बीमा पेंशनधारकों ने किया विशाल प्रदर्शन

० आशा पटेल ० 
जयपुर । बीमा पेंशनधारकों ने पेंशन दिवस जयपुर में भारतीय जीवन बीमा निगम जीवन प्रकाश, मंडल कार्यालय प्रथम के प्रागंण में सार्वजनिक क्षेत्र की सामान्य बीमा कम्पनियों के पेंशनभोगियो की बढ़ी हुई पारिवारिक पेंशन की तत्काल अधिसूचना जारी करने, LIC एवं GIC कम्पनियों के पेंशनरों की पेंशन का आवधिक संशोधन करने, एनपीएस को समाप्त कर सभी के लिए ओपीएस बहाल करने, बीमा क्षेत्र में शत प्रतिशत विदेशी निवेश का निर्णय वापस लेने आदि मांगो के साथ जीवन प्रकाश प्रांगण में मनाया गया ।
इन्शोरेन्स पेंशनर्स एसोसिएशन जयपुर के महासचिव नवरत्न गुप्ता, बीमा कर्मचारियों के जयपुर मंडल प्रथम के मंडल सचिव सुमित कुमार, अध्यक्ष महेश गुरबाणी, राजेन्द्र मोरानी, शैलेन्द्र कौशिक, हरीश चांद नानी, जयपुर मंडल द्वितीय से लोकेश शर्मा व प्रेमराज शर्मा, ऑल इंडिया इंश्योरेंस पेंशनर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय सहसचिव व आल इंडिया इंश्योरेंस एम्प्लाइज एसोसिएशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामचंद्र शर्मा की अगुवाई में प्रदर्शन किया। प्राकृतिक शोध में गुरुत्व हासिल करने वाली हमारी डा. मनजीत कौर ने जीवन की व्याधियों से निपटने के गूर बताये।

 बनवारी लाल शर्मा की अध्यक्षता में हुई सभा को अखिल भारतीय बीमा पैंशन धारी संगठन आल इंडिया इन्शोरेन्स पेंशनर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय सहसचिव व आल इंडिया इन्शोरेन्स एम्प्लाईज एसोसिएशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रामचंद्र शर्मा ने पेंशनधारियों को बताया कि इसी दिन वर्ष 1982 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ और अन्य के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिसमें पेंशन के अधिकार को कर्मचारियों और श्रमिकों का अविभाज्य अधिकार माना गया था। उस फैसले की विशेषताएं हैं
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(क) पेंशन कोई नि:शुल्क भुगतान या दान नहीं है, बल्कि कर्मचारी का अपने पूर्व परिश्रमपूर्ण सेवा के लिए अर्जित अधिकार है। यह एक सामाजिक कल्याणकारी उपाय है जिसका उद्देश्य सेवानिवृत्त कर्मचारी को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है। (ख) पेंशनभोगी अपनी सेवानिवृत्ति की तिथि के बावजूद एक समरूप वर्ग बनाते हैं और सेवानिवृत्ति की तिथि के आधार पर कोई भी वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। (ग) सरकार की वित्तीय क्षमता भेदभाव को जारी रखने का वैध आधार नहीं हो सकती। सरकार को सभी पेंशनभोगियों के प्रति अपने दायित्वों को समान रूप से पूरा करने के तरीके खोजने होंगे।

 परन्तु केन्द्र सरकार ने 1.4.2004 से नयी पेंशन योजना लागू कर पेंशन के सुनिश्चित लाभ को खत्म कर दिया। पेंशन योजना को बदलकर वार्षिकी पेंशन योजना में बदल दिया है। इस नयी NPS योजना का पूरे देश के कर्मचारी वर्ग का भारी विरोध और पुरानी पेंशन योजना की बहाली व अद्यतन की मांग जारी है। इस बीच सरकारी कर्मचारियों के लिए कुछ संशोधन के साथ UPS के नाम से आई पेंशन योजना को कर्मचारियों ने स्वीकार नहीं किया और पुरानी पेंशन योजना की बहाली व अद्यतन की मांग अभी जारी है।

 पेंशनभोगियों के पेंशन के अधिकार की रक्षा के संघर्ष में यह फैसला एक शक्तिशाली हथियार साबित हुआ। हमें इसे और तेज करने की जरूरत है। हमारे पेंशन अद्यतन की सर्वोच्च न्यायालय में जारी सुनवाई सरकार की ओर से जवाब पेश न होने से अधर में है। सरकारी पक्ष के अभाव में आगे से आगे सुनवाई तिथि बढ़ रही है। ऐसे में संघर्ष जारी रखने के अलावा और कोई चारा नहीं है।

आल इंडिया इन्शोरेन्स एम्प्लाईज एसोसिएशन के उपाध्यक्ष साथी रामचन्द्र शर्मा ने कहा कि 16 दिसम्बर, को लोकसभा में प्रस्तुत किए गए बीमा क़ानून (संशोधन) विधेयक 2025 के जरिये भाजपा की केन्द्र सरकार तीन क़ानूनों में संशोधन करना चाहती है 1. बीमा अधिनियम, 19382. भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अधिनियम, 19563. बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999लोकसभा में केंद्रीय वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत इस विधेयक को चालाकी से “सबका बीमा सबकी रक्षा (बीमा क़ानूनों का संशोधन) विधेयक 2025” नाम दिया गया है।

 संशोधनों के घोषित उद्देश्य बीमा क्षेत्र की वृद्धि को तेज करना, पॉलिसीधारकों की सुरक्षा बढ़ाना, कारोबार करने में सुगमता लाना तथा विनियामक पारदर्शिता और निगरानी को मजबूत करना बताए गए हैं। किंतु वास्तविक मंशा कहीं अधिक घातक प्रतीत होती है यह भारत की बहुमूल्य घरेलू बचत को थाली में परोसकर विदेशी पूंजी के हवाले करने का प्रयास है। प्रस्तुत विधेयक भारतीय बीमा कंपनियों में, पोर्टफोलियो निवेशकों सहित, 100 प्रतिशत तक विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति देने का प्रस्ताव करता है। 

इससे विदेशी पूंजी को देश की घरेलू बचत तक अधिक पहुँच और नियंत्रण मिल जाएगा। यह सर्वविदित है कि किसी भी अर्थव्यवस्था के विकास में घरेलू बचत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। एक कल्याणकारी राज्य के रूप में भारत को अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरा करने के लिए घरेलू बचत पर अधिक नियंत्रण बनाए रखना चाहिए।

 हकीकत यह है कि 31 मार्च 2024 तक बीमा उद्योग में विदेशी इक्विटी का स्तर ₹31,365.57 करोड़ है, जो अनुमेय 74 प्रतिशत सीमा के मुकाबले केवल 32.67 प्रतिशत है। ऐसे में FDI को 100 प्रतिशत तक बढ़ाने से बीमा उद्योग में गंभीर अव्यवस्था उत्पन्न होगी। यदि विदेशी साझेदार संयुक्त उपक्रमों से हटकर स्वतंत्र रूप से व्यवसाय चलाने का निर्णय लेते हैं, तो घरेलू कंपनियों पर इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा। यह कतई देशहित में नहीं है।

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