पीयूष मिश्रा का पहला उपन्यास छपते ही बना बेस्टसेलर

० योगेश भट्ट ० 
नई दिल्ली. चर्चित अभिनेता, गीतकार और नाटककार पीयूष मिश्रा का पहला उपन्यास 'तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा' प्रकाशित होते ही नंबर एक बेस्टसेलर बन गया है. पाठकों की तरफ से उपन्यास की इतनी माँग आ रही है कि सभी भाषाओं की सभी श्रेणियों की किताबों में यह पहले स्थान पर पहुंच गया है. एक सप्ताह के अंदर 'तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा' के तीन संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं. 'तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा' का प्रकाशन राजकमल प्रकाशन ने किया है. राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने बताया कि 'तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा' प्रकाशित होते ही पाठकों की पहली पसंद बन गई है. उनके मुताबिक, लोगों के बीच इस उपन्यास को लेकर असाधारण उत्साह है. 

अशोक महेश्वरी ने कहा, हिंदी पाठकों का यह उत्साह स्वागतयोग्य है. आज के पाठकों की दिलचस्पी और अध्ययन का दायरा बहुत व्यापक हो चुका है. साहित्य का दायरा भी पारंपरिक विधाओं और विषयों से काफी आगे बढ़ चुका है. पीयूष मिश्रा के आत्मकथात्मक उपन्यास के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया आत्मकथात्मक उपन्यास के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया उनके मिजाज और अपेक्षाओं का स्पष्ट संकेत है. उन्होंने कहा, हम विभिन्न विधाओं और विषयों की स्तरीय पुस्तकों के प्रकाशन के जरिये अपने पाठकों की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. 'तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा' का प्रकाशन इसी की कड़ी है.

पीयूष मिश्रा जब मंच पर होते हैं तो वहाँ उनके अलावा सिर्फ़ उनका आवेग दिखता है। जिन लोगों ने उन्हें मंडी हाउस में एकल करते देखा है, वे ऊर्जा के उस वलय को आज भी उसी तरह गतिमान देख पाते होंगे। अपने गीत, अपने संगीत, अपनी देह और अपनी कला में आकंठ एकमेक एक सम्पूर्ण अभिनेता! अब वे फिल्में कर रहे हैं, गीत लिख रहे हैं, संगीत रच रहे हैं; और 'तुम्हारी औक़ात क्या है पीयूष मिश्रा' उनकी आत्मकथा है जिसे उन्होंने उपन्यास की तर्ज़ पर लिखा है। और लिखा नहीं; जैसे शब्दों को चित्रों के रूप में आँका है। इसमें सब कुछ उतना ही ‘परफ़ेक्ट’ है जितने बतौर अभिनेता वे स्वयं। न अतिरिक्त कोई शब्द, न कोई ऐसा वाक्य जो दृश्य को और सजीव न करता हो।

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक ‘अनयूजुअल’-से परिवार में जन्मा एक बच्चा चरण-दर-चरण अपने भीतर छिपी असाधारणता का अन्वेषण करता है; और क़स्बाई मध्यवर्गीयता की कुंठित और करुण बाधाओं को पार करते हुए धीरे-धीरे अपने भीतर के कलाकार के सामने आ खड़ा होता है। अपने आत्म के सम्मुख जिससे उसे ताज़िन्दगी जूझना है; अपने उन डरों के समक्ष जिनसे डरना उतना ज़रूरी नहीं, जितना उन्हें समझना है। इस आत्मकथात्मक उपन्यास का नायक हैमलेट, यानी संताप त्रिवेदी यानी पीयूष मिश्रा यह काम अपनी ख़ुद की क़ीमत पर करता है।

यह आत्मकथा जितनी बाहर की कहानी बताती है—ग्वालियर, दिल्ली, एनएसडी, मुम्बई, साथी कलाकारों आदि की—उससे ज़्यादा भीतर की कहानी बताती है, जिसे ऐसी गोचर दृश्यावली में पिरोया गया है जो कभी-कभी ही हो पाता है। इसमें हम दिल्ली के थिएटर जगत, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया के कई सुखद-दुखद पहलुओं को देखते हैं; एक अभिनेता के निर्माण की आन्तरिक यात्रा को भी, और एक संवेदनशील रचनात्मक मानस के भटकावों-विचलनों-आशंकाओं को भी। लेकिन इस किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि इसका गद्य है। पीयूष मिश्रा की कहन यहाँ अपने उरूज़ पर है। पठनीयता के लगातार सँकरे होते हिन्दी-परिसर में यह गद्य खिली धूप-सा महसूस होता है।

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