मिर्ज़ा मरियम जमीला : झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों के लिए ज्ञान की ज्योति
० संवाददाता द्वारा ०
औरंगाबाद : मिर्ज़ा मरियम जमीला एक ऐसी युवती जिसने कम उम्र में ही अपने समुदाय में बदलाव लाने का संकल्प लिया। मिर्ज़ा मरियम जमीला, औरंगाबाद, महाराष्ट्र की 10वीं कक्षा की छात्रा हैं, जिन्होंने झुग्गी-झोपड़ि और मजदूर वर्ग के बच्चों के लिए "मोहल्ला बाल पुस्तकालय" अभियान शुरू किया।कोविड-19 महामारी के दौरान लगे लॉकडाउन के समय, जब स्कूल बंद थे और बच्चे घरों में थे, मरियम ने महसूस किया कि गरीब परिवारों के बच्चों की शिक्षा पर बुरा असर पड़ रहा है। उनके पास न तो ऑनलाइन कक्षाओं के लिए साधन थे और न ही किताबें। इसी चिंता ने मरियम को कुछ करने के लिए प्रेरित किया।
जब वह 7वीं कक्षा में पढ़ रही थी, तब उन्होंने अपने घर के पास एक छोटे से कमरे में कुछ किताबों के साथ एक पुस्तकालय शुरू किया। मरियम की पहल को जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली। बच्चे उत्सुकता से पुस्तकालय में आने लगे और उनकी संख्या तेजी से बढ़ने लगी। मरियम ने अन्य युवाओं को भी इस अभियान में शामिल किया और धीरे-धीरे औरंगाबाद शहर में 36 बाल पुस्तकालयों का एक नेटवर्क स्थापित किया। आज, उनके पुस्तकालयों में 18,000 से अधिक किताबें हैं और 25,000 से अधिक बच्चे उनसे जुड़े हुए हैं। मरियम के लिए यह सफर आसान नहीं था। उन्हें संसाधनों की कमी, समाज के कुछ वर्गों के विरोध और अपनी पढ़ाई के साथ-साथ पुस्तकालयों के प्रबंधन की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनके दृढ़ संकल्प और समर्पण ने उन्हें हर बाधा को पार करने में मदद की।
मरियम ने न केवल बच्चों को किताबें उपलब्ध कराईं, बल्कि उन्हें पढ़ने और सीखने के लिए भी प्रेरित किया। उन्होंने पुस्तकालयों में विभिन्न शैक्षिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन किया, जिससे बच्चों का समग्र विकास हुआ। मरियम मिर्ज़ा जमीला की कहानी सभी के लिए एक प्रेरणा है। उन्होंने साबित कर दिया कि उम्र कोई बाधा नहीं है और दृढ़ संकल्प और समर्पण से समाज में बड़ा बदलाव ला सकता है। मरियम मिर्ज़ा जमीला जैसी साहसी और प्रेरक महिलाएं न केवल अपने समुदाय के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए एक प्रेरणा हैं।
औरंगाबाद : मिर्ज़ा मरियम जमीला एक ऐसी युवती जिसने कम उम्र में ही अपने समुदाय में बदलाव लाने का संकल्प लिया। मिर्ज़ा मरियम जमीला, औरंगाबाद, महाराष्ट्र की 10वीं कक्षा की छात्रा हैं, जिन्होंने झुग्गी-झोपड़ि और मजदूर वर्ग के बच्चों के लिए "मोहल्ला बाल पुस्तकालय" अभियान शुरू किया।कोविड-19 महामारी के दौरान लगे लॉकडाउन के समय, जब स्कूल बंद थे और बच्चे घरों में थे, मरियम ने महसूस किया कि गरीब परिवारों के बच्चों की शिक्षा पर बुरा असर पड़ रहा है। उनके पास न तो ऑनलाइन कक्षाओं के लिए साधन थे और न ही किताबें। इसी चिंता ने मरियम को कुछ करने के लिए प्रेरित किया।
जब वह 7वीं कक्षा में पढ़ रही थी, तब उन्होंने अपने घर के पास एक छोटे से कमरे में कुछ किताबों के साथ एक पुस्तकालय शुरू किया। मरियम की पहल को जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली। बच्चे उत्सुकता से पुस्तकालय में आने लगे और उनकी संख्या तेजी से बढ़ने लगी। मरियम ने अन्य युवाओं को भी इस अभियान में शामिल किया और धीरे-धीरे औरंगाबाद शहर में 36 बाल पुस्तकालयों का एक नेटवर्क स्थापित किया। आज, उनके पुस्तकालयों में 18,000 से अधिक किताबें हैं और 25,000 से अधिक बच्चे उनसे जुड़े हुए हैं। मरियम के लिए यह सफर आसान नहीं था। उन्हें संसाधनों की कमी, समाज के कुछ वर्गों के विरोध और अपनी पढ़ाई के साथ-साथ पुस्तकालयों के प्रबंधन की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनके दृढ़ संकल्प और समर्पण ने उन्हें हर बाधा को पार करने में मदद की।
मरियम ने न केवल बच्चों को किताबें उपलब्ध कराईं, बल्कि उन्हें पढ़ने और सीखने के लिए भी प्रेरित किया। उन्होंने पुस्तकालयों में विभिन्न शैक्षिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन किया, जिससे बच्चों का समग्र विकास हुआ। मरियम मिर्ज़ा जमीला की कहानी सभी के लिए एक प्रेरणा है। उन्होंने साबित कर दिया कि उम्र कोई बाधा नहीं है और दृढ़ संकल्प और समर्पण से समाज में बड़ा बदलाव ला सकता है। मरियम मिर्ज़ा जमीला जैसी साहसी और प्रेरक महिलाएं न केवल अपने समुदाय के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए एक प्रेरणा हैं।
टिप्पणियाँ