संगीता गुप्ता की प्रदर्शनी आदियोगी शिव : ए जर्नी इन कॉस्मिक इंडिगो कलानेरी आर्ट गैलरी में

० आशा पटेल ० 
जयपुर। संगीता गुप्ता की एकल प्रदर्शनी, जिसका शीर्षक आदियोगी शिव : ए जर्नी इन कॉस्मिक इंडिगो के 12वें संस्करण का उदघाटन मुख्य अतिथि जगदीश चंद्र,सीईओ, भारत24 एवं विशिष्ट अतिथि के सुब्रमण्यम,आईएएएस, एवं विशेष अतिथि चित्रकार विद्यासागर उपाध्याय एवं समाजसेवी सुधीर माथुर ने किय  पूर्व मुख्य आयकर आयुक्त और एक प्रसिद्ध अमूर्त कलाकार, कवि और फिल्म निर्माता के रूप में प्रसिद्ध, संगीता गुप्ता की जयपुर में वस्त्रों पर नील द्वारा तैयार की गई 18 कृतियों व 24 कैनवास पेंटिंग्स को कलानेरी आर्ट गैलरी प्रदर्शित किया गया।
गैलरी की ओनर सौम्या विजय शर्मा ने बताया की सांगानेर-छापा कला तकनीक से प्रेरित प्राकृतिक इंडिगो पैलेट का उपयोग करके खादी कपड़े पर बनाई गई यह प्रदर्शनी, शिव-शक्ति के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करती है। अपनी क्रांतिकारी कलात्मक दृष्टि के माध्यम से, संगीता गुप्ता ने भगवान शिव को उनके कई प्रतीकात्मक रूपों - डमरू, त्रिशूल, तीसरी आंख, अर्धनारीश्वर रूप और विभिन्न तांडव - में अमूर्त और विचारोत्तेजक रचनाओं में प्रस्तुत किया है।  कलाकार संगीता गुप्ता ने बताया की हाल ही में उनके द्वारा तैयार की गई 80 से ज्यादा ऐसी कृतियां बिहार म्यूजियम पटना में प्रदर्शित की गई थी।
आदियोगी शिव की ‘अर्धनारी नटेश्वर’ श्रृंख्ला का कला पक्ष जितना सुंदर है, उतना ही भावप्रवण भी। यह संगीता गुप्ता की अमूर्त-पद्धति की एक अपूर्व और मनोरम कला- यात्रा है। कपड़े पर चित्रांकन की यह पद्धति नई तो नहीं है, पर उसे एक अमूर्त चित्रकार का सृजन के लिए बरतना बहुत महत्वपूर्ण है। राजस्थान की पण कला यानी पटचित्रण की कला प्राचीन है जिसमें कपड़े पर ठप्पों से छपाई होती रही है। मूलत: अनुष्ठानिक और पारम्परिक कला की यह पद्धति राजस्थानी कला की विशिष्टता रही है जिसका सम्बन्ध सांस्कृतिक रूप से उल्लेखनीय और राजनीतिक रूप से प्रजा-वत्सल नायकों की गाथाओं के अंकन से जुड़ता है

 जिनका लोकमानस से रागात्मक सम्पर्क रहा है। इन पटचित्रणों के साथ गाथात्मक गायन, सांगीतिक प्रस्तुतियों और तदानुसार नर्तनों की लंबी परम्परा रही है। कला का चित्रण, गायन और नर्तन का रूप जितना मनोहारी रहा, उतना ही भाव-सजग भी; जो राजस्थान के लोक समाज को एक गौरव-बोध देता रहा है। दिलचस्प यह है कि पटचित्रण कला, संगीत और नृत्य के समन्वय में होता रहा है, पर उसे कभी गंभीर और शास्त्रीय कला मानने से हमेशा गुरेज किया जाता रहा।

संगीता गुप्ता ने पटचित्रण की इस पद्धति के लिए खादी के कपड़े का चुनाव किया, जो स्वयं पवित्रता का पर्याय है। खादी हमारी विचार परम्परा में एक दृष्टि का घोतक है जिसमें स्वावलम्बन और समरसता का भाव है। एक समय में इस खादी ने साम्राज्यवाद के विरूद्ध भारतीय जनता के संघर्ष-प्रतीक की भूमिका निभाई थी जिसे गांधी जी ने अपने सत्याग्रह का एक चमत्कारिक उपकरण बनाया था। स्वयं सूत कातकर बनाए गये वस्त्र को पहनने के आह्वान से खादी, वस्त्र से अधिक एक दृढ़ विचार हो गई थी

  हमने स्वराज को सर्वोदय में देखने की कल्पना की थी। संगीता द्वारा पटचित्रण के लिए खादी का चुनाव सामरस्य भाव का दिग्दर्शन है जिसमें स्वराज का पवित्र ध्येय है और सर्वोदय, अद्वैत, असमानता, शुचिता तथा नैतिकता जैसे तत्व समाहित हैं जो हमें अपने व्यापक ‘लोक’ से जोड़ते हैं।

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