बिखरा ख्याल

o मुहम्मद नासिर
कभी रास्तों की तलाश में
कभी मंज़िलों की तलाश में 
यूँ ही चलते चलते गुमान हुआ।
ये जो सुबह शाम की दौड़ है
जहाँ जीतने की ही होड़ है।

जहाँ रात दिन ना करार है।
जहाँ नाम को भी ना बाहर है।
क्योंकि जो भी मिलता वो कम लगे
जहाँ रोज़ बढ़ते हैं फासले।

जहाँ दर्द दिल की क़दर नहीं
जहाँ खुद को खुद की खबर नहीं
जहाँ धोका देते हैं खुद को हम
जहाँ फ़िक्र माआश में रहते गुम

जहाँ रिश्तों में भी फरेब है
कोई दूर कोई क़रीब है।
ये अजीब तर्ज़ मयार है
कभी जीत है कभी हार है।

जो है पास माल व ज़र तो फिर
ये जबान रखती है कुछ असर।
मुझे हो रही है घुटन यहाँ
क्यों ना छोड़ जाऊँ में ये जहाँ

रहूँ उस जगह जहाँ तन्हा मैं
कोई दूसरा ना हो दरमियाँ
ना किसी का धोका मुझे मिले
ना ही ज़ख़्म कोई मेरा खुले।

ये अजीब मेरा ख्याल है
जहाँ छोड़ने का ख्याल है।
ये इरादा सारा बदल दिया
जो भी दर्द है वो निगल लिया।
फिर रास्तों पे मैं चल दिया
मेरी जिंदगी तेरा शुक्रिया।

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