पुस्तक : "एकांतवास में ज़िंदगी" संवेदनशील यथार्थवाद की अवधारणा से मानवता और कुरूपता का यथार्थ दर्शन

□ समीक्षक : मनीषा खटाटे □ पुस्तक "एकांतवास में ज़िंदगी" □ लेखक : अशोक लव □ मूल्य : 180 रुपये □ द्वितीय संस्करण 2024 □ प्रकाशक : सर्व भाषा ट्रस्ट , राजा पुरी मेन रोड ,नयी दिल्ली ।

संवेदनशील यथार्थवाद (Sensitive Realism) को मानवीय भावजगत और यथार्थ को आत्मबोध और करुणाबोध की दृष्टि से परिभाषित किया जा सकता है। इस अवधारणा में साहित्यिक अभिव्यक्ति को संवेदनशील चेतना के स्वरूप में आकृतिबद्ध किया जाता है या जीवन की यथार्थ स्तिथियों को पीड़ा, द्वंद्व, वेदना, कुरूपता, आंतरिक संवेदनाओं, भावनात्मक अंतर्विरोधों , अच्छाई- बुराई के संदर्भ में कथावस्तु की संरचना में , मानवीय भावजगत के आधार पर विकसित किया जाता है। संवेदनशील यथार्थवाद में आत्मबोध के आयाम से यथार्थ को देखने की विशिष्टता और स्पष्टता रहती है तथा संवेदनशीलता और करुणाबोध की दृष्टि से यथार्थ का कठोरता की धार पर विश्लेषण और आकलन करके कथासंसार रचा जाता है। जीवन का यथार्थ खोजना हो तो मानवीय संवेदनाओं में खोजना चाहिए। यही आधार है संवेदनशील यथार्थ का।
अस्तित्ववाद (Existentialism) और यथार्थवाद (Realism) समकालीन कथात्मक साहित्य की प्रमुख आधार भूमि रही हैं।हिन्दी साहित्य में भी दोनों धाराओं का प्रभाव दिखता है।इसमें से यथार्थवाद सामाजिक यथार्थवाद (Social Realism) और जादुई यथार्थवाद (Magical Realism) के रूप में ज्यादातर लोकप्रिय विधा बन चुका है।प्रेमचंद से लेकर उदय प्रकाश तक यथार्थवाद के कई रूप विकसित होते हुए देखे हैं।परंतु अशोक लव जी ने 'एकांतवास में ज़िंदगी' लघुकथा संग्रह द्वारा मानवीय संवेदनाओं को सामाजिक,

 नैतिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रवादी आयाम में परिभाषित या अभिव्यक्त करने का सशक्त प्रयास करते हुए उसके संरचनात्मक स्वरूप को रचते हुए 'संवेदनशील यथार्थवाद' (Sensetive Realism) इस 'नई विधा' या साहित्यिक अवधारणा को लघुकथाओं के द्वारा जन्म दिया है। ज़िदगी के नग्न इस सत्य को उसके मूल स्वरूप में ही चित्रित किया गया है।मनुष्य का कर्म , व्यवहार और आचरण के रूप में प्रस्तुत होने के पहले मनुष्य भावजगत में उस आचरण (अच्छा या बुरा) को पूरा कर लेता है। स्थितियाँ कितनी भी बुरी क्यों न हों हम उन स्थितियों को भावात्मक रूप में कैसे जीते हैं या कैसे प्रतिसाद देते हैं, यह महत्वपूर्ण होता है।

 भावजगत और व्यवहार जगत की सच्चाईयों की दास्तां अशोक लव जी की 'एकांतवास में ज़िंदगी' की लघुकथाएँ प्रस्तुत करती हैं। ये पाठकों को अच्छाई और बुराई के पार सोचने के लिए मजबूर करती हैं। लघुकथा विधा के लिए यह एक नया प्रयोग है।अशोक लव की इस प्रयोगधारा में चेखव की संवादात्मक शैली, ज़िब्रान की लघुकथा संरचना की विशेषताएँ, मंटो की वेदना और प्रेमचंद की सामाजिक चेतना सम्मिलित दिखाई देती हैं।कोरोना काल में समूचे विश्व ने मृत्यु का दर्शन हर पल किया। 

इस स्थिति में मनुष्य की जीवन की संगतियों, जीवन के अर्थ और अस्तित्व के सारतत्त्व की खोज करने की आंतरिक प्रवृत्ति जागरूक होने लगी । अस्तित्व ने मनुष्य की चेतना के सम्मुख मनुष्य के अस्तित्व का यथार्थ क्या है? जैसा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया।अशोक लव जी ने अपनी लघुकथाओं में इन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास, मनुष्य के अवचेतन या भावजगत में किया है। मत्यु का बोध अंततः मनुष्य को सत्य की खोज करने पर मजबूर कर देता है।

'एकांतवास में ज़िंदगी' अशोक लव जी का कोरोना काल में जीवन के एकांत को मानवता और मृत्यु के आयाम में परिभाषित करनेवाला लघुकथा संग्रह है। इस कोरोना काल को हम मृत्यु की व्यापकता और जीवन की लघुता के रूप में चित्रित कर सकते हैं। इस द्वंद्व में अंततः जीवन की ही विजय होती है।जीवन अकाल मृत्यु की इस मुठ्ठी से बच निकलने में कामयाब हो जाता है। जीवन की गाड़ी फिर पटरी पर दौड़ने लगती है । जो ज़िंदगी एकांत में मौन और शून्य हो गई थी वह फिर सृजनशील बनने लगती है।

 कोरोना काल मनुष्य की अपनी त्रासदी थी।इस त्रासदी में जीवन को एकांतवास के काले कोहरे में धकेल दिया था। इसकी कीमत भी मनुष्य ने जीवन को मृत्यु को सौंपकर चुकाई थी। यह लघुकथा संग्रह इस त्रासदी के संपूर्ण स्वरूप को प्रकट करता है। समकालीन हिन्दी साहित्य की कथात्मक संरचना में लघुकथा एक नई सामाजिक चेतना और आत्मविश्लेषण तथा पूनर्रमूल्यांकन की प्रेरणा बनकर कथा संसार को समर्थ तथा समृद्ध कर रही है।

 मनुष्य के अस्तित्व और एकांत को सामाजिक संघर्ष और ह्रास में , संकट काल में भी मानवता, अपने अस्तित्व का अहसास जीवन को ही ऊच्चतम मूल्य मानकर करती है। यह लघुकथा संग्रह मनुष्य के भावजगत ,व्यवहार और सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति का अनोखा समन्वय है। ऐसी विपरीत स्थितियों में मनुष्य अगर मानवता को अभिव्यक्त नहीं करेगा तो कौन करेगा ? आखिरकार मानवता के मूल्यों को व्यक्त करना मनुष्य की ही प्रथम और अंतिम जिम्मेवारी है।

साहित्य की संरचना तो सिर्फ यथार्थ के आईने हैं जिनमें मनुष्य मनुष्यता के दर्शन करता है। मनुष्य का आत्मबोध या आत्मदृष्टि विकसित करने का काम प्रतिमा,प्रतीक और प्रतिबिंब तो करते ही हैं। इसके साथ ही सामाजिक चेतना का विकास मानवता के दर्शन पर ही होता है।अशोक लव जी लघुकथा की साहित्यिक विधा में एक अद्वितीय और अतुलनीय योगदान देनेवाले सशक्त हस्ताक्षर हैं।वे इस विधा को रचनाधर्मिता की अलग ही ऊँचाई पर ले जाते हैं। हम जिस तरह एक छोटी-सी खिड़की से भी विराट आकाश का दर्शन कर सकते है।

लघुकथा की समस्त विशेषताओं को परिभाषित करके सामाजिक चेतना की धारा को गतिशील करनेवाला अशोक लव जी का 'एकांतवास में ज़िंदगी' लघुकथा-संग्रह कोरोना काल में मानव मन की हताशा,दुःख और वेदना की चरम सीमा, हर एक मनुष्य को लहूलुहान करनेवाले दिनों,सतत हर क्षण मृत्यु का भयावह डर, जीवन को बचाने के लिए चलनेवाले मनुष्य के निरंतर प्रयासों को इस सदी ने पहली बार देखा था । जैसे मृत्यु हर रास्ते,गली-कूचे से अपनी दौड़ लगा रही थी। हर दरवाजे पर दस्तक दे रही थी।कुत्ते और बिल्लियाँ भी मृत्यु का करण करुण विलाप कर रहे थे।समूचे विश्व ने मृत्यु का संहार देखा और अनुभव किया था। मृत्यु जिस तरह जीवन के पीछे हाथ धोकर लगी थी और जीवन आगे की ओर भाग रहा था।

अशोक लव जी की इस संग्रह की सारी लघुकथाएँ सामाजिक यथार्थ, प्रेम, रिश्ते-नातों की गहराई, संबंधों के विरोधाभास, भावों के द्वंद्व, संवादों से स्थितियों को उजागर करना तथा लघुरूप में व्यापकता को बाँधना,परंपरा से हटकर कथावस्तुओं की रचना करना आधुनिक परिवेश में जीवन के नकारात्मक पहलुओं पर अपना प्रेरक दृष्टिकोण स्थापित करती हैं। ये विशेषताएँ उनकी कथाओं में सर्वत्र झलकती हैं। उनकी लघुकथाएँ भारतीय संस्कृति के मूल्यों - प्रेम,दया तथा करुणा के जीवनाधार पर भी प्रकाश डालती हैं। कोरोना जैसी विश्व की इस विकराल, विराट-व्यापक,

 नरसंहार करनेवाली त्रासदी के स्वरूप की भयावहता और मनुष्य का मानवता सिद्ध करने के संघर्ष के आयाम को लघुरूप में बाँधना यह एक साहसपूर्ण रचनाधर्म है। अशोक लव जी ने इसे बखूबी निभाया है।कोरोना काल में जो एकांतवास मिला अशोक लव जी ने उसे सृजन का अवसर बनाया। यह इस लघुकथा संग्रह की उपलब्धि है। 'मृत्यु का भय' लघुकथा में यह समन्वय स्पष्ट दिखता है।अभिव्यक्ति के उपहास और व्यंग्य व्यंग्यात्मक पक्ष को भी लव जी की लघुकथाएँ अपनी अनुबंध में बाँधती हुई दिखाई देती हैं।

अशोक लव जी की हर एक लघुकथा में एकांत के आयाम-अकेलापन,मौन,भय,हर पल मृत्यु का आभास, अस्वस्थता,जीवन के शून्यत्व की अनुभूति,विवशता, अभाव,सकारात्मक तथा नकारात्मक भाव,जीवन की क्षणभंगुरता, मृत्यु के काले-गहरे साये में जीवन का सिकुड़ना आदि भावों का यथार्थ और तथ्यगत वर्णन इन कथाओं में आता है। मैं यहाँ कुछ ही लघुकथाओं का ज़िक्र कर रहीं हूँ। ये लघुकथाएँ इस संग्रह की प्राणबिंदु हैं। ये साहित्यिक सौंदर्य,आस्वाद और कलात्मकता की दृष्टि से अनोखी है। 'देश बचना चाहिए' में लाॅकडाउन हटाकर देश बचना चाहिए क्योंकि देश रहेगा तो हम रहेंगे तथा जीवन से भी राष्ट्र का ऊच्चतम मूल्य है,ऐसा राष्ट्रवादी विमर्श भी ऐसी स्थितियों में सामने रखा गया है।

इस कथा संग्रह की पहली कथा 'बड़-बड़ दादी' मौन की अभिव्यक्ति करती है तो अंतिम कथा 'न लकड़ी न अग्नि' श्मशान के शून्य की अभिव्यक्ति करती है।'बड़-बड़ दादी' इस कथा में कोरोना के भय से सतत बड़-बड़ करने वाली, डाँटनेवाली दादी एकांत में खामोशी में बैठ गई । उसकी श्रद्धा संकट मोचक हनुमान जी पर थी क्योंकि हनुमान जी ने आतंकवादी रावण की लंका जला दी थी। तो वे चीन के कोरोना को भी भगा देंगे।श्रद्धा से क्या नहीं हो सकता ? श्रद्धा से पहाड़ भी हिला सकते हैं । श्रद्धा से त्रासदी पर भी विजय पा सकते है,'नासे रोग हरे सब पीरा,जो सुमिरे हनुमत बलबीरा'। रोग और पीड़ा को हराना है तो अपने उपास्य देवता पर श्रद्धा, विश्वास करके जीवन को बचाया जा सकता है।यह बड़ा संदेश अशोक लव जी इस लघुकथा से देना चाहते है।

अशोक लव जी मानवीय संवेदनाओं को व्यंग्यात्मक तथा उपहासपूर्ण शैली का भी उपयोग करके मानव मन की उथलपुथल और चिंता को 'धुलाई युद्ध' लघुकथा में चित्रित करते हैं। प्रत्यूष कोरोना की चिंता से हर चीज जैसे सब्जियाँ ,फल आदि को शुद्ध और गरम पानी से धोता है ताकि कोरोना का वायरस मर जाए । उसका बस चले तो वह पानी को भी और शुद्ध पानी से धोकर पी सकता है।यह शुद्धता का अतिरेक करना है।चिंता ने प्रत्युष के आचरण को विकृत बना दिया था। चिंता (Anxiety) की अति भी मनोरोग का कारण बन सकता है।

'मृत्यु का भय' यह कथा इस लघुकथा संग्रह की अनोखी और अनूठी कथा है।यह कथा इस संग्रह को अभिव्यक्ति की ऊँचाईं पर ले जाती है। कोरोना काल में मत्यु के भय से मनुष्य ही चिंताग्रस्त नहीं थे अपितु कुत्ते भी परेशान थे।क्योंकि वे ज्यादातर मनुष्यों के संपर्क में आते थे।अब उन्होंने भी मृत्यु से बचने के लिए मनुष्यों जैसा व्यवहार करना पसंद किया। वे भी ख़ुद को बचाने के लिए भौंकने के बजाय एकांत ढूँढने लगे। इस कथा का अर्थ यह है कि इस सृष्टि चक्र में मनुष्य की अहमियत और उसकी भूमिका कितनी बड़ी है। उसके चरित्र का प्रभाव हर एक जीव पर पड़ता है।अगर मृत्यु मनुष्य को आती है तो वह कुत्तों को भी आ सकती है। मृत्यु से बचने का उपाय और उसकी जागरूकता प्राणियों के पास नहीं होती। इसी कारण कुत्ते भी मनुष्यों की ओर आशा से देख रहें हैं और इस स्थिति से निपटने के लिये उनका अनुसरण कर रहे हैं।

'मेरे शहर के बच्चे' यह लघुकथा कई मायनों में इस लघुकथा-संग्रह की साहित्यिक श्रेष्ठता बढ़ाती है। मानव व्यवस्था में सबसे ज्यादा मासूम,निष्पाप,निर्लेप बच्चे होते हैं।उन्हें भगवान का लघुरूप माना जाता है। वे सृष्टि,समाज की अच्छाई और बुराइयों से परे होते हैं। उनकी चेतना संस्कारित नहीं हुई होती है। उनकी आँखों में भी मृत्यु का अजीब भय दिखता है। कहानियों में जो राक्षस उन्होंने देखा है वही उनको अब इन स्थितियों में डरा रहा है। अब वे हठ नहीं करते। अब वे खेलते, कूदते नहीं हैं।वे भी एकांत अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं। वे भी गंभीर हो गए हैं।मासूम चेतना भी मृत्यु के भय से सिकुड़ गई है। बच्चे तो बहते हुई जीवन-धारा के प्रतीक हैं।लेकिन वे भी कोरोना से डरे हुए हैं। मृत्यु चेतना का संकोच करती है।

कोरोना काल ने सिर्फ मनुष्यों को ही संकुचित नहीं किया था बल्कि मानवीय व्यवहार और आचरण को भी संवेदनहीन किया था। 'पाषाण प्रतिमाएँ ' लघुकथा में नीहारिका अकेली रहती थी।उसके लिए यह समय युद्ध जैसे था। वह सामान खरीदने के लिए दुकान में गई। वहाँ पर भी कुछ युवा पहले से खड़े थे।दुकानदार ने उसकी हालत देखकर उसे सामान पहले दे दिया। दुकानदार ने कार तक सामान पहुँचाया तो वे पाँचो युवा पत्थर जैसे संवेदनाहीन स्तब्ध खड़े रहे। उन्होंने निहारिका की सहायता नहीं की। कोरोना ने एक तरफ मानवता का परिचय दिया तो दूसरी तरफ अमानवीय व्यवहार को भी उजागर किया।

समूची मानव संस्कृति में अंतिम संस्कार का अनन्य विशेष महत्व है। मृत्यु भी संस्कार का विषय है ताकि मनुष्य की आत्मा को शांति,मुक्ति मिल सके। कोरोना काल ने यह संस्कार भी छीन लिया। कोरोना की मृत्यु भी हर एक जीव को संक्रमित करती थी। मृत्यु ने मनुष्य होने के अर्थ और मूल्य हमसे छीन लिए थे। लोग अपने ही परिजनों के शवों को छूने से डरते थे। लोग शवों को घर के बाहर कूड़ेदान के पास रख देते थे।मनुष्य का मूल्य कूड़े से ज्यादा नहीं रहा था। कोरोना ने मनुष्य को क्षणभंगुर,निरर्थक और मूल्यहीन बना दिया था। हम जब तक जीवित हैं तब तक हमारा मूल्य है। अन्यथा हम आप कूड़ाकरकट हैं। मृत्यु के बाद मनुष्य मूल्यहीन है। 'कूड़ा बन जाना' लघुकथा का यह सार है ।यह लघुकथा बाजारवाद और उपयोगितावाद के मूल्यों और परिणामों को दर्शाती है। यह लघुकथा इस संग्रह की प्राण है।

साहित्यकार अल्पेश की कहानी 'नाम रोग वायरस' कोरोना काल पर व्यंग्य करती है। कोरोना काल में आदमी ऑनलाईन हो गया।सोशल मीडिया पर व्यस्त होने लगा।उसकी प्रतिभा ऑनलाईन निख़रने लगी।मनुष्य का अस्तित्व,ईमेज और उसकी पसंद लाईक्स के डेटा पर निर्भर होने लगी।अल्पेश को लगता था की वह सर्वत्र छाया हुआ था तो उसके पत्नी को लगता था कि उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया था।

'आपके घर का हाल?' इस लघुकथा में अशोक लव जी न ने लाॅकडाउन का सामाजिक और आर्थिक स्तर पर क्या परिणाम हुआ था, इसका मार्मिक वर्णन किया है।लोग भूखे मरने लगे थे,नौकरियाँ चली गई थीं ,छोटे दूकानदार भी उजड़ गए थे। हर घर में सिर्फ कोरोना की ही चर्चा हो रही थी। रिपोर्ताज शैली में लिखी यह लघुकथा पाठकों को व्यथित कर देती है और प्रश्न उपस्थित करती है कि आपके घर का हाल क्या है? यह प्रश्न ही मन की संवेदना को तीव्र कर देता है।

'वह कौन थी' यह लघुकथा इस संग्रह की सर्वश्रेष्ठ लघुकथा है।अमानुषता और मानवीयता की संवेदनाओं के विरोधाभास को उजागर करती है। यह लघुकथा मंटो की कथा 'खोल दो' की याद दिलाती है।यह कहानी डाॅक्टरों का घिनौना चेहरा दिखाती है।मनस्वी के नाम पर किसी और के शव को घरवाले अंतिम संस्कार करके घर पहुँचते हैं। जब अजय मनस्वी को कार से लेकर आता है तो सब आश्चर्यचकित हो जाते है।मनस्वी की रिपोर्ट नेगेटिव थी। फिर भी उसको उपचार के नाम पर बलात्कार का सामना करना पड़ा। ऐसे तैसे वह अपनी जान बचाकर आ जाती है फिर भी जिसका दाह संस्कार किया वह कौन थी ? पर प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है।

इस लघुकथा संग्रह की अंतिम कहानी 'न लकड़ी न अग्नि' इसमें अशोक लव जी ने श्मशान की शून्यता ,मानवीय व्यवहार और हताशा को चित्रित किया है।दाह संस्कार के लिएं श्मशान लकड़ी न होने के कारण बड़े कठोर मन से शवों को रेत से ढक दिया जाता है और दूसरी ओर ऐंबुलेंसवाले को छह हजार देकर बेमन से व्यवहार को पूरा किया जाता है।लखन अपने माँ,बाप और भाई का अंतिम संस्कार तक अभावों के कारण नहीं कर पाया सिर्फ गंगा मैया को प्रणाम करके उनके मुक्ति की प्रार्थना की।

अग्नि वह पवित्र अग्नि होती है जो मृत्यु को भी मोक्ष देने का काम करती है लेकिन वह भी मौन है कोरोना काल के आगे। वैसे तो समस्त जीवन की गतिविधियों पर कोरोना का संकट गहराया हुआ था। पशु-पक्षी से लेकर मनुष्य तक सभी मृत्यु का ताण्डव अनुभव कर रहे थे और मृत्यु की ऐसी खानाबदोश पृष्ठभूमि में लेखक स्थितप्रज्ञ होकर अपने एकांतवास में सृजनकर्म कर रहां है।लेखक अपने सृजनधर्म के द्वारा जीवन और मृत्यु को साक्षीभाव से देख रहा है और अपना कथा संसार रच रहा है।कोरोना अपना काम कर रहा है,सृष्टि अपना ऋतुचक्र गतिशील कर रहीं है,मनुष्य अपना अस्तित्व बचाने की अपने हक की लड़ाई लड़ रहा है और एकांत में शांत,मौन होकर तुरीय अवस्था में सर्जक अपनी सृजन साधना में व्यस्त हैं।

एकांतवास में अगर ज़िदगी चली जाती है तो मनुष्य के सामने एक ही पर्याय आत्महत्या या आत्मसृजन !
हिन्दी साहित्य के भाषाविद और सशक्त हस्ताक्षर अशोक लव जी का यह लघुकथा संग्रह अपने आप में लघुकथा विधा को एक नया आयाम प्रदान करता है।इस विधा को वे लोकप्रिय ही नहीं बनाते बल्कि लघुकथा की विशेषताएँ भी अपनी लेखन शैली से प्रकट करते हैं। यह लघुकथा संग्रह मनुष्य की संवेदना,भावजगत और व्यवहार की यथार्थ और सार्थक अभिव्यक्ति की पराकाष्ठा है।□

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