विविधता में एकता की भाषा हिंदी की समृद्धता,उसकी अहमियत और चुनौतियाँ
हिंदी केवल शब्दों का समूह नहीं है, यह भारत की आत्मा है। यह भाषा हमारी संस्कृति की धड़कन है, हमारे लोकगीतों की मिठास है, हमारी कहानियों और कविताओं का रस है और हमारी सभ्यता की परंपरा का जीता-जागता साक्ष्य है। जब कोई बच्चा पहली बार बोलना सीखता है, उसकी जुबान पर जो सहज, सरल और आत्मीय ध्वनियाँ निकलती हैं, वही हमारे समाज और परिवार की भाषा होती है—हिंदी। इस भाषा की जड़ें इतनी गहरी हैं कि यह केवल भारत ही नहीं,
बल्कि विदेशों में बसे भारतीय समुदाय की भी पहचान बन चुकी है। फिर भी विडंबना यह है कि आज हिंदी अपनी ही धरती पर उपेक्षित सी प्रतीत होती है। हिंदी का एक विशालगौरवशाली इतिहास रहा है। हिंदी का विकास हजारों वर्षों की यात्रा का परिणाम है। संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से हिंदी का स्वरूप सामने आया। यह यात्रा केवल भाषा की नहीं, बल्कि सभ्यता और संस्कृति की भी यात्रा है। हिंदी को भक्ति आंदोलन ने जन-जन तक पहुँचाया।
कबीर के दोहे, तुलसीदास का रामचरितमानस, सूरदास की पदावलियाँ और मीरा की भक्ति-भावना ने हिंदी को लोकजीवन की आत्मा बना दिया। आधुनिक काल में भारतेन्दु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, निराला और दिनकर जैसे साहित्यकारों ने हिंदी को साहित्यिक ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। हिंदी का साहित्य एक ऐसा महासागर है जिसमें गहराई भी है, व्यापकता भी है और जीवन के हर रंग का प्रतिबिंब भी।
हिंदी की शक्ति उसकी आत्मसात करने की क्षमता में है। इसने संस्कृत से शास्त्रीयता, प्राकृत और अपभ्रंश से सहजता, अरबी-फारसी से मिठास और अंग्रेज़ी से आधुनिकता आत्मसात की। भोजपुरी, अवधी, राजस्थानी, मैथिली, पंजाबी, बंगाली और मराठी जैसी भाषाओं ने इसे लोकजीवन का रंग दिया। इसी कारण हिंदी बहुरंगी और बहुआयामी है। इसमें प्रेमचंद की यथार्थपरकता है, कबीर की सादगी है, दिनकर की ओजस्विता है और महादेवी वर्मा की करुणा है।
हिंदी केवल भाषा नहीं, भाषाओं का संगम है, जो भारत की विविधता में एकता का प्रतीक है। लेकिन आज की स्थिति देखकर हृदय व्यथित हो उठता है। हमारे देश में हिंदी बोलचाल की भाषा तो है, लेकिन लिखित संवाद, उच्च शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन और औपचारिक जीवन में अंग्रेज़ी का वर्चस्व कहीं अधिक है। यह देखकर मन दुखी होता है कि अंग्रेज़ी बोलने वाले को समाज में पढ़ा-लिखा और सभ्य समझा जाता है, जबकि हिंदी बोलने वाला व्यक्ति अक्सर कमतर आँका जाता है। यह भेदभाव केवल भाषा का नहीं, बल्कि मानसिकता का है।
सोचिए, जिस भाषा में करोड़ों लोग अपनी भावनाएँ व्यक्त करते हैं, उसी भाषा में जब कोई प्रशासनिक आदेश नहीं लिखा जाता, जब उच्च शिक्षा में उसका स्थान सीमित कर दिया जाता है, तो यह केवल हिंदी की नहीं, बल्कि हमारी आत्मा की उपेक्षा है। जब एक साधारण ग्रामीण बच्चा, जो हिंदी में अपनी बात बड़े आत्मविश्वास से कह सकता है, अंग्रेज़ी के अभाव में हीन भावना से ग्रसित हो जाता है, तो यह दृश्य किसी भी संवेदनशील हृदय को द्रवित कर देता है।
अंग्रेज़ी का ज्ञान होना निस्संदेह आवश्यक है क्योंकि यह हमें वैश्विक स्तर पर जोड़ता है। लेकिन समस्या तब आती है जब अंग्रेज़ी को श्रेष्ठ और हिंदी को निम्नतर मान लिया जाता है। अंग्रेज़ी जानने वाला व्यक्ति चाहे साधारण जानकारी ही क्यों न रखता हो, समाज में सम्मानित हो जाता है, और केवल हिंदी जानने वाला चाहे कितना ही विद्वान क्यों न हो, उसकी विद्वत्ता को कम आंका जाता है। यह प्रवृत्ति हमारी मानसिक गुलामी का प्रतीक है। फिर भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
हिंदी आज भी दुनिया की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। भारत के अलावा नेपाल, मॉरीशस, फिजी, त्रिनिदाद, सूरीनाम और दक्षिण अफ्रीका में भी हिंदी बोली और पढ़ी जाती है। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय ने इसे अपनी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संजोकर रखा है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक ने हिंदी को एक नया मंच दिया है। हिंदी ब्लॉग, हिंदी वेबसाइट और हिंदी यूट्यूब चैनलों की लोकप्रियता यह दर्शाती है कि यह भाषा आधुनिक युग में भी पूरी तरह सक्षम है।
अब आवश्यकता है कि हिंदी को केवल घर और बाजार की भाषा तक सीमित न रखकर शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन और तकनीक की भी भाषा बनाया जाए। बच्चों को यह आत्मविश्वास दिया जाए कि हिंदी बोलना उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हिंदी में उच्च शिक्षा और शोध को बढ़ावा दिया जाए। सरकारी कार्यों और न्यायालयों में हिंदी का अधिक प्रयोग हो। और सबसे बढ़कर, समाज की मानसिकता बदली जाए—हिंदी बोलने वाले को कमतर न आँका जाए, बल्कि गर्व के साथ उसकी विद्वत्ता को स्वीकार किया जाए।
हिंदी हमारी पहचान है। इसे कमजोर करना अपने ही अस्तित्व को कमजोर करना है। हमें यह समझना होगा कि अंग्रेज़ी ज्ञान का माध्यम हो सकती है, लेकिन हिंदी हमारे हृदय की भाषा है। अगर हम हिंदी को केवल घर-परिवार की भाषा बनाकर छोड़ देंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों से कट जाएँगी। हिंदी में अपार शक्ति है—यह शक्ति दिलों को जोड़ने की है,
आत्मविश्वास जगाने की है और राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधने की है। आज हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम हिंदी को वह सम्मान देंगे, जिसकी वह हक़दार है। तभी हमारा देश सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध कहलाएगा।

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