डॉ राजेश्वर सिंह के आयोजन में "मानस से जनमानस तक" संवाद

० आशा पटेल ० 
जयपुर | "मानस से जनमानस तक " विषय पर हुये एक संवाद में तुलसीदास और उनकी रामचरित मानस पर आध्यात्मिक चर्चा ने राम -सीता और तुलसी कालीन समाज की विस्तार से व्याख्या की गई | फोर्टिस हॉस्पिटल के सभागार में फोर्टिस जयपुर और थार संस्था के संयुक्त तत्वावधान में हुए इस कार्यक्रम का उदेश्य मानस की सरल व्याख्या को जन साधारण तक पहुँचाना था | आयोजन की परिकल्पना करने वाले थे तुलसी दास की काशी के निवासी और पूर्व में जयपुर कलेक्टर रहे डॉ राजेश्वर सिंह | 
कार्यक्रम के संयोजक सुधीर सोनी ने कहा कि तुलसी दास का नाम भारत के हर कोने में पहुंचा हुआ है और इतना ही नहीं भारत का हर आदमी आज तुलसीदास के किसी न किसी दोहे, चौपाई को खुद से रिलेट करता है। सोनी ने भगवान राम के वनवास जाने के संस्मरण को सुनाते हुए कहा कि राम को वन की ओर आते देख रास्ते में उगे कांटों, पत्थरों ने अपने स्वभाव चुभने की आदत को छोड़ दिया, सीता मां के माथे पर पसीने को देखकर सूरज ने अपने तपन को चंद्रमा की शीतलता में बदल दिया। |
फोर्टिस अस्पताल के जनरल सर्जन डॉ हेमेंद्र ने बताया कि योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के पुनर्मिलन का माध्यम है। उन्होंने योग और प्राणायम से आध्यात्म तक को बड़े ही सरल रूप में समझाया। उन्होंने बताया कि योग आत्मा का परमात्मा के साथ पुर्नमिलन है। योग, राजयोग यानि मेडिटेशन, प्राणायाम, प्रत्याहारा से धारणा, ध्यान और समाधि तक पहुंचा जा सकता है। उन्होंने राजयोग, प्राणायाम, ध्यान और समाधि की व्याख्या करते हुए कहा कि“योग मन को एकाग्र करके उसे ब्रह्म से जोड़ने की प्रक्रिया है, जो हमें अपने भीतर झांकने का अवसर देता है।”

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ राजेश्वर सिंह ने कहा की “रामचरितमानस आम और खास दोनों वर्गों के जीवन में गहराई से जुड़ी हुई है। जैसे हॉस्पिटल शरीर का उपचार करता है, वैसे ही तुलसीदास का साहित्य मन की व्यथा हरता है।” डॉ सिंह ने तुलसीदास की चौपाइयों के साथ अपनी पूरी बात संवाद के माध्यम से लोगों तक पहुंचाई। भारत का आम और खास आदमी आज भी मानस की चौपाइयों में अपनी परेशानियों का हल तलाशते हैं। भारतीय संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने के लिए श्रीमद् भागवत गीता और रामचरित मानस सर्वाधिक उपयुक्त ग्रंथ हैं। 

उन्होंने तुलसीदास के कई संस्मरणों और बचपन के प्रसंगों के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि कवित्व और साहित्य के उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपने बचपन के वास्तविक संस्मरण को नहीं भुलाया और अपने लेखन में उसका जहां मौका मिला जिक्र किया | उन्होंने कहा कि मानस हमारी पूरी संस्कृति और सभ्यता का आधारभूत ग्रन्थ है और गीता फिलोसोफी है | तुलसी दास बचपन से घर से बाहर रहे , विपन्न अवस्था में रहे ,भिक्षा से पेट भरते रहे ,इतना ही नहीं उन्हें जीवन भर प्रेम नहीं मिला | काशी के संतों और लोगों ने उनका सदैव विरोध किया |

 दुनिया की अनेक भाषाओं में अब तक तुलसी के मानस पर 845 ग्रन्थ और 9780 शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं | वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी IAS डॉ समित शर्मा और IAS के के पाठक ने भी “मानस से जनमानस तक” विषय पर अपने विचार लोगों के सामने रखे। आयोजन में डॉ टीकम चंद बोहरा , संजय डॉ के के रत्तू, संजय पाराशर और अनेक वक्ताओं ने साहित्य ,संस्कृति ,योग और आत्मिक उन्नयन पर अपने विचार रखे |

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