मिडिल स्कूल शिक्षा कक्षा 6 से 8 नीतियों में उपेक्षित,बच्चों के भविष्य में निर्णायक

० सुनील कुमार ० 
भारत में शिक्षा पर विमर्श और नीति-निर्माण की दिशा लंबे समय से दो स्तरों पर केंद्रित रही है—प्राथमिक स्तर, जहाँ बुनियादी साक्षरता और गणन क्षमता (Foundational Literacy and Numeracy – FLN) सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है, और माध्यमिक स्तर, जहाँ बोर्ड परीक्षाएँ, उच्च शिक्षा और करियर विकल्प चर्चा का विषय रहते हैं। लेकिन इन दोनों स्तरों के बीच का सबसे अहम पड़ाव, मिडिल स्कूल (कक्षा 6 से 8), अक्सर नीतिगत प्राथमिकताओं से गायब हो जाता है। 

यह विडंबना है, क्योंकि यहीं पर बच्चों का जीवन सबसे संवेदनशील मोड़ पर होता है बचपन से किशोरावस्था में संक्रमण का दौर, जहाँ शिक्षा छोड़ने और भविष्य से कट जाने का जोखिम सबसे अधिक होता है। असर 2024 की रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि पाँच वर्षों की औपचारिक पढ़ाई पूरी करने के बाद भी अधिकांश बच्चे कक्षा 6 में बुनियादी स्तर की पढ़ाई में सक्षम नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में 63.3% बच्चे दूसरी कक्षा स्तर का पाठ पढ़ पाते हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह दर 57.7% है। गणित की स्थिति और भी गंभीर है—कक्षा 6 में मात्र 44% छात्र (यूपी) भाग का सवाल हल कर पाते हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत केवल 36% है।

यह आँकड़े संकेत करते हैं कि प्राथमिक स्तर पर FLN मिशन के बावजूद बड़ी संख्या में बच्चे मिडिल स्कूल तक पहुँचते-पहुँचते सीखने में पिछड़ जाते हैं। उनके लिए कक्षा 6 का पाठ्यक्रम समझ पाना कठिन हो जाता है, और धीरे-धीरे वे शिक्षा से कटने लगते हैं। नामांकन और ट्रांज़िशन की चुनौती भी इस तस्वीर को और गंभीर बनाती है। असर 2024 और UDISE+ 2023–24 के आँकड़े मिलकर यह दर्शाते हैं कि प्रारंभिक स्तर पर बच्चों का नामांकन मज़बूत है, 

लेकिन जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते हैं, गिरावट साफ दिखती है। सात से दस वर्ष की आयु में नामांकन दर लगभग सार्वभौमिक है (उत्तर प्रदेश: 97.6% बनाम राष्ट्रीय औसत: 98.8%), ग्यारह से चौदह वर्ष में भी यह दर ऊँची बनी रहती है (UP: 96.0% बनाम राष्ट्रीय: 97.7%), लेकिन पंद्रह से सोलह वर्ष की आयु में अचानक गिरावट आती है और यूपी में नामांकन दर 87 प्रतिशत पर पहुँच जाती है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 92.2 प्रतिशत है।

इसी प्रवृत्ति की पुष्टि UDISE+ के आँकड़े भी करते हैं। ट्रांज़िशन दर भी यही कहानी कहती है। यूपी में Preparatory से Middle स्तर पर ट्रांज़िशन रेट केवल 79.5% है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 88.8% है। इसी तरह Middle से Secondary स्तर पर यूपी का ट्रांज़िशन रेट 76.9% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 83.3% है। यह अंतर दिखाता है कि जैसे-जैसे बच्चे आगे बढ़ते हैं, वैसे ही उत्तर प्रदेश एवं राष्ट्रीय स्तर पर काफी बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं।

यह प्रवृत्ति यह बताती है कि मिडिल स्कूल से आगे बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखना अब भी सबसे बड़ी चुनौती है। इस गिरावट का असर सबसे अधिक किशोरियों पर पड़ता है, जो आर्थिक दबाव, सामाजिक बाधाओं और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण पढ़ाई से बाहर हो जाती हैं। इसीलिए नई शिक्षा नीति 2020 ने विशेष रूप से मिडिल स्कूल स्तर पर सतत नामांकन, व्यावसायिक शिक्षा का आरंभ और लैंगिक समानता पर ज़ोर दिया है, ताकि बच्चे न केवल स्कूल में टिके रहें बल्कि शिक्षा के अगले पड़ाव के लिए भी तैयार हो सकें।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 मिडिल स्कूल को एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में मान्यता देती है और इसके लिए कई प्रमुख सुझाव रखती है। इसमें अनुभवात्मक शिक्षा पर बल दिया गया है, ताकि बच्चे केवल किताबों तक सीमित न रहकर वास्तविक जीवन से सीखें। कक्षा 6 से ही व्यावसायिक शिक्षा का परिचय कराने की बात कही गई है, ताकि बच्चे छोटे-छोटे ट्रेड्स से अवगत हों और जीवन-कौशल विकसित कर सकें। करियर परामर्श और मार्गदर्शन को भी इसी स्तर से शुरू करने की सिफारिश की गई है ताकि बच्चे उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों के बारे में सजग बन सकें। लैंगिक समानता और समावेशन पर भी विशेष ज़ोर दिया गया है ताकि लड़कियों और वंचित समूहों की शिक्षा सुनिश्चित की जा सके।

यदि वास्तव में शिक्षा सुधार को सफल बनाना है, तो मिडिल स्कूल पर केंद्रित ठोस हस्तक्षेप ज़रूरी हैं। सबसे पहले, कमजोर नींव वाले बच्चों के लिए कैच-अप प्रोग्राम चलाना होगा, जैसे कि प्रथम का Teaching at the Right Level (TaRL) मॉडल, जिसमें बच्चों को उनकी सीखने की क्षमता के अनुसार समूहों में बाँटकर पढ़ाया जाता है। इसके साथ ही गाँवों और कस्बों में पुस्तकालय विकसित करने होंगे, जहाँ माताएँ नेतृत्व करें और बच्चों को सरल कहानियों तथा स्थानीय भाषा की किताबों से जोड़ा जाए।

अनुभवात्मक शिक्षा को भी और व्यापक रूप से लागू करना होगा। स्काउट जैसी गतिविधियाँ, सामूहिक सीखने के कार्यक्रम और स्थानीय भ्रमण जैसे शहर की यात्राएँ बच्चों के लिए सीखने को अधिक जीवंत बना सकती हैं। लड़कियों की शिक्षा के लिए विशेष अभियान चलाना भी उतना ही ज़रूरी है। मातृ-समूहों को संगठित करके उनकी शिक्षा की निगरानी करनी होगी और समुदाय में जागरूकता फैलानी होगी कि लड़कियों की पढ़ाई परिवार और समाज दोनों की प्रगति के लिए कितनी महत्वपूर्ण है।

करियर परामर्श को मिडिल स्तर से ही शुरू करना आवश्यक है। इसके लिए ग्राम सभा या गाव स्तर पर काउंसलर नियुक्त किए जा सकते हैं, जो बच्चों, विशेषकर लड़कियों, को उच्च शिक्षा, व्यावसायिक अवसरों की जानकारी दें। साथ ही, मिडिल स्कूल से ही छोटे-छोटे व्यावसायिक कोर्स, जैसे सिलाई, इलेक्ट्रिकल कार्य या प्लंबिंग, का परिचय कराया जा सकता है। इससे बच्चों में आत्मविश्वास और जीवन-कौशल विकसित होंगे और वे भविष्य की राह के प्रति अधिक सजग बनेंगे।

स्पष्ट है कि मिडिल स्कूल को नीतिगत उपेक्षा से बाहर लाना अब और टाला नहीं जा सकता। यह वह स्तर है जहाँ सबसे बड़े पैमाने पर बच्चे शिक्षा छोड़ने के जोखिम में होते हैं। यदि हम नई शिक्षा नीति 2020 के विज़न को साकार करना चाहते हैं तो मिडिल स्कूल को शिक्षा सुधार की प्राथमिकता बनाना होगा। इसे मज़बूत करना केवल बच्चों की व्यक्तिगत प्रगति ही नहीं बल्कि राज्य और राष्ट्र की सामाजिक-आर्थिक प्रगति के लिए भी अनिवार्य है।

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