मेदांता ने वर्ल्ड ओबेसिटी डे पर बढ़ते मोटापे और उसके स्वास्थ्य प्रभावों पर चर्चा के लिए आयोजन किया

० योगेश भट्ट ० 
गुरुग्राम : वर्ल्ड ओबेसिटी डे के अवसर पर मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल और न्यूजवीक की ओर से देश के सर्वश्रेष्ठ निजी अस्पताल का खिताब से सम्मानित मेदांता - द मेडिसिटी ने इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के सहयोग से मोटापे और इसके गंभीर स्वास्थ्य प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए एक मल्टी-स्टेकहोल्डर कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम में मेदांता गुरुग्राम के प्रमुख चिकित्सा विशेषज्ञ शामिल हुए, जिनमें गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और लिवर ट्रांसप्लांट की सीनियर डायरेक्टर और एच.ओ.डी. और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. नीलम मोहन, कार्डियक केयर के क्लीनिकल और प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी के वाइस प्रेसिडेंट डॉ. संजय मित्तल, एंडोक्राइनोलॉजी और डायबिटीज की एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. परजीत कौर और इंटरनल मेडिसिन की सीनियर डायरेक्टर डॉ. सुशीला कटारिया शामिल थीं।

 मोटापा किस तरह कई जानलेवा बीमारियों की वजह बनता है। इनमें हृदय संबंधी विकार, डायबिटीज, लिवर की जटिलताएं और अन्य कम ज्ञात संबंध शामिल हैं। मेदांता के अध्यक्ष और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ नरेश त्रेहान, आई.एम.ए. हरियाणा के अध्यक्ष डॉ महावीर जैन और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, हरियाणा, के अध्यक्ष डॉ अजय अरोड़ा ने इस अवसर पर मोटापे के रिस्क फेक्टर, इस स्थिति से प्रभावित अंगों, इसकी रोकथाम और प्रबंधन पर प्रकाश डालने वाले पोस्टर का लॉन्च किया। यह पोस्टर रोगियों को जागरुक करने के लिए गाइड के रूप में कार्य करेगा। साथ ही, प्रिवेंटिव हेल्थकेयर और शीघ्र हस्तक्षेप के लिए जागरूकता को मजबूत करने के संदेश को रेखांकित करेगा।

मोटापा धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय संकट बन चुका है। इसकी वजह से डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी बीमारियों जैसे गंभीर स्वास्थ्य परिणाम हो रहे हैं। यह स्लीप एपनिया, गठिया, लिवर रोग और मानसिक स्वास्थ्य विकारों से भी जुड़ा है। भारत में 350 मिलियन लोग मोटापे से ग्रस्त हैं। 40 प्रतिशत महिलाएं और 12 प्रतिशत पुरुष पेट के मोटापे से ग्रस्त हैं। चुनौती इस बात की है कि यह सिर्फ अब वयस्कों की समस्या नहीं है। बच्चों में भी मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। बचपन में मोटापे का प्रचलन 8.4% हो चुका है, और 2030 तक दस में से एक भारतीय बच्चे के मोटापे से ग्रस्त होने की संभावना है।

 राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एन.एफ.एच.एस.) के अनुसार हरियाणा बुरी तरह प्रभावित राज्यों में से एक है, जहाँ मोटापे से ग्रस्त महिलाओं में 7-12% और मोटे पुरुषों में 5-11% की वृद्धि दर्ज की गई है। मोटापे से निपटने के लिए विशेषज्ञ एक समग्र दृष्टिकोण की पैरवी करते हैं। वे लंबी अवधि तक स्वास्थ्य और कल्याण के लिए जीवनशैली में स्थायी बदलाव पर जोर देते हैं। बचपन में मोटापे पर चौंकाने वाले तथ्यों पर प्रकाश डालते हुए, डॉ. नीलम मोहन, सीनियर डायरेक्टर और एच.ओ.डी, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, लिवर ट्रांसप्लांट, मेदांता, गुरुग्राम और नेशनल प्रेसिडेंट इलेक्ट इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, ने कहा, “मोटापा केवल एक कॉस्मेटिक मुद्दा नहीं है - यह एक गंभीर आपदा बन चुका है।

 यह कई अंगों को बुरी तरह प्रभावित करता है, जिसमें से लीवर एक प्रमुख अंग है। इसमें नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिसीज (NAFLD) के साथ लंबी अवधि के प्रभाव सामने आ रहे हैं। हमने मेदांता में हाल ही में 150 मोटे बच्चों (जिनमें से तीन-चौथाई 12-18 वर्ष की आयु के थे) पर अध्ययन किया और 90% मामलों में फैटी लीवर पाया गया। इसमें 42% में लिवर एंजाइम का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया। बच्चों के एक छोटे से हिस्से में लिवर बायोप्सी की गई, जिसमें फाइब्रोसिस का पता चला - कुछ की उम्र महज 10 साल थी। केवल 22% ने मोटापे के उपचार के लिए संपर्क किया था, जबकि कई लोगों में पेट दर्द या असामान्य लिवर एंजाइम जैसे लक्षण पाए गए।

 यह दिखाता है कि बीमारी को समय पर पहचानना, जीवनशैली में सुधार करना और जागरूकता बढ़ाना कितना जरूरी है। इसमें खासतौर पर माता-पिता की अहम भूमिका होती है, क्योंकि वे बचपन से ही बच्चों में अच्छी आदतें डाल सकते हैं। हमारे प्रधानमंत्री की हाल ही में हुई ‘मन की बात’ के अनुसार, मोटापे से निपटना बहुत जरूरी है ताकि देश का भविष्य, खासकर बच्चों का स्वास्थ्य, बेहतर बनाया जा सके।“मोटापे और हृदय रोगों के बीच संबंध पर बात करते हुए मेदांता, गुरुग्राम के क्लीनिकल और प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी के वाइस चेयरमैन डॉ. संजय मित्तल ने कहा, “मोटापे को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, दिल के दौरे, स्ट्रोक और अन्य जटिलताओं के जोखिम को बढ़ा देता है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एन.एफ.एच.एस.) के आंकड़े भारत में मोटापे में तेज वृद्धि दर्शाते हैं। पुरुषों में, प्रचलन 9.3% (एन.एफ.एच.एस-3, 2005-06) से 2.5-गुना बढ़कर 22.9% (एन.एफ.एच.एस-5, 2019-21) हो गया है। महिलाओं में यह 12.6% से दोगुना होकर 24.0% हो गया है। [4] पुरुषों की तुलना में महिलाएं मोटापे से अधिक ग्रस्त हैं; हालांकि, शरीर में फैट का वितरण हृदय रोग के जोखिम को निर्धारित करने में एक महत्वपूर्ण कारक है। इसके अलावा, यह स्थिति न केवल हृदय रोग की घटनाओं को बढ़ाती है, बल्कि उपचार के परिणामों को भी खराब करती है, जिससे बाईपास सर्जरी जैसी प्रक्रियाओं के बाद मृत्यु दर और रीकरेंस रेट बढ़ जाता है। मोटापा हमारी खानपान और व्यायाम की आदतों से जुड़ा होता है, लेकिन यह दिल की बीमारियों के खतरे को पहचानने और उसे नियंत्रित करने का एक अहम संकेत भी देता है।“

मेदांता, गुरुग्राम में एंडोक्राइनोलॉजी और डायबिटीज की एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. परजीत कौर ने मेटाबॉलिज्म संबंधी प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए बताया, “मोटापा टाइप-2 डायबिटीज का एक प्रमुख कारण है। यह स्वस्थ वजन वाले लोगों की तुलना में मोटापे से ग्रस्त लोगों के जोखिम को लगभग छह गुना बढ़ा देता है। एन.एफ.एच.एस-5 के आंकड़ों का उपयोग करते हुए हाल ही में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि पुरुषों में पेट का मोटापा 51.77% और महिलाओं में 57.91% है, जिसका डायबिटीज से गहरा संबंध है। एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि एक दशक में युवा भारतीयों में टाइप-2 डायबिटीज का प्रचलन 4.5% से बढ़कर 7.8% हो गया है, जिसका मुख्य कारण मोटापा ही है।

 उल्लेखनीय रूप से मोटापे को केवल बी.एम.आई. से ही नहीं बल्कि कमर की परिधि और शरीर की संरचना से भी परिभाषित किया जाता है। यहां तक ​​कि 23 से अधिक बी.एम.आई. वाले और डायबिटीज, उच्च कोलेस्ट्रॉल या उच्च रक्तचाप जैसी मेटाबॉलिज्म संबंधी गड़बड़ी वाले व्यक्ति भी चिकित्सकीय रूप से मोटे माने जाते हैं। मोटापे को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करना डायबिटीज और हृदय रोगों को रोकने की कुंजी है।“
मेदांता, गुरुग्राम में इंटरनल मेडिसिन की निदेशक डॉ. सुशीला कटारिया ने कहा, “मोटापा सिर्फ व्यक्ति के आकार को प्रभावित नहीं करता बल्कि कई स्तरों पर प्रभाव डालता है। यह मोबिलिटी, मेटाबॉलिज्म और समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। यह एक व्यापक पैनसिस्टमेटिक समस्या है, जो एंग्जायटी, डिप्रेशन, स्लीप एपनिया, फैटी लीवर, उच्च रक्तचाप, डायबिटीज और पीसीओडी जैसी स्थितियों की जटिलता को बढ़ाता है। मोटापे से निपटना सिर्फ एक व्यक्तिगत चिंता नहीं है, बल्कि लंबी अवधि तक स्वस्थ रहने के लिए एक सामाजिक और राष्ट्रीय प्राथमिकता है।“

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