ग़ज़ल

o मुहम्मद नासिर
तू मेरी याददाशत में पहले पहल रहा
फिर यूँ  हुआ कि तू कहीं माज़ी में 
खो गया।

था कामयाब तो मैं सभी का दुलार था
ना कामयाब जब से हुआ तन्हा रह गया।
खामोशी मेरी करती रही है बयान सब
कहने को कुछ नहीं कभी लफ़्ज़ों में कह सका।

 मैंने जला दिया तेरी नफरत का हर वर्क़ 
तू चाहता है क्या मुझे एक बार तो बता।
मेहनत ही कामयाबी के ताले की कुंजी है
नासिर ने आज सारे जहाँ को बता दिया।

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