लोकतंत्र तथा मानवाधिकारों के पक्ष में आवाज बुलंद करने वाली "लैला कबीर" नहीं रहीं

० राजकुमार जैन ० 
नयी दिल्ली : इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, दिल्ली में 22 जुलाई 1971 को जॉर्ज फर्नांडिस के साथ लैला कबीर के विवाह समारोह में शामिल होने का मौका मुझे भी मिला था। निहायत ही सादे माहौल में, जॉर्ज साहब कुर्ता-धोती (नाकी पायजामा), माथे पर चंदन की बिंदियों की माला लगाए हुए, उन्होंने उस समय एक शपथ पत्र पढ़ते हुए कहा था—"मैं, जॉर्ज फर्नांडिस, सभी मित्रों के सामने यह शपथ लेता हूं कि मैं जीवन भर लैला के साथ प्यार और सच्चाई का रिश्ता निभाऊंगा।" और जो लोग उपस्थित थे, उनके हस्ताक्षर भी उस पत्र पर हुए थे। उस पर मेरे भी हस्ताक्षर हैं। मेरी लैला जी से कई बार बातचीत होती थी। वे बहुत ही अनुशासित, सीधी-सच्ची, साफगोई से बात करने में यकीन रखती थीं।

जॉर्ज अलग रहते थे, परंतु जब अंत में अचेतन अवस्था में चले गए, तब लैला जी ने उन्हें अपने घर पंचशील मार्ग पर लाकर, सब गिले-शिकवे भूल कर, पतिव्रता नारी के रूप में सालों उनकी देखभाल कर अपनी फर्ज अदायगी की थी। भारत के भूतपूर्व शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की अंग्रेजी में जीवनी लिखने वाले हुमायूं कबीर, जो कि खुद केंद्र में शिक्षा मंत्री भी रहे थे, उनकी वे बेटी थीं। एक केंद्रीय मंत्री की बेटी और एक की पत्नी, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे अल्तमश कबीर की बहन तथा इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी की आला दर्जे की पदाधिकारी, आपातकाल में अमेरिका प्रवास के समय वॉशिंगटन डीसी में संवाददाता सम्मेलन में आपातकाल का विरोध करते हुए, भारत में लोकतंत्र तथा मानवाधिकारों के पक्ष में आवाज बुलंद करते हुए, राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग की।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से शिक्षित होने के बावजूद किसी प्रकार का नखरा, अहंकार उनके स्वभाव में देखने को नहीं मिलता था। दिल्ली में आयोजित होने वाले समाजवादी कार्यक्रमों में भी यदाकदा वे शामिल होती थीं। मधु लिमए के देहांत के बाद भी वे कई बार उनकी पत्नी चंपा लिमए का कुशल-क्षेम जानने के लिए जाती थीं। उनकी एकमात्र संतान,पुत्र शांतनु है।

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