प्राथमिक से लेकर बड़ी कक्षाओं तक ट्यूशन/कोचिंग का क्रेज
० श्याम कुमार कोलारे ०
हर माँ-बाप का सपना होता है कि उनका बच्चा पढ़-लिखकर सफल बने, समाज में सम्मान पाए। लेकिन इस सपने को साकार करने की दौड़ में वे खुद भी “प्रतिस्पर्धा के दबाव” का हिस्सा बन गए हैं। आज माता-पिता को लगता है कि अगर उनका बच्चा कोचिंग नहीं जाएगा तो वह पीछे रह जाएगा।वे अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए न सिर्फ समय बल्कि अपनी आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर खर्च करने लगे हैं। कई परिवारों की मासिक आय का बड़ा हिस्सा अब कोचिंग की फीस में चला जाता है।
कभी स्कूल बच्चों की शिक्षा का मुख्य केंद्र हुआ करता था।लेकिन आज कई स्कूल भी अप्रत्यक्ष रूप से कोचिंग संस्थानों पर निर्भर हो गए हैं। कई शिक्षक स्वयं स्कूल के बाद निजी ट्यूशन लेते हैं, जिससे शिक्षा अब सेवा नहीं, व्यवसाय का रूप लेती जा रही है। ऐसे में बच्चों और अभिभावकों के सामने यह दुविधा है कि स्कूल पढ़ाने के लिए है या कोचिंग के लिए रास्ता बनाने के लिए? कई बार यह भी देखा गया है कि स्कूलों में पाठ्यक्रम केवल औपचारिक रूप से पूरा किया जाता है,
जरूरत इस बात की है कि स्कूलों में शिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाई जाए, शिक्षकों को प्रशिक्षण और संसाधन मिलें, ताकि अभिभावकों का विश्वास फिर से स्कूलों में लौटे। बच्चों को ऐसा वातावरण मिले जहाँ वे न सिर्फ पढ़ाई करें, बल्कि सोचें, समझें और जीवन को जीना भी सीखें। आज की शिक्षा प्रणाली एक मुकाम पर खड़ी है जहां एक ओर ज्ञान का संसार, दूसरी ओर प्रतिस्पर्धा का व्यापार। बच्चे उस नाज़ुक पुल पर हैं, जहाँ उनका बचपन, उनकी भावनाएँ और उनका मानसिक संतुलन दांव पर है।
घर के बाद स्कूल ही वह स्थान है जहाँ बच्चे अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण समय बिताते हैं। यहीं से उनकी सोच, समझ, मूल्य और भविष्य की नींव रखी जाती है। लेकिन आज यह तस्वीर बदल रही है। अब बच्चों की पढ़ाई सिर्फ घर और स्कूल तक सीमित नहीं रही, एक तीसरा स्थान उभर आया है, जिसे हम “कोचिंग सेंटर” या “ट्यूशन क्लास” कहते हैं। यह स्थान अब बच्चों के रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बन गया है।हर अभिभावक की सबसे बड़ी चिंता यही होती है कि उनका बच्चा कहाँ और कैसे अच्छा सीखे।
उन्हें लगता है कि स्कूल की पढ़ाई पर्याप्त नहीं है, इसलिए वे अपने बच्चों को अतिरिक्त सहायता के लिए कोचिंग भेजते हैं। यही कारण है कि आज कोचिंग, बच्चों के शैक्षणिक जीवन का लगभग अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है। आज बच्चे किताबों और क्लासरूम से आगे निकल चुके हैं। उनका नया क्लासरूम अब कोचिंग सेंटर बन गया है। सुबह स्कूल, दोपहर में होमवर्क और शाम को ट्यूशन; यह दिनचर्या अब लगभग हर छात्र की ज़िंदगी का हिस्सा है।
नर्सरी से लेकर बोर्ड क्लास तक, यहाँ तक कि कॉलेज जाने वाले युवाओं तक, कोचिंग का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। शहरी में तो यह एक चलन सा बन चुका है। ग्रामीण इलाकों में भी अब यह चलन तेज़ी से बढ़ रहा है। माता-पिता के मन में यह धारणा बन चुकी है कि कोचिंग ही सफलता की गारंटी है, चाहे वह बोर्ड परीक्षा हो, प्रतियोगी परीक्षा हो या बस अच्छे अंकों की चाहत। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER) के अनुसार, 2018 से 2022 के बीच, ग्रामीण भारत में कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों में प्राइवेट ट्यूशन लेने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है।
2018 में जहाँ 26.4% बच्चे कोचिंग ले रहे थे, वहीं 2022 तक यह संख्या बढ़कर 30.5% हो गई। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में यह वृद्धि 8 प्रतिशत से अधिक रही है। सिर्फ माध्यमिक या उच्चतर माध्यमिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि प्री-प्राइमरी स्तर पर भी बच्चे कोचिंग ले रहे हैं। यानी जो बच्चे अभी ठीक से अक्षर भी नहीं पहचानते, वे भी कोचिंग नाम के इस नए संसार में प्रवेश कर रहे हैं। यह आँकड़ा जितना चौंकाने वाला है, उतना ही समाज के बदलते शैक्षणिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
हर माँ-बाप का सपना होता है कि उनका बच्चा पढ़-लिखकर सफल बने, समाज में सम्मान पाए। लेकिन इस सपने को साकार करने की दौड़ में वे खुद भी “प्रतिस्पर्धा के दबाव” का हिस्सा बन गए हैं। आज माता-पिता को लगता है कि अगर उनका बच्चा कोचिंग नहीं जाएगा तो वह पीछे रह जाएगा।वे अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए न सिर्फ समय बल्कि अपनी आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर खर्च करने लगे हैं। कई परिवारों की मासिक आय का बड़ा हिस्सा अब कोचिंग की फीस में चला जाता है।
यह चिंता स्वाभाविक है, हर अभिभावक अपने बच्चे के भविष्य को सुरक्षित करना चाहता है। लेकिन यह भी सच है कि इस प्रक्रिया में बच्चों का बचपन, उनका खेल, उनकी आत्मीयता और स्वतंत्र सीखने की क्षमता कहीं खोती जा रही है। जहाँ पहले बच्चे स्कूल से लौटकर दोस्तों के साथ खेलते, कहानियाँ पढ़ते या परिवार के साथ समय बिताते थे, अब वह समय कोचिंग सेंटर में बीतता है।सुबह से शाम तक पढ़ाई का बोझ उनके नन्हे कंधों पर बढ़ता जा रहा है।
बच्चों के चेहरे पर मुस्कान की जगह थकान है, और मन में ज्ञान की जिज्ञासा की जगह अब परीक्षा का डर बैठ गया है। अक्सर देखा गया है कि कोचिंग में बच्चों से अपेक्षा की जाती है कि वे सिर्फ अंक लाएँ; सवाल हल करें, टेस्ट में नंबर बढ़ाएँ। इस व्यवस्था में सीखना एक प्रक्रिया न होकर उत्पादन बन गया है, जहाँ हर बच्चा एक “रिजल्ट” के रूप में मापा जाता है।
कभी स्कूल बच्चों की शिक्षा का मुख्य केंद्र हुआ करता था।लेकिन आज कई स्कूल भी अप्रत्यक्ष रूप से कोचिंग संस्थानों पर निर्भर हो गए हैं। कई शिक्षक स्वयं स्कूल के बाद निजी ट्यूशन लेते हैं, जिससे शिक्षा अब सेवा नहीं, व्यवसाय का रूप लेती जा रही है। ऐसे में बच्चों और अभिभावकों के सामने यह दुविधा है कि स्कूल पढ़ाने के लिए है या कोचिंग के लिए रास्ता बनाने के लिए? कई बार यह भी देखा गया है कि स्कूलों में पाठ्यक्रम केवल औपचारिक रूप से पूरा किया जाता है,
और वास्तविक सीख को कोचिंग पर छोड़ दिया जाता है। इस स्थिति ने शिक्षा को उसकी मूल आत्मा ज्ञान और व्यक्तित्व विकास से दूर कर दिया है। कोचिंग के इस बढ़ते चलन ने समाज में एक नया आर्थिक और मानसिक विभाजन भी पैदा कर दिया है। जिनके पास पैसे हैं, वे अपने बच्चों को महंगी कोचिंग में भेज सकते हैं,और जिनके पास नहीं हैं, वे असमंजस में रहते हैं क्या हमारा बच्चा पिछड़ जाएगा? यह असमानता बच्चों के आत्मविश्वास और अवसर दोनों पर असर डालती है।
शिक्षा जो कभी समानता और समरसता का माध्यम मानी जाती थी, अब प्रतिस्पर्धा और वर्ग-भेद की जड़ बनती जा रही है। यह ज़रूरी है कि समाज, अभिभावक और शिक्षण संस्थान सभी मिलकर इस प्रवृत्ति पर विचार करें।कोचिंग व्यवस्था को पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कई बार यह बच्चों को अतिरिक्त मार्गदर्शन देती है।लेकिन यह तभी सकारात्मक है, जब यह पूरक भूमिका निभाए, न कि मुख्य स्थान ले ले।
जरूरत इस बात की है कि स्कूलों में शिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाई जाए, शिक्षकों को प्रशिक्षण और संसाधन मिलें, ताकि अभिभावकों का विश्वास फिर से स्कूलों में लौटे। बच्चों को ऐसा वातावरण मिले जहाँ वे न सिर्फ पढ़ाई करें, बल्कि सोचें, समझें और जीवन को जीना भी सीखें। आज की शिक्षा प्रणाली एक मुकाम पर खड़ी है जहां एक ओर ज्ञान का संसार, दूसरी ओर प्रतिस्पर्धा का व्यापार। बच्चे उस नाज़ुक पुल पर हैं, जहाँ उनका बचपन, उनकी भावनाएँ और उनका मानसिक संतुलन दांव पर है।
कोचिंग का बढ़ता चलन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम अपने बच्चों को अच्छा इंसान बना रहे हैं या सिर्फ सफल छात्र? शिक्षा का उद्देश्य केवल नंबर नहीं, बल्कि संवेदनशील, समझदार और रचनात्मक इंसान बनाना होना चाहिए। यदि हम इस दिशा में सोचें और अपने बच्चों को आत्मनिर्भर सीखने की राह पर चलाएँ,तो शायद आने वाला समय कोचिंग सेंटरों से नहीं, बल्कि बच्चों के भीतर से जन्म लेने वाले ज्ञान से चमकेगा।

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