कविता // सुन ले दुश्मन,जो भारत का बच्चा-बच्चा बोल रहा


स्वीटी सिंघल ‘सखी’


सुन ले दुश्मन, जो भारत का बच्चा-बच्चा बोल रहा
उधर ख़ून बिखरा जवान का, इधर हमारा खौल रहा
वो जो इतने सालों हमको हल्के में था तोल रहा
सन् बासठ की तरह देखो फिर अपना मुँह खोल रहा।


पहले अपने सामानों से भर डाले सारे बाज़ार 
फिर वायरस का जाल बिछाकर कर डाला सबको लाचार
और अब इसकी हिम्मत देखो गलवान में किया वार
बहुत हो चुका हिंदी-चीनी भाई-भाई का हुंकार।


तय है हम फिर से वो ग़लती हरगिज़ न होने देंगे 
अपनी मिट्टी में ग़ैरों को फ़सल नहीं बोने देंगे 
खो बैठे कुछ बेटे लेकिन और नहीं खोने देंगे 
क़सम हिंद की, अब दुश्मन को चैन से न सोने देंगे।


माना हिंदुस्तान जहाँ में शांतिदूत कहलाता है
प्रेम अहिंसा की धरती, गौतम-गांधी से नाता है
पर हर भारतीय का सीना छप्पन का हो जाता है
जब-जब अपनी शान तिरंगा परचम पर लहराता है।


अब हर एक हिंदुस्तानी को अपना फ़र्ज़ निभाना है
जो सीमा पर जान गँवाते, उनका क़र्ज़ चुकाना है
अपने घर से, बाज़ारों से चीन का नाम मिटाना है
इस चीनी ड्रैगन को अब इसकी औक़ात दिखाना है।


वीरों की क़ुरबानी को हम व्यर्थ नहीं जाने देंगे 
अपनी पूँजी को उनका हथियार नहीं बनने देंगे
प्रण लेते है अब कोई चीनी सामान नहीं लेंगे 
बहिष्कार की ताक़त से दुश्मन को धूल चटा देंगे।


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