नाटक काबुलीवाला का हुआ मंचन- कठपुतलियों ने दर्शाया कहानी का मर्म

० अशोक चतुर्वेदी ० 
जयपुर: जवाहर कला केन्द्र की पहल नौनिहाल के तहत 'गुरुदेव' रवीन्द्र नाथ टैगोर की स्मृति में कठपुतली नाटक 'काबुलीवाला' का मंचन किया गया। वरिष्ठ नाट्य निर्देशक लईक हुसैन के निर्देशन में हुए नाटक में टैगोर की प्रसिद्ध कहानी 'काबुलीवाला' के मर्म को कठपुतलियों ने मंच पर जाहिर किया। रंगायन सभागार में जब यह नाटक खेला गया तो बच्चों ने खूब आनंद लिया वहीं हर उम्र के दर्शकों ने इसका लुत्फ उठाया।
मधुर आवाज में बैकग्राउंड में 'काबुलीवाला आया, सूखे मेवे लाया' गीत बजता है। रंगबिरंगी पोशाकों में सजी कठपुतलियां अफगानी काबुलीवाले का इस्तकबाल करती हैं। मासूम 'मिनी' काबुलीवाले को आवाज देकर रोकती है, वह उससे मुखातिब होना चाहती है, पर उसे डर है कि काबुलीवाला उसे उठा ना ले। पिता के समझाने पर मिनी और काबुलीवाले की दोस्ती हो जाती है। मिनी की मां संदेह कर काबुलीवाले को धमकाकर भगा देती है। 

मिनी और काबुलीवाला नम आंखों के साथ एक दूसरे से दूर होते है। यकायक कहानी में मोड़ आता है। उधारी के पैसे लेने पहुंचे काबुलीवाले से अनजाने में सेठ की हत्या हो जाती है। 10 साल बाद वह वापस आता है, शादीशुदा मिनी की विदाई से पहले उससे मिलता है। दोनों के पुराने दिनों की यादें ताजा हो जाती है। कठपुतलियों ने पूरी जीवंतता के साथ कहानी को साकार किया। कभी हंसाने और कभी रुलाने के साथ कठपुतलियों ने दर्शकों में मिलेझुले भावों को जागृत किया।

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