शिकायत / कविता



डॉ• मुक्ता


मुझे मेरी मैं से
सदा शिकायत रहती 
मैं उसे सिर
उठाने नहीं देती
वह कहती–
ज़ुल्म करती हो मुझ पर
मुझे चैन की
सांस भी लेने नहीं देती


क्या कहूं
दांवपेच लगा
तेरा काम है
लड़ना-लड़वाना 
शांति तुझे पसंद कहां?
दूसरों पर हुक्म चलाना
तेरी आदत में शुमार
और नीचा दिखाने में
तुम्हें सुक़ून मिलता
है तेरा भी अजब फ़साना


पर मुझे नहीं पसंद
दूसरों को नीचा दिखाना
खुद को सर्वश्रेष्ठ समझ
उन पर ज़ोर आज़माना
व्यर्थ बोलना
शेख़ी बघारना
तेरी-मेरी सोच अलग
नहीं हमारी निभने वाली
तू ढूंढ दूजा कोई आशियां
यहां नहीं तेरी
दाल ग़लने वाली


मैं ख़ुद में मग्न
शांत भाव से
जीने वाली
नज़रें आकाश में
कदम ज़मीन से जुड़े
तेरे समान नहीं
दम्भ भरने वाली
तेरे-मेरे रास्ते अलग
नहीं तेरी बातें मुझे पसंद
तेरे झांसों में
अब मैं नहीं आने वाली
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