नालंदा डायलॉग साहित्य, संस्कृति, नीति, शिक्षा और कला को जोड़ते हुए भारत और विश्व में संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देगी
० योगेश भट्ट ०
नई दिल्ली : नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल (Nalanda Littfest) ने दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान “नालंदा लिटरेचर डायलॉग्स 2026–27” के शुभारंभ की घोषणा की। यह वर्षभर चलने वाली बहु-शहरी सांस्कृतिक पहल, नालंदा लिटरेचर सोसाइटी के व्यापक दायरे में संचालित की जाएगी।
यह पहल भारत की समृद्ध सभ्यतागत ज्ञान परंपराओं को समकालीन वैश्विक विमर्श से जोड़ने के उद्देश्य से विकसित की गई है। फेस्टिवल पारंपरिक वार्षिक आयोजन की सीमाओं से आगे बढ़ते हुए स्वयं को एक सतत विचार, सहभागिता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के सशक्त आंदोलन के रूप में स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है।
नालंदा की ऐतिहासिक परंपरा—जो ज्ञान, जिज्ञासा और गहन दार्शनिक चिंतन का वैश्विक केंद्र रही है—उसी मूल भावना को पुनर्जीवित करते हुए उसे समकालीन संदर्भों में प्रस्तुत करना इस पहल का प्रमुख उद्देश्य है। नालंदा लिटरेचर डायलॉग्स के माध्यम से लेखक, विद्वान, नीति-निर्माता, कलाकार, राजनयिक, शिक्षाविद् और युवा प्रतिभाएं एक साझा मंच पर एकत्रित होंगी, जिससे एक सशक्त, समावेशी और जीवंत बौद्धिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण संभव हो सकेगा।
इस पहल का एक प्रमुख केंद्र-बिंदु क्षेत्रीय एवं स्वदेशी साहित्यिक परंपराओं का संरक्षण और संवर्धन होगा, जिसमें विशेष रूप से बिहार और पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इसका उद्देश्य विविध भाषाई और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को राष्ट्रीय एवं वैश्विक मंच पर सशक्त उपस्थिति प्रदान करना है।
फेस्टिवल में “12 शहर, 12 डेस्टिनेशन और 12 प्री-इवेंट्स” का कार्यक्रम शामिल है, जिसका उद्देश्य भारत के विविध सांस्कृतिक परिदृश्यों तक इस पहल की व्यापक पहुंच सुनिश्चित करना है। इसके अतिरिक्त, एक अंतरराष्ट्रीय प्री-इवेंट का आयोजन, जिसके माध्यम से वैश्विक स्तर पर साहित्यिक और सांस्कृतिक संवाद को और अधिक सुदृढ़ किया जाएगा।
9 और 10 मई को दिल्ली में आयोजित होने वाले ‘नालंदा डायलॉग’ में देश के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी, लेखक और विचारक एक साथ मंच साझा करेंगे। इस अवसर पर डॉ. शशि थरूर, पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह, अमिताभ कांत, प्रख्यात लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल, डॉ. शामिका रवि, पूर्व राजनयिक एवं लेखक पवन के. वर्मा, प्रो. अजय दुबे (जेएनयू), पद्म शोवना नारायण (लेखिका एवं सिविल सेवक), मुकुल कुमार, नितीश्वर कुमार, आशुतोष अग्निहोत्री ( लेखक एवं सिविल सेवक), प्रो. गणेश देवी (बड़ौदा विश्वविद्यालय) तथा डॉ. सच्चिदानंद जोशी (आईजीएनसीए) सहित अनेक विशिष्ट वक्ता भाग लेंगे।
इस वर्षपर्यंत चलने वाली श्रृंखला में मासिक डिजिटल संवाद और पॉडकास्ट भी शामिल होंगे, जिनके माध्यम से अधिक से अधिक लोगों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। बिहार में एक ‘राइटर-इन-रेजिडेंस’ कार्यक्रम प्रारंभ किया जाएगा, जो उभरती साहित्यिक प्रतिभाओं को सृजनात्मक अवसर और मार्गदर्शन प्रदान करेगा। साथ ही, ‘भाषारथ’ साहित्यिक सर्कल्स बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में स्थापित किए जाएंगे, जिससे समुदाय-आधारित साहित्यिक गतिविधियों को सशक्त बढ़ावा मिलेगा।
‘यूनिवर्सिटी डायलॉग्स’ के माध्यम से भारत और एशिया के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों को एक साझा मंच पर जोड़ा जाएगा, जिससे अकादमिक सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नए आयाम खुलेंगे। इन पहलों के जरिए नालंदा लिटरेचर सोसाइटी अनुवाद परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने, अभिलेखागार एवं दस्तावेज़ीकरण प्लेटफॉर्म विकसित करने तथा नालंदा को साहित्यिक एवं सांस्कृतिक शोध, संवाद और आदान-प्रदान के एक स्थायी और जीवंत केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में कार्य करेगी।
पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह, अध्यक्षा, नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल ने कहा “साहित्य को केवल फैशन या औपचारिक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे भारत की ज्ञान परंपराओं के एक जीवंत और सृजनशील केंद्र के रूप में विकसित होना होगा—जहां संवाद, विमर्श और कला मिलकर नए अर्थों का निर्माण करें। हमारी भूमिका इसलिए एक ऐसे समावेशी और सशक्त मंच का निर्माण करना है, जहां ये सभी तत्व एक साथ आकर भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवंत और गतिशील अभिव्यक्ति बनें। यही अनुभव नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल साकार करने का प्रयास करता है।
इस अवसर पर फेस्टिवल चेयरपर्सन, नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल, डी आलिया ने कहा, “नालंदा केवल इतिहास का एक स्थल नहीं, बल्कि एक जीवंत विचारधारा है जो आज भी विश्व को निरंतर प्रेरित करती है। नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल के माध्यम से हमारा उद्देश्य एक ऐसा सशक्त मंच निर्मित करना है, जहाँ भारत की शाश्वत ज्ञान-परंपरा समकालीन और सार्थक संवादों के साथ नई ऊर्जा के साथ जुड़ सके।
फेस्टिवल एडवाइजर डॉ. पंकज के.पी. श्रेयस्कर ने कहा “नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल का लक्ष्य नालंदा की गौरवशाली परंपरा को समकालीन परिप्रेक्ष्य में पुनर्परिभाषित करना है—जहां ज्ञान, विमर्श और संवाद की जीवंत विरासत को नए आयाम दिए जाएं। यह एक ऐसा सशक्त मंच है, जहां विज्ञान, कला और भारतीय ज्ञान परंपरा का सार एकत्रित होता है, और हर व्यक्ति विचारों के संवर्धन तथा उभरती प्रतिभाओं को अवसर प्रदान करने की सामूहिक जिम्मेदारी निभाता है।
गंगा कुमार फेस्टिवल डायरेक्टर ने कहा“नालंदा में हमारा उद्देश्य केवल प्रतिष्ठित आवाज़ों के लिए मंच तैयार करना नहीं, बल्कि स्थापित लेखकों की गहन दृष्टि और नई पीढ़ी के रचनाकारों की सृजनात्मक ऊर्जा को एक साझा मंच पर संगमित करना है। अगले वर्ष जब नालंदा विश्वविद्यालय अपने 1600 वर्ष पूर्ण करेगा, तब आगामी संस्करण के लिए हमारी दृष्टि एक शाश्वत और वैश्विक संवाद को साकार करती है जहां ‘दुनिया नालंदा में’ और ‘नालंदा दुनिया में’ प्रतिबिंबित होता है।
नालंदा लिटरेचर डायलॉग्स 2026–27 और नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल 2027 भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, राज्य सरकारों तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों के सहयोग से आयोजित किए जाएंगे। इसमें भारत और एशिया के विश्वविद्यालयों, यूनेस्को से जुड़े संस्थानों, एशियाई साहित्यिक उत्सवों और सांस्कृतिक दूतावासों के साथ-साथ प्रकाशन संस्थानों, एडटेक प्लेटफॉर्म और उद्योग जगत की भागीदारी भी शामिल होगी।
इस फेस्टिवल में भारत के राष्ट्रपति/गुयाना के राष्ट्रपति, भारत के उपराष्ट्रपति, मॉरीशस के प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, बिहार के राज्यपाल तथा बिहार, असम और पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित अनेक प्रतिष्ठित अतिथियों के शामिल होने की संभावना है।
नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल स्वयं को एक दीर्घकालिक सांस्कृतिक और ज्ञान-आधारित आंदोलन के रूप में स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है एक ऐसा मंच जो न केवल साहित्य का उत्सव मनाता है, बल्कि संवाद को प्रोत्साहित करता है, विरासत का संरक्षण करता है और भविष्य के विचारों को आकार देने में योगदान देता है।
नई दिल्ली : नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल (Nalanda Littfest) ने दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान “नालंदा लिटरेचर डायलॉग्स 2026–27” के शुभारंभ की घोषणा की। यह वर्षभर चलने वाली बहु-शहरी सांस्कृतिक पहल, नालंदा लिटरेचर सोसाइटी के व्यापक दायरे में संचालित की जाएगी।
विश्व के प्राचीनतम और प्रतिष्ठित शिक्षण केंद्रों में से एक नालंदा की समृद्ध बौद्धिक परंपरा से प्रेरित यह पहल, फेस्टिवल को एक सतत, वर्षपर्यंत सक्रिय सहभागिता मंच के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। नालंदा लिटरेचर डायलॉग्स देश और विदेश के विभिन्न शहरों में आयोजित किए जाएंगे, जिनके माध्यम से साहित्य, भारतीय विरासत एवं संस्कृति,
धर्म एवं दर्शन, सार्वजनिक नीति, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा कला जैसे विविध क्षेत्रों में सार्थक एवं सतत संवाद को प्रोत्साहित किया जाएगा। इसी अवसर पर नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल 2027 की तिथियों की भी औपचारिक घोषणा की गई, जो 17 से 20 अक्टूबर 2027 तक आयोजित होगा।
इस अवसर पर नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल की अध्यक्षा एवं पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह, नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल की फेस्टिवल चेयरपर्सन एवं सामाजिक कार्यकर्ता डी. आलिया, नालंदा लिटरेचर के एडवाइजर डॉ. पंकज के.पी. श्रेयस्कर तथा नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल डायरेक्टर गंगा कुमार की उपस्थिति रही।
यह पहल भारत की समृद्ध सभ्यतागत ज्ञान परंपराओं को समकालीन वैश्विक विमर्श से जोड़ने के उद्देश्य से विकसित की गई है। फेस्टिवल पारंपरिक वार्षिक आयोजन की सीमाओं से आगे बढ़ते हुए स्वयं को एक सतत विचार, सहभागिता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के सशक्त आंदोलन के रूप में स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है।
नालंदा की ऐतिहासिक परंपरा—जो ज्ञान, जिज्ञासा और गहन दार्शनिक चिंतन का वैश्विक केंद्र रही है—उसी मूल भावना को पुनर्जीवित करते हुए उसे समकालीन संदर्भों में प्रस्तुत करना इस पहल का प्रमुख उद्देश्य है। नालंदा लिटरेचर डायलॉग्स के माध्यम से लेखक, विद्वान, नीति-निर्माता, कलाकार, राजनयिक, शिक्षाविद् और युवा प्रतिभाएं एक साझा मंच पर एकत्रित होंगी, जिससे एक सशक्त, समावेशी और जीवंत बौद्धिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण संभव हो सकेगा।
इस पहल का एक प्रमुख केंद्र-बिंदु क्षेत्रीय एवं स्वदेशी साहित्यिक परंपराओं का संरक्षण और संवर्धन होगा, जिसमें विशेष रूप से बिहार और पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इसका उद्देश्य विविध भाषाई और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को राष्ट्रीय एवं वैश्विक मंच पर सशक्त उपस्थिति प्रदान करना है।
फेस्टिवल में “12 शहर, 12 डेस्टिनेशन और 12 प्री-इवेंट्स” का कार्यक्रम शामिल है, जिसका उद्देश्य भारत के विविध सांस्कृतिक परिदृश्यों तक इस पहल की व्यापक पहुंच सुनिश्चित करना है। इसके अतिरिक्त, एक अंतरराष्ट्रीय प्री-इवेंट का आयोजन, जिसके माध्यम से वैश्विक स्तर पर साहित्यिक और सांस्कृतिक संवाद को और अधिक सुदृढ़ किया जाएगा।
9 और 10 मई को दिल्ली में आयोजित होने वाले ‘नालंदा डायलॉग’ में देश के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी, लेखक और विचारक एक साथ मंच साझा करेंगे। इस अवसर पर डॉ. शशि थरूर, पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह, अमिताभ कांत, प्रख्यात लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल, डॉ. शामिका रवि, पूर्व राजनयिक एवं लेखक पवन के. वर्मा, प्रो. अजय दुबे (जेएनयू), पद्म शोवना नारायण (लेखिका एवं सिविल सेवक), मुकुल कुमार, नितीश्वर कुमार, आशुतोष अग्निहोत्री ( लेखक एवं सिविल सेवक), प्रो. गणेश देवी (बड़ौदा विश्वविद्यालय) तथा डॉ. सच्चिदानंद जोशी (आईजीएनसीए) सहित अनेक विशिष्ट वक्ता भाग लेंगे।
इस वर्षपर्यंत चलने वाली श्रृंखला में मासिक डिजिटल संवाद और पॉडकास्ट भी शामिल होंगे, जिनके माध्यम से अधिक से अधिक लोगों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। बिहार में एक ‘राइटर-इन-रेजिडेंस’ कार्यक्रम प्रारंभ किया जाएगा, जो उभरती साहित्यिक प्रतिभाओं को सृजनात्मक अवसर और मार्गदर्शन प्रदान करेगा। साथ ही, ‘भाषारथ’ साहित्यिक सर्कल्स बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में स्थापित किए जाएंगे, जिससे समुदाय-आधारित साहित्यिक गतिविधियों को सशक्त बढ़ावा मिलेगा।
‘यूनिवर्सिटी डायलॉग्स’ के माध्यम से भारत और एशिया के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों को एक साझा मंच पर जोड़ा जाएगा, जिससे अकादमिक सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नए आयाम खुलेंगे। इन पहलों के जरिए नालंदा लिटरेचर सोसाइटी अनुवाद परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने, अभिलेखागार एवं दस्तावेज़ीकरण प्लेटफॉर्म विकसित करने तथा नालंदा को साहित्यिक एवं सांस्कृतिक शोध, संवाद और आदान-प्रदान के एक स्थायी और जीवंत केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में कार्य करेगी।
पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह, अध्यक्षा, नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल ने कहा “साहित्य को केवल फैशन या औपचारिक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे भारत की ज्ञान परंपराओं के एक जीवंत और सृजनशील केंद्र के रूप में विकसित होना होगा—जहां संवाद, विमर्श और कला मिलकर नए अर्थों का निर्माण करें। हमारी भूमिका इसलिए एक ऐसे समावेशी और सशक्त मंच का निर्माण करना है, जहां ये सभी तत्व एक साथ आकर भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवंत और गतिशील अभिव्यक्ति बनें। यही अनुभव नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल साकार करने का प्रयास करता है।
इस अवसर पर फेस्टिवल चेयरपर्सन, नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल, डी आलिया ने कहा, “नालंदा केवल इतिहास का एक स्थल नहीं, बल्कि एक जीवंत विचारधारा है जो आज भी विश्व को निरंतर प्रेरित करती है। नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल के माध्यम से हमारा उद्देश्य एक ऐसा सशक्त मंच निर्मित करना है, जहाँ भारत की शाश्वत ज्ञान-परंपरा समकालीन और सार्थक संवादों के साथ नई ऊर्जा के साथ जुड़ सके।
फेस्टिवल एडवाइजर डॉ. पंकज के.पी. श्रेयस्कर ने कहा “नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल का लक्ष्य नालंदा की गौरवशाली परंपरा को समकालीन परिप्रेक्ष्य में पुनर्परिभाषित करना है—जहां ज्ञान, विमर्श और संवाद की जीवंत विरासत को नए आयाम दिए जाएं। यह एक ऐसा सशक्त मंच है, जहां विज्ञान, कला और भारतीय ज्ञान परंपरा का सार एकत्रित होता है, और हर व्यक्ति विचारों के संवर्धन तथा उभरती प्रतिभाओं को अवसर प्रदान करने की सामूहिक जिम्मेदारी निभाता है।
गंगा कुमार फेस्टिवल डायरेक्टर ने कहा“नालंदा में हमारा उद्देश्य केवल प्रतिष्ठित आवाज़ों के लिए मंच तैयार करना नहीं, बल्कि स्थापित लेखकों की गहन दृष्टि और नई पीढ़ी के रचनाकारों की सृजनात्मक ऊर्जा को एक साझा मंच पर संगमित करना है। अगले वर्ष जब नालंदा विश्वविद्यालय अपने 1600 वर्ष पूर्ण करेगा, तब आगामी संस्करण के लिए हमारी दृष्टि एक शाश्वत और वैश्विक संवाद को साकार करती है जहां ‘दुनिया नालंदा में’ और ‘नालंदा दुनिया में’ प्रतिबिंबित होता है।
नालंदा लिटरेचर डायलॉग्स 2026–27 और नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल 2027 भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, राज्य सरकारों तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों के सहयोग से आयोजित किए जाएंगे। इसमें भारत और एशिया के विश्वविद्यालयों, यूनेस्को से जुड़े संस्थानों, एशियाई साहित्यिक उत्सवों और सांस्कृतिक दूतावासों के साथ-साथ प्रकाशन संस्थानों, एडटेक प्लेटफॉर्म और उद्योग जगत की भागीदारी भी शामिल होगी।
इस फेस्टिवल में भारत के राष्ट्रपति/गुयाना के राष्ट्रपति, भारत के उपराष्ट्रपति, मॉरीशस के प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, बिहार के राज्यपाल तथा बिहार, असम और पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित अनेक प्रतिष्ठित अतिथियों के शामिल होने की संभावना है।
नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल स्वयं को एक दीर्घकालिक सांस्कृतिक और ज्ञान-आधारित आंदोलन के रूप में स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है एक ऐसा मंच जो न केवल साहित्य का उत्सव मनाता है, बल्कि संवाद को प्रोत्साहित करता है, विरासत का संरक्षण करता है और भविष्य के विचारों को आकार देने में योगदान देता है।
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