कर्त्तव्य पर अडिग रहे

 



विजय सिंह बिष्ट


जीवन यात्रा के पल
बृद्ध हैं हम अपंग,
आंसुओं में पल रहे हैं।
कंटकों में जीवन बिताया,
नहीं वेदना भुला रहे हैं।
सतपथ के अनुगामी रहे,
अपने ही हमें, झुठला रहे हैं।


कर्त्तव्य पर अडिग रहे,
कर्त्तव्य च्युत बतला रहे हैं।
सहायक बने मित्रता में,
वे असहाय छोड़े जा रहे हैं।
बदलाव की बयार है ये,
जिन्हें आपात में था संभाला,
वे सम्पन्न अब पीठ दिखला रहे हैं।
पराये तो पराये ही रहे,
अपने भी मुंह छिपा रहे हैं।


स्वार्थ की बलवेदी पर,
जब तक चढ़ते रहेंगे।
आज हमको चढ़ा रहे हो,
कल तुम भी चढ़ोगे।
श्रृष्टि का ये कर्मफल है,
एक हाथ से दोगे, दूजे से पाओगे।
आशीष देते हैं तुम्हें,
तुम न ये सफर करना।
सीख कड़वी है मगर,
पथ बिचलित कभी न होना।
 


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