 अप्रैल 1938 को पंडित नेहरू ने जिन्ना को लिखे लंबे पत्र में कहा- ‘वंदेमातरम गीत भारतीय राष्ट्रवाद के साथ पिछले 30 साल से अधिक समय से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसके साथ अनगिनत बलिदान और भावनाएं जुड़ी हुई हैं। लोकप्रिय गीत किसी आदेश से पैदा नहीं होते और न ही उन्हें जबरन थोपा जा सकता है। वे जनभावनाओं से उपजते हैं।
रीवा। समता सम्पर्क अभियान के राष्ट्रीय संयोजक लोकतंत्र सेनानी अजय खरे ने कहा कि वंदे मातरम राष्ट्रीय गीत को लेकर इधर मोदी सरकार के द्वारा जनसाधारण को गुमराह करने की कोशिश अत्यंत आपत्तिजनक और निंदनीय है। यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के साथ क्रूर मजाक है। खरे ने कहा कि वंदे मातरम गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में ही राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनी पहचान बना ली थी। हर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वंदे मातरम गीत गाने में फक्र महसूस करता आया।
जबकि अंग्रेजी हुकूमत वंदे मातरम बोलने वाले को स्वतंत्रता आंदोलन का पक्षधर मानते हुए प्रताड़ित करती थी। इसके बावजूद बहुत सारे लोग निर्भय होकर बेंतों की सजा के दौरान भी वंदे मातरम बोलते थे। वंदे मातरम' पहली बार 1896 में कलकत्ता (कोलकाता) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था, जिसे रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया था। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस गीत को उनके उपन्यास 'आनंदमठ' (1882) में शामिल किया गया था और यह गीत स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। आजाद भारत में वंदे मातरम् को 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया।
वहीं रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा रचित जन गण मन को राष्ट्रीय गान का दर्जा मिला। खरे ने कहा कि इधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा संसद में वंदेमातरम गीत के बारे मेंझूठ फैलाना बहुत गलत संदेश है। जिस विचारधारा के लोगों ने आजादी के आंदोलन में कभी वंदे मातरम उद्घोष नहीं किया , आज झूठे दावे करने से बाज आएं। श्री खरे ने कहा कि आजादी के आंदोलन के दौर में मोहम्मद अली जिन्ना जैसे लोग भी थे जिन्होंने वंदे मातरम को मुस्लिम विरोधी बताने की कोशिश की।
लेकिन तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा ने इस बात को लेकर मोहम्मद अली जिन्ना का कभी विरोध नहीं किया और न ही खुद वंदे मातरम का उद्घोष किया। उस समय तो सावरकर के द्वि राष्ट्रवाद सिद्धांत को प्रभावी बनाने के लिए इस तरह के संगठन जिन्ना के साथ समझौता किए हुए थे। यहां तक उनके साथ मिलकर सरकार चला रहे थे। इधर मोदी शासन काल के दौरान 2015 में भी जम्मू और कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की गठबंधन सरकार लगभग साढ़े तीन साल तक चली। इसके पहले भाजपा इसी पीडीएफ को आतंकवादी संगठन बताती थी।
अब वही लोग वंदे मातरम को लेकर सबसे अधिक देशभक्ति का दिखावा और बड़बोलापन दिखा रहे हैं जिन्होंने देश के बंटवारे के लिए सावरकर के द्वि-राष्ट्रवाद सिद्धान्त को मानते हुए देश के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन का माहौल निर्मित किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी प्रातःकालीन शाखा में 'नमस्ते सदा वत्सले' की जगह वन्देमातरम का गायन कभी नहीं किया, जबकि ऐसा करने से उन्हें किसने रोका है? इन लोगों ने लंबे समय तक राष्ट्रगान जन गण मन और राष्ट्रीय ध्वज को भी अपमानित किया।
भारतीय संविधान इन्हें आज भी स्वीकार नहीं है। इधर इतिहास जानने के लिए महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और देश की आजादी के दिन 15 अगस्त 1947 से लेकर 27 मई 1964 तक देश के पहले प्रधानमंत्री रहे पंडित जवाहरलाल नेहरू के द्वारा आजादी के आंदोलन के दौरान मोहम्मद अली जिन्ना को लिखे पत्र से साफ जाहिर हो जाएगा कि वंदे मातरम के बारे में उनका क्या रुख था।
वंदेमातरम्’ को जब मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम विरोधी बताया था तो इस पर 6 अप्रैल 1938 को पंडित नेहरू ने जिन्ना को लिखे लंबे पत्र में कहा- ‘वंदेमातरम गीत भारतीय राष्ट्रवाद के साथ पिछले 30 साल से अधिक समय से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसके साथ अनगिनत बलिदान और भावनाएं जुड़ी हुई हैं। लोकप्रिय गीत किसी आदेश से पैदा नहीं होते और न ही उन्हें जबरन थोपा जा सकता है। वे जनभावनाओं से उपजते हैं।
पिछले 30 साल से अधिक समय में ऐसा कभी नहीं माना गया कि ‘वंदे मातरम्’ गीत में कोई सांप्रदायिक भाव छुपा हुआ है। और इसे हमेशा से भारत की प्रशंसा में देशभक्ति का गीत माना गया है। खरे ने कहा कि जिम्मेदार पद पर बैठकर संसद में गैर जिम्मेदाराना रवैया देश की जनता के साथ अत्यंत आपत्तिजनक बात और इतिहास के साथ क्रूर खिलवाड़ है। इतिहास को मिटाने की कोशिश करने वाले का कभी कोई उपलब्धि दर्ज नहीं होती है। देश ने वंदे मातरम और जन गण मन को बराबरी से अपनाया है।
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