अकेला खड़ा रह गया अस्तित्व की जंग लड़ता भंवरिया कालेट

० अशोक चतुर्वेदी ० 
जयपुरः जवाहर कला केंद्र की पाक्षिक नाट्य योजना के तहत ‘भंवरिया कालेट’ नाटक का मंचन हुआ। नाट्य निर्देशक सिकंदर खान के निर्देशन में युवा रंगकर्मियों ने मिरासी समुदाय की व्यथा जाहिर की । मंच पर लोक संगीत ने रिसाइकिल आर्ट फाॅर्म पर आधारित नाटक को खास बनाया। सिर से मां का साया उठ चुका है, पिता का जीवन समाज के प्रभावशाली लोगों के अहम की भेंट चढ़ चुका है। जो रियासतकाल में नाच-गाना कर गुजर बसर करते थे उनके सामने अस्तित्व का संकट खड़ा है। यह कहानी है भंवरिया कालेट और उसके छोटे भाई जफरिया की। अपनी गिरवी जमीन को छुडाने और दो जून की रोटी की जुगत में दोनों भाई कबाड़ बीनने लगे।

कबाड़ से हाथ आई कमाई से जब काम न चलता तो भंवरिया इधर-उधर से जरूरी सामान भी उठा लाता। इसी कशमकश में भंवरिया किसी तस्कर की अटैची ले आता है। इकबाल जो तस्कर के लिए काम करता है जफरिया का एक्सिडेंट कर उसे घर लाता है। इस सांत्वना के सहारे वह अटैची पाना चाहता है। धीरे-धीरे जफरिया और इकबाल मानवता की डोर से बंध जाते हैं। मूक-बधिर जफरिया को तांबा-पीतल सोने सा प्यारा लगता है, वह अटैची में पड़ी वस्तु जो विस्फोटक है, पर हथौड़ा मार बैठता है। धमाके की चपेट में आने से उसकी मौत हो जाती है। जफरिया का बदला लेने के लिए इकबाल तस्कर को भी मौत के घाट उतार देता है। अंत में बचता है भंवरिया, जो जन्म से संघर्ष की राह पर है और अभी भी कुछ मार्मिक सवाल लिए समाज की ओर मुंह कर खड़ा है।

इस मार्मिक नाटक की विषयवस्तु की गहराई का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देशभर से इस नाटक का चयन एशियन यूथ थिएटर फेस्टिवल के लिए हुआ है। सिकंदर खान खुद मिरासी समुदाय से आते हैं, समुदाय की पीड़ा को शब्दों में गढ़ने के साथ ही उन्होंने नाट्य निर्देशन और भंवरिया कालेट का रोल भी बखूबी अदा किया। नाटक में मोईन खान व तितिक्षु राज ने क्रमशः जफरिया और इकबाल का रोल निभाया। अन्य कलाकारों में महबूब, मनीषा शेखावत, अपूर्वा, गौरव, ईशांत, दशरथ बारहठ मौजूद रहे। राहुल जाॅंगिड़ की प्रकाश परिकल्पना रही जबकि अनिमेष आचार्य ने संगीत संयोजन संभाला।

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