DPDPA कानून गोपनीयता की रक्षा नहीं करता,बल्कि सरकार के हाथ में नियंत्रण केंद्रित करता है-निखिल डे

० आशा पटेल ० 
जयपुर। जयपुर में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून की धारा 44(3) के तहत सूचना का अधिकार (RTI) कानून में किए गए संशोधनों को तत्काल वापस लेने की माँग की गई। वक्ताओं ने ज़ोर देकर कहा कि ये संशोधन RTI कानून को कमजोर करते हैं और नागरिकों की जानकारी तक पहुँच के मौलिक अधिकार पर गंभीर चोट करते हैं। मजदूरी किसान शक्ति संगठन के संस्थापकों में से एक निखिल डे ने बताया कि RTI कानून की धारा 8(1)(j) में किया गया संशोधन, सभी निजी जानकारी को एकमुश्त छूट देता है, जो पहले सार्वजनिक गतिविधि या जनहित में जानकारी के खुलासे की अनुमति देता था। इसके अलावा, RTI की धारा 8(1) j से वह प्रावधान भी हटा दिया गया है जिसमें कहा गया था कि “जो जानकारी संसद या राज्य विधानसभा को नहीं रोकी जा सकती, उसे किसी भी व्यक्ति से नहीं रोका जाएगा।”
उन्होंने बताया कि इन अपवादों को हटाकर सरकार ने निजी डेटा पर एक पूर्ण छूट दे दी है, जिससे RTI के माध्यम से महत्वपूर्ण सरकारी रिकॉर्ड तक पहुँच को रोक दिया गया है। इससे पारदर्शिता को गहरा आघात पहुँचता है और जनता की अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने की क्षमता कमजोर होती है। उन्होंने बताया कि मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) और सूचना एवं रोजगार अधिकार अभियान राजस्थान ने सूचना का अधिकार (RTI) कानून को मजबूत करने में ऐतिहासिक योगदान दिया है। राजस्थान वह भूमि है, जहाँ से RTI आंदोलन की शुरुआत हुई। निखिल ने बताया कि MKSS ने गाँव-गाँव जाकर लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया और सरकारी पारदर्शिता की माँग को बुलंद किया। जन सुनवाइयों के माध्यम से भ्रष्टाचार को उजागर कर उन्होंने लोगों को सिखाया कि सूचना का अधिकार उनकी ताकत है।
सूचना एवं रोजगार अधिकार अभियान राजस्थान ने इस संघर्ष को और आगे बढ़ाया। इसने जन सूचना पोर्टल जैसे डिजिटल माध्यमों से सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी को जनता तक आसानी से पहुँचाने की माँग की। इन संगठनों ने मिलकर यह सुनिश्चित किया कि RTI न केवल एक कानून बने, बल्कि लोगों के हाथ में एक ऐसा हथियार बने, जिससे वे सरकार से जवाबदेही माँग सकें। दुर्भाग्य से केंद्र सरकार द्वारा आज RTI को कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं। हमारी माँग है कि इस कानून को और मजबूत किया जाए, ताकि लोकतंत्र की नींव बनी रहे प्रेस कॉन्फ़्रेंस का आयोजन मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस), सूचना एवं रोज़गार अधिकार अभियान, एवं राजस्थान के जन संगठनों की ओर से संयुक्त रूप से किया गया।

RTI की लिए आन्दोलन करने वाले एवं अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रमुख बातें रखी : सूचना के अधिकार के लिए हुए आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले एवं एनसीपीआरआई और एमकेएसएस के संस्थापकों में से एक निखिल डे ने कहा कि सार्वजनिक ऑडिट और सरकारी खर्च की निगरानी पूरी तरह से व्यक्तिगत विस्तृत जानकारी तक पहुंच पर निर्भर है। यह संशोधन सामूहिक निगरानी और सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया को खत्म कर देगा क्योंकि अब वह जानकारी ही उपलब्ध नहीं होगी। उन्होंने कहा कि RTI का उपयोग केवल शिकायत निवारण या भ्रष्टाचार के एक मामले के लिए नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी और सभी मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए होता है। RTI को संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि DPDP कानून वास्तव में गोपनीयता की रक्षा नहीं करता, बल्कि सरकार के हाथ में नियंत्रण केंद्रित करता है और नियामक ढांचा स्वतंत्र नहीं है।

पीयूसीएल की राष्ट्रीय अध्यक्षा एवं मानव अधिकार कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव ने कहा कि DPDP कानून एक दोधारी तलवार है — एक ओर यह RTI कानून में संशोधन कर जानकारी तक पहुँच को रोकता है, और दूसरी ओर यह सरकार के हाथ में डेटा संरक्षण बोर्ड के ज़रिए शक्ति केंद्रित करता है, जो 250 करोड़ तक का जुर्माना लगा सकता है। इससे RTI का इस्तेमाल करने वाले पत्रकारों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों पर डर का माहौल बनेगा। उन्होंने कहा कि जो मानवाधिकार संगठन फैक्ट फाइंडिंग करके पीड़ितों को मदद करते हैं अब उनके लिए इस कानून के आने के बाद खतरा उत्पन्न हो जाएगा और पीड़ित मदद से वंचित रह जायेंगे.

 पूर्व राज्य सूचना आयुक्त एवं बरिष्ट पत्रकार नारायण बारेठ ने कहा कि RTI कानून पहले ही निजता और पारदर्शिता के बीच संतुलन बनाकर चलता था। कई मामलों में आयोगों ने निजी जानकारी के खुलासे के आदेश दिए हैं — जैसे प्रतिनिधियों की शैक्षिक योग्यता, नीतिगत निर्णयों की प्रक्रिया, भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दे आदि। उन्होंने कहा कि 2019 में RTI संशोधनों और अब इस नए कानून के ज़रिए सूचना आयोग की स्वायत्तता को कमजोर किया गया है, और पत्रकारों को DPDP के तहत डाटा फिड्यूशियरी मानकर दंडित किया जा सकता है। उन्होंने आगे कहा कि RTI कानून में संशोधन करना वैसे ही जैसे आम आदमी से उसका अंगूठा छीनना हो.

सामाजिक कार्यकर्त्ता कमल कुमार ने कहा कि RTI की धारा 8(1)(j) ने निजी जानकारी के गैर-खुलासे से संबंधित छूट को लागू करने के लिए तीन-आयामी परीक्षण प्रदान किया था। DPDP कानून के ज़रिए निजी जानकारी के खुलासे पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना लोगों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में मौलिक अधिकार के रूप में बरकरार रखा है। उन्होंने ऋण डिफॉल्टरों, इलेक्टोरल बॉन्ड धारकों, और सरकारी अधिकारियों की संपत्ति जैसे उदाहरण दिए जहां निजी जानकारी तक पहुंच जनहित में बेहद जरूरी रही है। उन्होंने कहा कि DPDP कानून स्पष्ट रूप से सरकार और उसके करीबियों को पारदर्शिता और जवाबदेही से बचाने के लिए बनाया गया है।

सामाजिक कार्यकर्त्ता मुकेश निर्वासित ने कहा कि नागरिक शासन में प्राथमिक हितधारक है और उसके पास यह अधिकार होना चाहिए कि वह उस अंधकार को तोड़े जो भ्रष्ट और गैर-जिम्मेदार अधिकारियों को छुपा देता है। उन्होंने कहा कि विवादास्पद संशोधन RTI कानून को प्रभावहीन और बेकार बना देंगे क्योंकि अब सार्वजनिक हित में किए जाने वाले खुलासे ही रोके जाएंगे। DPDP कानून की धारा 44(3) और RTI कानून की धारा 8(1)(j) में संशोधन जनता की जानकारी तक पहुँच को बाधित करते हैं। RTI कानून से जुड़े महत्वपूर्ण अपवादों को हटाकर पारदर्शिता और जवाबदेही को कमजोर किया गया है।

 इससे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई, लोकतांत्रिक निगरानी, और जनता के अधिकारों को भारी नुकसान पहुँचता है। राजस्थान के विभिन्न जन संगठनों ने इस संयुक्त प्रेस वार्ता के माध्यम से संशोधन वापस लेने की माँग की है। यह साझा मंच सरकार से माँग करता है कि RTI कानून में किए गए इन जनविरोधी संशोधनों को तुरंत और बिना शर्त वापस लिया जाए, ताकि जनता का सूचना पर अधिकार और लोकतांत्रिक जवाबदेही की भावना सुरक्षित रह सके।

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