अरावली को खण्ड-खण्ड करने की साजिश ,अस्तित्व का मंडरा रहा संकट
० ज्ञानेन्द्र रावत ०
आज अरावली पर सुप्रीम कोर्ट की परिभाषा के अनुसार अरावली पर्वत वह भू आवृत्ति है जिसकी ऊंचाई उसके आसपास के भूभाग से कम से कम 100 मीटर अधिक हो। अरावली पर्वत माला ऐसे दो या दो से अधिक पहाड़ियों का समूह है, जो एक दूसरे से 500 मीटर की दूरी से अधिक हो। सुप्रीम कोर्ट की इस नयी परिभाषा से देश में खासकर अरावली पर्वत माला अंतर्गत आने वाले राज्यों में जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं, आंदोलन हो रहे हैं, शहर-कस्बों तक में, बैठकों और स्कूल-कालेजों में जन जागरण के माध्यम से छात्रों व आमजन को अरावली पर आये खतरे के बारे में सचेत किया जा रहा है।
आज अरावली पर सुप्रीम कोर्ट की परिभाषा के अनुसार अरावली पर्वत वह भू आवृत्ति है जिसकी ऊंचाई उसके आसपास के भूभाग से कम से कम 100 मीटर अधिक हो। अरावली पर्वत माला ऐसे दो या दो से अधिक पहाड़ियों का समूह है, जो एक दूसरे से 500 मीटर की दूरी से अधिक हो। सुप्रीम कोर्ट की इस नयी परिभाषा से देश में खासकर अरावली पर्वत माला अंतर्गत आने वाले राज्यों में जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं, आंदोलन हो रहे हैं, शहर-कस्बों तक में, बैठकों और स्कूल-कालेजों में जन जागरण के माध्यम से छात्रों व आमजन को अरावली पर आये खतरे के बारे में सचेत किया जा रहा है।
यह सब इतना हो-हल्ला और हाहाकार इसलिए है कि अरावली पर्वत माला आज खतरे में है। दरअसल उत्तर भारत की सबसे पुरानी इस पर्वतमाला पर आज अपने अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। जानकारों का मानना है कि आज 670 मिलियन साल पुराने इतिहास को जमींदोज करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके परिप्रेक्ष्य में सर्वोच्च न्यायालय के 20 नवम्बर के आदेश पर ध्यान दें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अगर यह लागू हो गया तो यह निश्चित है कि अरावली तो हरियाली विहीन हो ही जायेगी,
यह समूचा अंचल, भूजल क्षेत्र, भूजल भंडार, वन्य-जीव,उनके आश्रय स्थल सहित इस क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों करोड लोगों के खाद्य एवं सुरक्षा खतरे में पड जायेगी। यह खतरा केवल राजस्थान, हरियाणा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे अरावली परिक्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सीमावर्ती राज्य दिल्ली और गुजरात भी अछूते नहीं रहेंगे। वन मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट ने भी इस आशंका को बल प्रदान किया है कि क्या अरावली बचेगी ?पर्यावरणविदों, वन्यजीव विशेषज्ञों और आमजन की चिंता का सबब यही है।
यदि सुप्रीम कोर्ट के 20 नवम्बर के आदेश और वन मंत्रालय की रिपोर्ट का जायजा लें तो अरावली की पहाडियों की जो नयी परिभाषा है, उसके मुताबिक अरावली का 90 फीसदी इलाका कानूनी संरक्षण से बाहर हो जायेगा। उसके हिसाब से जिस जमीन पर मौजूदा समय में पहाड़ हैं और जंगल हैं, यदि यह फैसला लागू हो गया तो वहां जल्द ही कंक्रीट के जंगल और खनन माफियाओं का कब्जा हो जायेगा। नतीजतन पूरी अरावली खंड खंड हो जायेगी और अरावली का नामोनिशानमिट जायेगा।
उस दशा में जबकि बीते चार दशकों से लगातार निर्बाध गति से जारी खनन से अरावली की पहाड़ियों की ऊंचाई दिन-ब-दिन घटती जा रही है।विडम्बना देखिये कि उसके बावजूद हमारे केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री श्री भूपेंद्र यादव जी यह दावा करते नहीं थकते कि अरावली क्षेत्र में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है। उनका दावा है कि इस बारे में विपक्ष भ्रम फैला रहा है। जबकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अंतर्गत फरीदाबाद
जिला इसका जीता-जागता सबूत है
जहां खनन से पहले अरावली की पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से काफी ऊंची थी। जिले में अरावली का रकबा करीब 10 हजार हैक्टेयर है। यह रकबा करीब करीब 20 गांवों में आता है। इस हिस्से में पिछले लगभग 40 सालों में पत्थर और सिल्का सेंड के लिए बराबर खनन किया जाता रहा है। इसके चलते खनन कारोबारियों कहें या खनन माफियाओं ने पहले तो अरावली में पहाड़ियों को खत्म किया। उसके बाद उन्होंने वहां करीब 500 फीट गहरी खदानें बना डालीं।
जिला इसका जीता-जागता सबूत है
जहां खनन से पहले अरावली की पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से काफी ऊंची थी। जिले में अरावली का रकबा करीब 10 हजार हैक्टेयर है। यह रकबा करीब करीब 20 गांवों में आता है। इस हिस्से में पिछले लगभग 40 सालों में पत्थर और सिल्का सेंड के लिए बराबर खनन किया जाता रहा है। इसके चलते खनन कारोबारियों कहें या खनन माफियाओं ने पहले तो अरावली में पहाड़ियों को खत्म किया। उसके बाद उन्होंने वहां करीब 500 फीट गहरी खदानें बना डालीं।
यह सिलसिला यहां पूरे जिले में आज भी जारी है। यहां आज भी करीब 300 से ज्यादा क्रैशर बेरोकटोक चल रहे हैं। यह हालत केवल अकेले फरीदाबाद जिले की ही नहीं,बल्कि पूरे अरावली क्षेत्र में कमोबेश जारी है। यह उदाहरण हमारे वन मंत्री के दावे की हकीकत बयां करता है। यहां सरकार और उसके मंत्रियों के दावों का जायजा लें तो एक ओर तो वह कहते हैं कि अरावली में खनन की अनुमति नहीं दी जायेगी और सरकार अरावली के संरक्षण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, उसकी रक्षा के लिए संकल्पित है।
वहां किसी तरह का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। वहीं दूसरी ओर खनन हेतु पट्टे जारी किये जा रहे हैं। राजस्थान तो इसका जीता-जागता प्रमाण है। कोटपुतली, बहरोड, सीकर और नीम का थाना तो मात्र उदाहरण हैं जबकि यह प्रक्रिया पूरे राजस्थान में जारी है। अरावली को लेकर देश में आ गये भूचाल को देखते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने नया प्लान बनने तक अब राज्यों को अरावली पर नये खनन पट्टे नहीं जारी करने का निर्देश दिया है जो पूरी तरह धोखा देने वाला है। इससे खुश होने की जरूरत नहीं है। विचारणीय यह है कि जहां पट्टे दे दिये गये हैं और वहां खनन जारी है,उसे कौन रोकेगा?
फॉरेस्ट सर्वे आफ इंडिया की रिपोर्ट की मानें तो वर्तमान में अरावली क्षेत्र में कुल मिलाकर छोटी-बड़ी 19 हजार पहाड़ियां चिन्हित हैं। लेकिन नयी परिभाषा के मुताबिक पहाड़ी के मानक बदल दिये गये हैं। जाहिर है कि नयी परिभाषा अरावली को नष्ट करने वाली साबित होगी। इससे न केवल काफी नुकसान होगा बल्कि समूची अरावली पर इसका व्यापक दुष्प्रभाव पड़ेगा और वह खण्ड - खण्ड हो जायेगी। सुप्रीम कोर्ट ने तो पहले भी सी ई सी की रिपोर्ट पर संज्ञान लेते हुए अरावली में खनन पर रोक लगाई थी।
जहां तक पहाड़ की ऊंचाई का सवाल है, पहाड़ की ऊंचाई का पैमाना समुद्र तल से तय होता है। जबकि देखा जाये तो अमूमन अरावली की फैली अधिकांश पहाड़ियों की ऊंचाई 300 मीटर के आसपास है। हकीकत यह है कि दिल्ली और गुरग्राम के धरातल की ऊंचाई समुद्र तल से 240 से 260 मीटर के आसपास है। ऐसे में नयी परिभाषा के मुताबिक अरावली की पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से कम यानी 40 से 60 मीटर तक हो जाती है।
इसके चलते तकरीबन 90-95 फीसदी वानिकी क्षेत्र अरावली के दायरे से बाहर हो जायेगा। केवल एक फीसदी ही पहाड़ियां बाकी बची रह पायेंगीं। रिपोर्ट के पैराग्राफ 30-31 में विशेषज्ञों-पर्यावरणविदों ने यही चिंता जाहिर की है। इसके चलते अरावली पर्वत श्रृंखला का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। यही सबसे बड़ा खतरा है जिससे बचने की जरूरत है। दुखदायी बात यह है कि हमारे केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री किस आधार पर यह दावा कर रहे हैं कि इस परिभाषा के मुताबिक अरावली का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा संरक्षित क्षेत्र के तहत आयेगा। यह समझ से परे है।
जहांतक एनसीआर का सवाल है, यहां पर एक तरह से खनन माफियाओं का एकछत्र राज रहा है। एन सी आर में लगभग 31 पहाड़ का तो खनन माफियाओं ने अस्तित्व ही मिटा दिया है। बहुतेरे खत्म होने के कगार पर हैं। एनसीआर में वैसे ही जानलेवा प्रदूषण के चलते लोगों का सांस लेना दूभर हो गया है, इस आदेश के क्रियान्वयन से तो यहां के लोगों का सांस लेना सपना बन जायेगा और वह इतिहास की किताबों में दर्ज हो जायेगा।
दरअसलअरावली का सवाल हमारे जीवन- मरण का सवाल है। असलियत में अरावली हमारी जिम्मेदारी है। अरावली हमारे लिए जीवनदायिनी है, धरोहर है। वह केवल पहाड़ नहीं है, वह हमारे इन चारों राज्यों यथा- दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात की जीवन रेखा है। अरावली हमारे लिए शुभ है, लेकिन वर्तमान व्यवस्थाएं इसमें लाभ ढूंढने में लगीं हैं, जिसके चलते ही इसकी परिभाषा बदल कर देश के एक चौथाई हिस्से को बर्बाद करने का रास्ता साफ कर दिया गया है।
कहा तो यहां तक जा रहा है और वन्य जीव विशेषज्ञों तथा जानकारों का मानना है कि अरावली की 25 प्रतिशत पहाड़ियां तो नष्ट हो ही चुकीं हैं या वे नष्ट होने के कगार पर है, 100 मीटर वाला नियम लागू हो जाने पर यहां की 90 प्रतिशत से ज्यादा पहाड़ियां नष्ट हो जाएंगी, किसान बर्बाद हो जाएगा, वन्य जीवों का जीवन जीना दुर्लभ हों जाएगा, प्रदूषण और तापमान बढ़ेगा। नदियां मर जाएंगीं, शुद्ध हवा पानी ,का संकट बढ़ेगा। साथ ही हमारा इकोलॉजिकल सिस्टम गड़बड़ा जाएगा जो आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक होगा।
अरावली के संदर्भ में आमजन की एकमुश्त राय है कि अरावली पर्वत श्रृंखला केवल पहाड़ नहीं है जिसे 100 मीटर कर दो। सत्ताधारियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे केवल मेहमान हैं, देश के मालिक नहीं हैं। वे हमेशा नहीं रहेंगे। खनिज संपदा के लिए अरावली पर्वत माला को नामी-गिरामी उद्योगपतियों के हाथों बेचने की साजिश देश के भविष्य के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। अरावली को बचाना अपरिहार्य है क्योंकि यह एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच है।
यदि ऐसे कुत्सित प्रयास को नहीं रोका गया तो दिल्ली के लोग तो दिल्ली छोड़ने को बाध्य हो जायेंगे। अरावली नहीं बची तो हम इसकी कल्पना कर सकते हैं कि इसका परिणाम क्या होगा। यह जान लेना चाहिए कि पहाड़ गर्म हवाओं को रोकते हैं, बादलों को थामते हैं और करोड़ों-करोड लोगों को जीने लायक वातावरण प्रदान करते हैं। इसमें दो राय नहीं है कि यदि अरावली मिटेगी, तो भविष्य मिटेगा। और इस सबके लिए आने वाली पीढ़ियां हमें कतई माफ नहीं करेंगीं। हमें इसे लाभ से नहीं, शुभ से देखना चाहिए, जिससे हमारा भविष्य सुरक्षित रह सके।
हमें इसका भान होना चाहिए कि अरावली पर्वतमाला का प्रकृति और मानव के साथ अन्तर्सम्बन्धों को पर्यावरण विज्ञान दर्शाता है। सनातन संस्कृति से स्पष्ट होता है कि अरावली भारत वासियों के लिए शुभ है, लेकिन आधुनिक प्रोद्यौगिकी, आधुनिक विज्ञान इसमें लाभ ढूंढने में लगे हैं। व्यवस्थाएं भी शुभ नहीं लाभ के लिए अरावली की बलि देने की तैयारी में जुट गई हैं।
विश्व की सबसे पुरानी इस पर्वत माला से लाभ की कामनाओं के परिणाम लम्बे समय तक सकारात्मक ऊर्जा देने वाले नहीं बल्कि देश के राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों जल, जंगल, नदियों, मानव के अनुकूल वातावरण को नष्ट कर एक विनाश की और धकेलने वाला सिद्ध होगा।
पर्यावरण पर पहले ही विकास के नाम पर हो रहे नुकसान से प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इससे और अधिक दुष्प्रभाव पड़ेगा, स्वच्छता नष्ट होगी, स्वास्थ्य ख़राब होगा, प्रदूषण बढ़ेगा, नदियां मरेंगी, वन्य जीव खत्म होंगे, आर्द्र भूमि नष्ट होगी, तापमान बढ़ेगा, मरुस्थलीकरण में बढ़ोतरी होगी, स्वच्छ वायु खत्म होगी, वह सपना बन जायेगी और मानव जीवन कष्टमय हो जायेगा।
पर्यावरण पर पहले ही विकास के नाम पर हो रहे नुकसान से प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इससे और अधिक दुष्प्रभाव पड़ेगा, स्वच्छता नष्ट होगी, स्वास्थ्य ख़राब होगा, प्रदूषण बढ़ेगा, नदियां मरेंगी, वन्य जीव खत्म होंगे, आर्द्र भूमि नष्ट होगी, तापमान बढ़ेगा, मरुस्थलीकरण में बढ़ोतरी होगी, स्वच्छ वायु खत्म होगी, वह सपना बन जायेगी और मानव जीवन कष्टमय हो जायेगा।
अतः अरावली पर्वतमाला की परिभाषा जो तय की गयी है, उसे वापस लिया जाए, अरावली को सरंक्षण देने हेतु ठोस कदम उठाए जाएं, जिससे यहां का इकोलॉजिकल सिस्टम बना रह सके और देश का प्राकृतिक संतुलन बना रह सके।
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