कविता // ईंट की भट्टियाँ


निवेदिता सिन्हा


भावनाओं का समंदर जब अंदर उमड़ता है၊
घर की हर ईट को देखकर दिल दहलता है। 
न जाने इसके लाल रंग में,
किस मासूम का खून लगा है?
जो हरदम ईंट की चिमनियों से धूआँ बन उड़ता है।
आज फिर कोई गरीबी से मजबूर
आयी इन भट्टियाँ मे बनकर मजदूर। 
सह न सकी जो अपने बाबा की बीमारी
झेल न सकी, अपने छोटे भाई की भूख
भूल गयी, अपने माँ की मौत 
जिसे ,उसने इन्ही भट्टियों मे देखा जलकर होते राख ।
फिर होगा उसका शोषण, 
दुश्मन बन जायेगा ,उसका अपना ही तन၊
करती हैं इनकार, 
तो अगले ही पल
इन भट्टियों मे बिखरी होगी उसकी राख
बाबा का बीमार चेहरा, भाई की भूख
याद कर भूल जायेगी वोअपना दुख၊
पर अब क्या होगा उसका?
जो उसके गर्भ में है पल रहा၊
माँ बन, वह आकाश की ओर देख मुस्कुरायी၊
देख बेटी का चेहरा, उसका गम हो गया और भी गहरा၊
अगले ही पल उसे गोद में उठाया।
फिर अपने ही हाथों भट्टी में लिटाया
उसे देखते बनकर राख, करती वह "अट्टहास"!
अगले ही पल अपनी मजबूरी पर रोती,
फिर सोचती, आज बचा लिया उसने अपनी बेटी को၊
इस मौत के पिंजरे से बननेवाला एक शोषित पात्र၊


 


 


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