फर्टीलाइज़र एसोसिएशन ऑफ इंडिया का सेमिनार : उर्वरक एवं कृषि क्षेत्रों में इनोवेशन्स

० नूरुद्दीन अंसारी ० 
उद्योग जगत देश के कृषि एवं आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है। सरकार ने किसानों को कीमतों की उथल-पुथल से सुरक्षित बनाया है। उद्योग जगत ने सरकार के प्रयासों एवं बड़ी आबादी के लिए भोजन सुरक्षा को सुनिश्चित करने में मुख्य भुमिका निभाई है। ऐसे में हमें उद्योग जगत को स्थायी बनाने के लिए अनुकूल नीतियों का निर्माण करना होगा।
नयी दिल्ली : एफएआई 6-8 दिसम्बर के दौरान 59वें सालाना सेमिनार का आयोजन कर रहा है, जिसका विषय होगा ‘इनोवेशन इन फर्टीलाइज़र एण्ड एग्रीकल्चर सेक्टर यानि उर्वरक एवं कृषि क्षेत्र में इनोवेशन्स’। इसके मद्देनज़र एन. सुरेश कृष्णन चेयरमैन, एफएआई, एस. सी. मेहता, को-चेयरमैन, एफएआई, अरविंद चौधरी, डायरेक्टर जनरल, एफएआई, तथा एफएआई के डायरेक्टर्स ने प्रेस सम्मेलन को सम्बोधित किया।

सेमिनार का उद्घाटन केन्द्रीय रसायन एवं उर्वरक तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ मनसुख मंडाविया करेंगे। उद्घाटन सत्र के दौरान अतिथि भगवंत खुबा, रसायन एवं उर्वरक मंत्री और नवीन एवं नवीकरणीय उर्जा राज्य मंत्री तथा रजत कुमार मिश्रा, सचिव (उर्वरक) विशेष अतिथि होंगे। एफएआई ने कृषि उत्पादकता में सुधार के लिए अनुसंधान एवं विकास में वैज्ञानिकों के योगदान तथा उत्पादन, पर्यावरण प्रदर्शन, सुरक्षा, लघु पोषक तत्वों के विपणन आदि के लिए पुरस्कारों की घोषणा भी की है, जिनका वितरण मुख्य अतिथि द्वारा किया जाएगा।

दुनिया भर में कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि उर्वरकों ने अनाज की उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उर्वरकों के इस्तेमाल के बारे में गलत अवधारणाओं को दूर करना ज़रूरी है। इस सत्र के दौरान उद्योग जगत के विशेषज्ञों के साथ इंटरैक्टिव सत्र का आयोजन किया जाएगा, इस सत्र के द्वारा किसानों, मीडिया एवं आम जनता में उर्वरकों के बारे में मौजूद गलत अवधारणाओं को दूर किया जाएगा। सत्र की अध्यक्षता नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद करेंगे। उर्वरक विभाग एवं कृषि मंत्रालय के वरिष्ठ सरकारी अधिकारी भी सत्र में मौजूद रहेंगे।

सेमिनार के दौरान नीतियों पर चर्चा, कृषि में विकास, विपणन एवं उत्पादन तकनीकों पर विचार-विमर्श के लिए अन्य सत्रों का आयोजन भी किया जाएगा। इन सत्रों में कुल 18 प्रेज़ेन्टेन्स होंगी, जिनमें निम्नलिखित विषयों को कवर किया जाएगाः  विश्व में उर्वरक मांग व आपूर्ति का दृश्य, कच्चे माल और तैयार उत्पादों की मांग, आपूर्ति और कीमतों के रूझान, कृषि प्रथाओं में इनोवेशन और नए उत्पाद, देश में भोजन और पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए मिलेट्स की भूमिका, मौजूदा उर्वरक उत्पादन में हरित उर्जा का उपयोग
, उर्वरक प्लांट्स के उत्पादन, दक्षता, सुरक्षा एवं विश्वसनीयता में सुधार।, स्लो रिलीज़ फर्टीलाइज़र के रूप में सल्फर कोटेड उर्वरकों का उत्पादन, डिजिटल एवं आधुनिक तकनीकं, वितरण एवं विपणन, किसानों को सशक्त बनाने के लिए सरकार की पहलें, उर्वरकों की स्थिति

अप्रैल से अक्टूबर, 2023 के दौरान यूरिया, डीएपी, एपी/ एपीके कॉम्पलेक्स के उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई, लेकिन पिछले साल की तुलना में एसएसपी के उत्पादन में गिरावट आई। अप्रैल से अक्टूबर 2023 के दौरान युरिया और एमओपी आयात में 9.7 फीसदी और 63.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। वहीं डीएपी और एनपी/एनपीके के आयात में इसी अवधि के दौरान 8.8 फीसदी और 18 फीसदी की कमी आई। सभी प्रमुख उर्वरकों की बिक्री में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में सकारात्मक बढ़ोतरी दर्ज की गई।

एनपीके के इस्तेमाल का अनुपात मुख्य मुद्दा है, जो 2009-10 में सुधार होकर तकरीबन 4.3ः2ः1 हुआ लेकिन खरीफ 2022 में यह 12.8ः5ः1 तक तथा खरीफ 2023 के दौरान 10.9ः4.9ः1 पर पहुंच गया। इसलिए उर्वरक नीति ऐसी होनी चाहिए जिससे एनपीके अनुपात संतुलित बन सके। भारत उर्वरकों के लिए विभिन्न प्रकार के कच्चे माल एवं फीडस्टॉक के आयात पर निर्भर है। दुनिया भर में उर्वरकों की कीमतें और भोगौलिक राजनैतिक स्थितियां स्वदेशी निर्माताओं की व्यवहारिकता को प्रभावित करती हैं। पिछले साल उर्वरकों की कीमतों में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई, जो 2022-23 की दूसरी तिमाही में कम हो गई। जो अब फिर से बढ़ने लगी है।

उदाहरण के लिए डीएपी की कीमत अप्रैल 2022 में 924 डॉलर प्रति एमटी थी, जो जुलाई 2023 में गिर कर 440 डॉलर प्रति एमटी हो गई और अक्टूबर 2023 में फिर से बढ़कर 595 डॉलर तक पहुंच गई। इसी तरह फॉस्फोरिक एसिड की कीमतें अप्रैल 2022 में 1530 डॉलर प्रति एमटी थी जो गिर कर जुलाई 2023 में 970 डॉलर तक पहुंच गई और फिर से बढ़कर अक्टूबर 2023 में 985 तक पहुंच गई। इसी तरह अमोनिया की कीमतें अप्रैल 2022 में 1530 डॉलर प्रति एमटी थी, जो जुलाई 2023 तक गिर कर 285 डॉलर तक पहुंच गई और अक्टूबर 2023 में फिर से बढ़कर 575 डॉलर तक पहुंच गई। युरिया का उत्पादन 80-85 फीसदी आयात किए गए आरएलएनजी पर निर्भर है।

युरिया प्लांट्स की निर्धारित लागत ; पिगमक बवेजद्ध में 2008-09 के बाद से संशोधन नहीं हुआ है जबकि इनकी कीमतों में काफी बढ़ोतरी हुई है। उर्जा की खपत के नियम 2015 के बाद से दो गुना सख्त हो गए हैं। उल्लेखनीय है कि भारतीय उर्वरक प्लांट की दक्षता दुनिया के सर्वश्रेष्ठ प्लांट्स के समकक्ष है। अमोनिया और युरिया प्लांट्स की उर्जा दक्षता में पिछले 36 सालों में तकरीबन 36 फीसदी सुधार हुआ है। उर्जा में खपत में कमी लाने के लिए पूंजी के निवेश की ज़रूरत होगी। ऐसे में नीतियों के निर्माण में भी पूंजी निवेश पर विचार करना होगा।

आयातित कच्चे माल पर सीमा शुल्क अधिक है, इसलिए डीएपी व एनपीके उर्वरक की कीमते बढ़ जाती है। आवश्यक है कि कच्चे माल पर भी सीमा शुल्क कम होना चाहिए। दूसरी ओर एनबीएस से सम्बंधित तत्वों की कीमतों में भारी गिरावट से एन पीएनपीके बनाने वाली कंपनियों से शुद्ध लाभ में कमी होगी। पोटाश की स्धिति तो और भी गंभीर बनी हुई है क्योंकि पोटाश पर सब्सिडी काफी कम कर दी गयी है। एनपीके उपयोग अनुपात और भी असंतुलित हो जायेगा। इस पर भी भारत सरकार को विचार करना चाहिए।

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