वरिष्ठ संपादक अशोक चतुर्वेदी – एक आत्मीय रिश्ता
० प्रदीप देविदासराव कुलकर्णी ०
पत्रकारिता केवल समाचार लिखने, शीर्षक बनाने या किसी घटना का विश्लेषण करने तक सीमित नहीं है। पत्रकारिता मनुष्य के हृदय से जुड़ने वाली एक सामाजिक साधना है। इसी साधना से अनेक दिग्गज पत्रकारों ने समाज में प्रकाश फैलाया है, तो कुछ ने युवा पत्रकारों को दिशा दी है। उन्हीं तेजस्वी व्यक्तित्वों में से एक हैं राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार, संपादक तथा एसोसिएशन ऑफ स्मॉल एंड मीडियम न्यूज़पेपर ऑफ इंडिया के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव अशोक चतुर्वेदी।
उनकी कुशलक्षेम पूछना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि आत्मीयता से भरा होता है। जब वे फोन पर कहते हैं, “आप कैसे हैं? परिवार में सब ठीक है ना ? तो उनके शब्द सीधे मन में उतर जाते हैं। हर बार उनकी आवाज में झलकती है इंसानियत, अपनापन और अपने साथियों के प्रति गहरा स्नेह। उड़ीसा राज्य के गोपालपुर में आयोजित संगठन के राष्ट्रीय अधिवेशन की याद आज भी ताजा है। उस अधिवेशन में जब उन्होंने अपना भाषण दिया, तब उन्होंने मेरे और मेरे साप्ताहिक माजलगाव परिसर समाचारपत्र का बार-बार उल्लेख किया। एक राष्ट्रीय मंच, देशभर से आए पत्रकार, संपादक और प्रतिनिधियों के बीच एक छोटे जिले के पत्रकार और उसके समाचारपत्र का नाम सुनना वह क्षण मेरे लिए अविश्वसनीय था।
विजयादशमी के दिन उन्होंने मुझे फोन किया, शुभकामनाएं दीं और कहा “आपका साहित्यिक सफर देखकर अच्छा लगता है। लिखते रहिए, समाज को दिशा देने की जिम्मेदारी अब आपकी है उनके इन शब्दों ने मेरा मन भर दिया। वे केवल वरिष्ठ पत्रकार के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनशील पाठक और मार्गदर्शक के रूप में मेरे लेखन को सराह रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि उन्हें मराठी भाषा नहीं आती। फिर भी, जब उन्होंने प्रतिलिपि पर मेरा मराठी लेखन देखा, तो फोन करके बोले “मुझे मराठी नहीं आती, पर आपकी कहानियां देखकर लगा कि भावनाएं भाषा की दीवार नहीं देखतीं।
यह वाक्य मेरे मन में हमेशा के लिए अंकित हो गया। यह दर्शाता है कि सच्ची साहित्यिक अनुभूति भाषा की सीमाओं से परे होती है।आज जब मैं उनके द्वारा दी गई शुभकामनाओं का स्मरण करता हूं, तो समझ में आता है कुछ रिश्ते पद या परिचय से नहीं, बल्कि सम्मान और आदर की भावना से बनते हैं। अशोक चतुर्वेदी जी के साथ मेरा रिश्ता ऐसा ही है। उन्होंने जो पहचान, मान्यता और स्नेह मुझे दिया है, वह मेरे पत्रकारिता जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार है। ऐसे व्यक्तित्वों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है नेतृत्व में विनम्रता, मार्गदर्शन में संयम और रिश्तों में आत्मीयता।इन्हीं मूल्यों ने उन्हें “पत्रकारों का पत्रकार” बना दिया है।
पत्रकारिता केवल समाचार लिखने, शीर्षक बनाने या किसी घटना का विश्लेषण करने तक सीमित नहीं है। पत्रकारिता मनुष्य के हृदय से जुड़ने वाली एक सामाजिक साधना है। इसी साधना से अनेक दिग्गज पत्रकारों ने समाज में प्रकाश फैलाया है, तो कुछ ने युवा पत्रकारों को दिशा दी है। उन्हीं तेजस्वी व्यक्तित्वों में से एक हैं राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार, संपादक तथा एसोसिएशन ऑफ स्मॉल एंड मीडियम न्यूज़पेपर ऑफ इंडिया के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव अशोक चतुर्वेदी।
मेरे पत्रकारिता जीवन में कई लोगों ने प्रेरणा दी, मार्गदर्शन किया, परंतु अशोक चतुर्वेदी जैसी आत्मीयता से व्यवहार करने वाले व्यक्ति बहुत कम देखने को मिलते हैं। जब मैं संगठन में बीड जिला अध्यक्ष के रूप में कार्यरत था, तब मुझे उनका प्रत्यक्ष सान्निध्य प्राप्त हुआ। उस समय मैं एक साधारण जिला प्रतिनिधि था; आज जब संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. डी. चंदोला ने मुझ पर विश्वास जताकर मुझे राज्य अध्यक्ष का दायित्व सौंपा ।
किंतु चतुर्वेदी जी के व्यवहार में कभी पद, प्रतिष्ठा, आयु या स्थान का कोई भेदभाव महसूस नहीं हुआ। उनके स्वभाव की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे कभी किसी को ‘छोटा’ नहीं मानते। उनके लिए हर सदस्य, हर पत्रकार संगठन के उद्देश्य में सहभागी एक समान भागीदार होता है। मेरे कार्य पर उन्होंने कब ध्यान दिया, यह मुझे स्वयं भी नहीं पता चला। परंतु उनकी पैनी नजर ने शायद मेरे कार्य की निष्ठा, ईमानदारी और समाज से जुड़ी पत्रकारिता की भावना को पहचान लिया होगा। मैं उनका शिष्य नहीं था, पर उन्होंने हमेशा मुझे पुत्रवत स्नेह दिया।
उनकी कुशलक्षेम पूछना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि आत्मीयता से भरा होता है। जब वे फोन पर कहते हैं, “आप कैसे हैं? परिवार में सब ठीक है ना ? तो उनके शब्द सीधे मन में उतर जाते हैं। हर बार उनकी आवाज में झलकती है इंसानियत, अपनापन और अपने साथियों के प्रति गहरा स्नेह। उड़ीसा राज्य के गोपालपुर में आयोजित संगठन के राष्ट्रीय अधिवेशन की याद आज भी ताजा है। उस अधिवेशन में जब उन्होंने अपना भाषण दिया, तब उन्होंने मेरे और मेरे साप्ताहिक माजलगाव परिसर समाचारपत्र का बार-बार उल्लेख किया। एक राष्ट्रीय मंच, देशभर से आए पत्रकार, संपादक और प्रतिनिधियों के बीच एक छोटे जिले के पत्रकार और उसके समाचारपत्र का नाम सुनना वह क्षण मेरे लिए अविश्वसनीय था।
“महाराष्ट्र के बीड जिले से हमारे साथी प्रदीप कुलकर्णी ने जिस निष्ठा और लगन से संगठन का कार्य किया है, वह अनुकरणीय है। ‘माजलगाव परिसर’ छोटा सा अख़बार है, लेकिन उनके क्षेत्र में बहुत बड़ा काम करता है। ऐसे पत्रकार समाज की आत्मा हैं। ये शब्द सुनते समय मेरी आंखें नम हो गईं। वह क्षण केवल मेरे लिए नहीं, बल्कि मेरे पूरे माजलगाव परिसर परिवार के लिए गौरव का क्षण था। अधिवेशन समाप्त होने के बाद कई साथी मेरे पास आए, हाथ मिलाया और बोले “तुम्हारा नाम तो आज राष्ट्रीय मंच से गूंज गया!
उस दिन मुझे महसूस हुआ कि जब कोई वरिष्ठ पत्रकार आपके कार्य की सराहना करता है, तो वह केवल प्रशंसा नहीं होती वह एक जिम्मेदारी होती है। ऐसे व्यक्तित्व की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए और भी अधिक ईमानदारी और समर्पण से काम करना पड़ता है। अधिवेशन के बाद भी चतुर्वेदी जी का स्नेह वैसा ही बना रहा। वे समय-समय पर फोन करते हैं केवल संगठन के काम के लिए नहीं, बल्कि मेरे व्यक्तिगत जीवन और परिवार की कुशलक्षेम पूछने के लिए। उनके हर संवाद में एक बड़ा दिल झलकता है। वे हमेशा कहते हैं “तुम्हारी प्रगति देखकर खुशी होती है।
आज के समय में, जब व्यस्तता के कारण लोग रिश्तों और संवादों से दूर होते जा रहे हैं, तब चतुर्वेदी जी जैसे व्यक्ति अपने साथियों के सुख-दुःख में सहभागी होते हैं, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। जयपुर अधिवेशन के समय मुझे उनसे प्रत्यक्ष मिलने की उम्मीद थी। पर वे कब आए और कब चले गए, यह पता ही नहीं चला। फिर भी उनका संवाद निरंतर जारी है व्हाट्सऐप के माध्यम से। हर त्योहार, हर विशेष दिन पर उनके शुभकामना संदेश मेरे मोबाइल पर आते हैं। उन संदेशों के पीछे होती है सच्ची आत्मीयता, कोई औपचारिकता नहीं।
उस दिन मुझे महसूस हुआ कि जब कोई वरिष्ठ पत्रकार आपके कार्य की सराहना करता है, तो वह केवल प्रशंसा नहीं होती वह एक जिम्मेदारी होती है। ऐसे व्यक्तित्व की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए और भी अधिक ईमानदारी और समर्पण से काम करना पड़ता है। अधिवेशन के बाद भी चतुर्वेदी जी का स्नेह वैसा ही बना रहा। वे समय-समय पर फोन करते हैं केवल संगठन के काम के लिए नहीं, बल्कि मेरे व्यक्तिगत जीवन और परिवार की कुशलक्षेम पूछने के लिए। उनके हर संवाद में एक बड़ा दिल झलकता है। वे हमेशा कहते हैं “तुम्हारी प्रगति देखकर खुशी होती है।
आज के समय में, जब व्यस्तता के कारण लोग रिश्तों और संवादों से दूर होते जा रहे हैं, तब चतुर्वेदी जी जैसे व्यक्ति अपने साथियों के सुख-दुःख में सहभागी होते हैं, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। जयपुर अधिवेशन के समय मुझे उनसे प्रत्यक्ष मिलने की उम्मीद थी। पर वे कब आए और कब चले गए, यह पता ही नहीं चला। फिर भी उनका संवाद निरंतर जारी है व्हाट्सऐप के माध्यम से। हर त्योहार, हर विशेष दिन पर उनके शुभकामना संदेश मेरे मोबाइल पर आते हैं। उन संदेशों के पीछे होती है सच्ची आत्मीयता, कोई औपचारिकता नहीं।
विजयादशमी के दिन उन्होंने मुझे फोन किया, शुभकामनाएं दीं और कहा “आपका साहित्यिक सफर देखकर अच्छा लगता है। लिखते रहिए, समाज को दिशा देने की जिम्मेदारी अब आपकी है उनके इन शब्दों ने मेरा मन भर दिया। वे केवल वरिष्ठ पत्रकार के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनशील पाठक और मार्गदर्शक के रूप में मेरे लेखन को सराह रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि उन्हें मराठी भाषा नहीं आती। फिर भी, जब उन्होंने प्रतिलिपि पर मेरा मराठी लेखन देखा, तो फोन करके बोले “मुझे मराठी नहीं आती, पर आपकी कहानियां देखकर लगा कि भावनाएं भाषा की दीवार नहीं देखतीं।
यह वाक्य मेरे मन में हमेशा के लिए अंकित हो गया। यह दर्शाता है कि सच्ची साहित्यिक अनुभूति भाषा की सीमाओं से परे होती है।आज जब मैं उनके द्वारा दी गई शुभकामनाओं का स्मरण करता हूं, तो समझ में आता है कुछ रिश्ते पद या परिचय से नहीं, बल्कि सम्मान और आदर की भावना से बनते हैं। अशोक चतुर्वेदी जी के साथ मेरा रिश्ता ऐसा ही है। उन्होंने जो पहचान, मान्यता और स्नेह मुझे दिया है, वह मेरे पत्रकारिता जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार है। ऐसे व्यक्तित्वों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है नेतृत्व में विनम्रता, मार्गदर्शन में संयम और रिश्तों में आत्मीयता।इन्हीं मूल्यों ने उन्हें “पत्रकारों का पत्रकार” बना दिया है।
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