पजल परिवार द्वारा उत्तराखण्ड मूल के छात्रों श्रेष्ठा नेगी,प्रेरणा कंडारी और आशुतोष कुकरेती को प्रोत्साहन सम्मान दिया गया।
० योगेश भट्ट ०
नयी दिल्ली ; पजल परिवार द्वारा उत्तराखण्ड मूल के प्रतिभाशाली छात्रों श्रेष्ठा नेगी, प्रेरणा कंडारी और आशुतोष कुकरेती को उनके वर्ष 2025 के सी ए फाइनल उत्तीर्ण करने पर प्रोत्साहन सम्मान दिया गया। संगोष्ठी में उपस्थित गढ़वाल हितैषिणी सभा के पूर्व अध्यक्ष अजय बिष्ट ने कहा कि पजल परिवार द्वारा यह एक सराहनीय प्रयास है। जयपाल सिंह रावत ने कहा कि जगमोहन सिंह रावत 'जगमोरा' द्वारा एक हजार एक पजल लिखने के बाद 'हजार ग्राम हजार धाम, हमारी भाषा हमारी पहचान' के संदेश के साथ की गई उनकी तीसरी पजल यात्रा नैनीताल चम्पावत, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा के पजल साहित्यिक पड़ावों से होते हुए हल्द्वानी में सम्पन्न हुई।
सुशील बुड़ाकोटी 'शैलांचली' ने कहा कि पूर्व में की गई दो पजल यात्राओं की तरह तीसरी पजल यात्रा भी पंचमेवा, नारियल, रोट, भेलिकेक की अठ्वाड़ भेंट के साथ उन क्षेत्रीय पड़ावों पर गई, जिन पर जगमोरा ने पजल लिखी हैं। गढ़वाली पजल को कुमाऊं के सीमांत पिथौरागढ़ में हुए आदलि कुशलि पत्रिका के दो दिवसीय कुमाउंनी भाषा सम्मेलन में सराहा गया। आदलि कुशलि की संपादक डॉ सरस्वती कोहली ने कहा कि गढ़वाली पजल उत्तराखंड की लोक-साहित्यिक धरोहर हैं।
नयी दिल्ली ; पजल परिवार द्वारा उत्तराखण्ड मूल के प्रतिभाशाली छात्रों श्रेष्ठा नेगी, प्रेरणा कंडारी और आशुतोष कुकरेती को उनके वर्ष 2025 के सी ए फाइनल उत्तीर्ण करने पर प्रोत्साहन सम्मान दिया गया। संगोष्ठी में उपस्थित गढ़वाल हितैषिणी सभा के पूर्व अध्यक्ष अजय बिष्ट ने कहा कि पजल परिवार द्वारा यह एक सराहनीय प्रयास है। जयपाल सिंह रावत ने कहा कि जगमोहन सिंह रावत 'जगमोरा' द्वारा एक हजार एक पजल लिखने के बाद 'हजार ग्राम हजार धाम, हमारी भाषा हमारी पहचान' के संदेश के साथ की गई उनकी तीसरी पजल यात्रा नैनीताल चम्पावत, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा के पजल साहित्यिक पड़ावों से होते हुए हल्द्वानी में सम्पन्न हुई।
सुशील बुड़ाकोटी 'शैलांचली' ने कहा कि पूर्व में की गई दो पजल यात्राओं की तरह तीसरी पजल यात्रा भी पंचमेवा, नारियल, रोट, भेलिकेक की अठ्वाड़ भेंट के साथ उन क्षेत्रीय पड़ावों पर गई, जिन पर जगमोरा ने पजल लिखी हैं। गढ़वाली पजल को कुमाऊं के सीमांत पिथौरागढ़ में हुए आदलि कुशलि पत्रिका के दो दिवसीय कुमाउंनी भाषा सम्मेलन में सराहा गया। आदलि कुशलि की संपादक डॉ सरस्वती कोहली ने कहा कि गढ़वाली पजल उत्तराखंड की लोक-साहित्यिक धरोहर हैं।
गोविंद गोपाल ने कहा कि गढ़वाली पजल पैन उत्तराखंड हैं। साहित्यकार गणेश नेपाली ने कहा कि गढ़वाली पजल उनके नेपाल में भी खूब सराही जा रही हैं। पजल को नेपाल के साहित्यिक संगोष्ठी में यथोचित सम्मान देने पर विचार किया जा रहा है। जगमोहन सिंह रावत 'जगमोरा' ने बताया, यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण रही कि गढ़वाली भाषा में लिखी गई पजल कुमाऊंनी के साथ-साथ नेपाली भाषाई पाठकों के बीच खूब सरही जा रही है।
पजल के मूल में बेशक सम्पूर्ण हिमखंड क्षेत्र है, लेकिन पजल विश्व व्यापी आयाम की बात करतीं हैं। पजल भारत नेपाल मैत्री संबंधों को मजबूती प्रदान करने में भी अहम भूमिका निभा सकती हैं। मेरे साथ पजल यात्रा में कुमाऊंनी पजलकार भूपेंद्र सिंह बृजवाल 'निर्बाध' और भूपेंद्र सिंह बिष्ट भी रहे। संगोष्ठी में डॉ हेमा उनियाल, यशोदा घिल्डियाल, कुसुम बिष्ट, निर्मला नेगी,
शकुंतला जोशी, डॉ रामेश्वरी नादान, सीमा नेगी भैंसोड़ा, अनिल पंत, प्रताप सिंह थलवाल, सतीश रावत, खजान दत्त शर्मा, दीवान सिंह नेगी, युगराज सिंह रावत, नागेंद्र सिंह रावत, दयाल सिंह नेगी, राजेंद्र सिंह रावत, उमेश चन्द्र बंदूणी, ओम ध्यानी, शशि बडोला, देवेंद्र सिंह गुसाईं, कैलाश कुकरेती, अनूप रावत, रविंद्र कंडारी इत्यादि उपस्थित रहे।
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