सतासीन सरकारें जो भी आई है समस्त उतराखंडियों की उपेक्षा ही कर रही है

उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण की घोषणा मुख्यमंत्री द्वारा किए जाने का हार्दिक अभिनंदन, बीस वर्ष का समय व्यतीत हो चुका है लेकिन राज्य की स्थापना के पश्चात भी उत्तराखण्ड का जनमानस यह नहीं समझ पाया है कि आखिर राज्य की स्थाई राजधानी कहां है। राज्य प्राति के लिए जिन लोगों ने संघर्ष किया अपना बलिदान किया आज ऐसा लगता है राज्य की सतासीन सरकारें जो भी आई है समस्त उतराखंडियों की उपेक्षा ही कर रही है।



गैरसैंण ही क्यों? बीस वर्ष पहले गैरसैंण मात्र एक खाली भू भाग था। लेकिन उस समय के बिचारकों और प्रबुद्ध जनों ने यह निर्णय लिया था कि यह स्थान उत्तराखण्ड के सभी तेरह जनपदों का केंद्र है। राजधानी बनने से सभी जनपदों के संपर्क मार्ग बनेंगे, और "जहां राह है वहां चाह है" के आधार पर पर्वतीय राज्य का विकास होगा। किंतु शासन के पांव देहरादून में रुके और अंगद के पैर की तरह जम गये।  अब्ल तो प्रदेश की नींव जहां केंद्र शासित होना था हुआ नहीं।बाद में पिछड़े प्रदेश की भिक्षा भी नहीं मिली। बर्तमान में राज्य सरकार एक राजधानी का व्यय बाहन नहीं कर पा रही है फिर दूसरी खंडाला जैसी अव्यवस्थित जगह पर राजमहल बना पायेगी।  इतने बर्षो में यदि गैरसैंण का विकास थोड़े कर लिया होता तो विधानसभा  भवन से लेकर सारे विकास के कार्य यातायात, बिजली, पानी और आवासीय सुविधाएं जुटाई जा सकती थी।


देहरादून में इतनी गर्मी तो पड़ती नहीं है कि ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में हो, अच्छा होता कि देहरादून को शीतकालीन राजधानी का प्रस्ताव रखते। क्योंकि गैरसैंण शीतकाल में अति ठंडक भरा रहता है। ऐसा लगता है ब्रिटिश साम्राज्य की पुनरावृत्ति और पदचिन्हों पर हमें भी चलना शोभा देता है। किसी भी प्रदेश का विकास वहां के शासित वर्ग पर निर्भर करता है विकास होगा तो पलायन स्वत: रूकेगा। पर्वतीय जिलों के मध्य में गैरसैंण  राजधानी का बनना उत्तराखण्ड का सम्पूर्ण विकास करना है। इसी आशा को लेकर राज्य प्राप्ति के लिए कई लोगों ने संघर्ष और प्राणों का बलिदान किया। 
     


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