जौन एलिया की 94 वीं सालगिरह पर सजी महफ़िल मे शायरी का जादू

० नूरुद्दीन अंसारी ० 
नई दिल्ली : उर्दू अदब के लिए मोहब्बत रखने वाले लोग आज मशहूर शायर जौन एलिया को याद कर रहे हैं। जौन एलिया अब इस सरजमी पर न हों लेकिन उनकी रुमानी ओर इश्किया शायरी लोगों के दिल ओ दिमाग में आज भी जिंदा रखे हुए है। प्रख्यात शायर जौन एलिया की 94 वें जन्म दिवस पर दिल्ली के राजेन्द्र भवन में नया एहसास फाउंडेशन के प्रयास से महफिल आयोजित की गई। इस शायरी और गजल के महफिल में शायर जौन एलिया को याद करने के लिए आयोजित इस समारोह में
अहद के मकबूल शायर फरहत एहसास ,शायर महेंद्र कुमार सानी , राजकमल प्रकाशन के एडिटर और शायर तसनीफ़ हैदर और अन्य शायरों ने मुशायरे में शिरकत की। शायरा पूजा भाटिया की हिन्द युग्म से शाया हुई ग़ज़ल की किताब "उसे कहना की ये मैंने कहा है " का रस्मे इजरा मशहूर-ओ -मारूफ़ शायर जनाब फरहत अहसास के हाथों हुआ .मशहूर शायर फरहत एहसास और जौन एलिया की भांजी हुमा रिज़वी ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई 
नई पीढ़ी के पसंदीदा और मशहूर शायर जौन एलिया 14 दिसंबर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा शहर में पैदा हुए और 8 नवंबर 2003 में इनका इन्तिकाल हो गया। जौन साहब के जाने के बाद उनकी शायरी में लोगों की दिलचस्पी खूब बढ़ी और हिंदी में उनका काफी तर्जुमा हुआ। अपने आजाद ख्याल और गैर-रिवायती अंदाज़ के लिए मशहूर जौन ने हालिया दौर की शायरी में एक अलग मुकाम हासिल किया था। बचपन से ही जौन साहब का इल्म और अदब से गहरा राब्ता रहा। इन्हें ऊर्दू , अरबी, फारसी , हिब्रू , संस्कृत और अंग्रेज़ी 6 जबानों में इल्म हासिल था।
हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे का जौन को गहरा सदमा रहा। हिजरत का ये दर्द उनकी शायरी में भी दिखाई देता है। उर्दू अदब में मक़बूल होने के साथ-साथ जौन, शायरी के शौक़ीन लोगों और नौजवानों के दिलों पे छाए रहते हैं। इंटरनेट के दौर में और खासकर आजकल के सोशल मीडिया के ज़माने में न जाने कितने ही पेज, वेबसाइट और चैनल जौन साहब के कलाम को साझा कर रहे हैं और उनके दीवानों की ता'दाद दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।

जौन एलिया की मौत पाकिस्तान में हुई लेकिन उनका जन्म हिंदुस्तान की सरजमीं पर हुआ था। दोनों देशों के साथ पूरी दुनिया में रहने वाले उर्दू जुबान के प्रेमी जौन एलिया से मोहब्बत करते हैं। शायर जौन एलिया को अमरोहा से अलग लगाव था। 
 देश के हालात बदलने के दौरान उन्हें बटवारे के समय पाकिस्तान जाना पड़ा। जहां रहते हुए उन्होंने रूमानी ओर इश्किया शायरी लिखी। अमरोहा से उनका इतना प्यार था कि लखनऊ में एक मुशायरा चल रहा था और जौन ने मंच पर बैठे दूसरे शायर से गौर देने को कहा और बोले, “ख़ातिर न कीजियो कभी हम भी यहाँ के थे !

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