शिकायत / कविता



डॉ• मुक्ता


मुझे मेरी मैं से
सदा शिकायत रहती 
मैं उसे सिर
उठाने नहीं देती
वह कहती–
ज़ुल्म करती हो मुझ पर
मुझे चैन की
सांस भी लेने नहीं देती


क्या कहूं
दांवपेच लगा
तेरा काम है
लड़ना-लड़वाना 
शांति तुझे पसंद कहां?
दूसरों पर हुक्म चलाना
तेरी आदत में शुमार
और नीचा दिखाने में
तुम्हें सुक़ून मिलता
है तेरा भी अजब फ़साना


पर मुझे नहीं पसंद
दूसरों को नीचा दिखाना
खुद को सर्वश्रेष्ठ समझ
उन पर ज़ोर आज़माना
व्यर्थ बोलना
शेख़ी बघारना
तेरी-मेरी सोच अलग
नहीं हमारी निभने वाली
तू ढूंढ दूजा कोई आशियां
यहां नहीं तेरी
दाल ग़लने वाली


मैं ख़ुद में मग्न
शांत भाव से
जीने वाली
नज़रें आकाश में
कदम ज़मीन से जुड़े
तेरे समान नहीं
दम्भ भरने वाली
तेरे-मेरे रास्ते अलग
नहीं तेरी बातें मुझे पसंद
तेरे झांसों में
अब मैं नहीं आने वाली
●●●●


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

IFWJ के पत्रकारों का सिस्टम के विरुद्ध अनिश्चितकालीन धरना

ईद मिलन एवं सैफी सम्मान समारोह में दिखी एकता की मिसाल,संस्थाओं को किया गया सम्मानित

ईद मिलन एवं सैफी सम्मान समारोह 5 अप्रैल को दिल्ली में

स्वर्ण जयंती पर ‘उत्कर्ष’ अनुशासन, शिष्टाचार और उत्कृष्टता का संगम

फोर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट ने सशक्त नारियों में सिलाई मशीन वितरित की

उत्तराखंडी फिल्म “कंडाली” का पोस्टर विमोचन समारोह दिल्ली में होगा आयोजित

असंगठित श्रमिकों के अधिकारों पर राष्ट्रीय मंथन,सामाजिक सुरक्षा को लेकर उठी आवाज

जयपुर बाल महोत्सव में 15 अप्रैल तक कर सकते है फ्री रजिस्ट्रेशन

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार के विरोध में IFWJ का ‘हल्ला बोल’ धरना

30+ स्टार्टअप्स,एक विज़न : हेल्थ एक्सचेंज 2026 से हेल्थ इनोवेशन को नई दिशा