सामाजिक,धार्मिक व सांस्कृतिक विसंगतियों का आइना है "अपना हाथ जगन्नाथ"


उपन्यास अलग तरह के धर्म, मजहब,संस्कृति, समाज, देश की प्रचलित धारणाएं लेकर सामने आया है । उपन्यास में जितेन्द्र और सायमा वह कड़ी है जो एक पात्र को दूसरे पात्र से जोड़ता है व एक घटना को दूसरी घटना से जोड़ती है ,जो प्रारंभ से अंत तक चलती हैं । उपन्यासकार ने इस कथा के माध्यम से सामाजिक,धार्मिक व सांस्कृतिक विसंगतियों के  समाधानों की ओर संकेत दिए हैं।कथा नायक के जीवन के विविध पक्षों को विविध पात्रों के माध्यम से उभारा है। यथा-अपना हाथ जगन्नाथ का कथा सूत्र जुडता है तो  अविरल चलता है । इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि उपन्यास में हिम्मत और विश्वास को चेहरा दिया है ।पात्रों का  वर्णन रचनाकार ने बखूबी तन्मयता से किया है । कथाकार का मन स्वयं विषयवस्तु से एकाकार होकर चले तभी पाठक भी उससे एकाकार हो सकता है । यही कृति का सच है । उपन्यास प्रारंभ से ही कौतूहल बनाए रखता है।जिससे पठनीयता का सिलसिला जानकारियों के साथ चलता चला जाता है ।



 

हिन्दी साहित्य के समकालीन परिदृश्य में नरेंद्र लाहड़ एक सुपरिचत नाम है। जो बिना किसी शोर-शराबे के निरन्तर अपनी साहित्य सर्जना करते रहे हैं। समसामयिक जनजीवन के प्रतिदिन बदलते यथार्थ का उन्होंने अत्यंत ही बारीकी से उपन्यास में विश्लेषण किया है ।
      ' अपना हाथ जगन्नाथ '  उपन्यास उनके रचनात्मक लेखन की नई कड़ी है, जिसमें उन्होंने वर्तमान युवा पीढ़ी की परिस्थतियों के साथ-साथ सामाजिक,  धार्मिक व सांस्कृतिक सभ्यता के  चित्र प्रस्तुत किये हैं । उपन्यास का शीर्षक उत्सुकता पैदा करता है ।यह उत्सुकता प्रथम पृष्ठ से लेकर अंतिम पृष्ठ  तक बनी रहती है।पूरे कथानक का ताना- बाना इस तरह बुना हुआ है कि दृश्यों में पर्याप्त विवरणात्मक विस्तार न होने के बाद भी यदि पाठक वर्ग अपनी कल्पना शीलता को चिंतन के साथ  थोड़ा सा प्रवाह दे तो अधिक आनंद प्राप्त कर सकता है ।लेखक का प्रयास रहा है कि कहानी में तेजी व प्रवाह बना रहे । इसमें वे सफल भी रहे हैं।नायक नायिका का  द्वंद्व  और शक्ति परीक्षण का विस्तार पाठकों को बाँधे रखता है । उपन्यास में वैदिक संस्कृति और इस्लामिक धारा अनेक झंझावातों व उतार - चढावों के बीच अविरल प्रवाहित होती रही है। लेखक का निष्ठा और श्रम से अद्भुत प्रयास सफल रहा ।

 

             उपन्यास का आरंभ एक निराशा से घिरे पढ़े-लिखे बेरोजगार   नवयुवक के जीवन से शुरू होता ।जिसे हर बार इन्टरव्यू देने के बाद निराशा ही हाथ लगी है । 96 पृष्ठों का यह उपन्यास अपने नाम से ही संकेत करता है कि ईश्वर ने हमें दो हाथ दिए हैं अब इन्हें जगन्नाथ कैसे बनाया जाए ये हमारे ऊपर निर्भर है ।उपन्यास के नायक ने ये संभव कर दिखाया । जो कभी स्वयं रोजगार माँगने के लिए दर दर भटकता था आज वही हजारों लोगों को अपने पास रोजगार देने लगा ।संपूर्ण उपन्यास का ताना -बाना  एक हिन्दू युवक व मुस्लिम समुदाय की लड़की सायमा के इर्द-गिर्द घूमता है । उपन्यासकार का उद्देश्य था कि  धर्म और मजहब के नाम पर जो विवाद व भेदभाव चल रहा है, उसे मिटाया जाए।   काम कोई छोटा बड़ा नही होता, ये आप और हम सभी जानते हैं,मानते भी हैं। एक चाय बनाने वाले ने जो स्वयं इसी स्थिति से गुजरा था कभी उसने जितेन्द्र को कहा, 'नौकरी का प्रलोभन छोड़ो, अपनी दुर्बलता और  शक्ति सामर्थ्य के अनुसार कोई कार्य करो'। "हिम्मतां मरदे मद्दे खुदा।" अर्थात् हिम्मत करो तो रास्ता स्वयं निकल आता है। जब चाय वाले ने अपनी स्थिति का वर्णन किया कि मैं चाय बनाने के साथ-साथ एम ए अर्थ शास्त्र परीक्षा की तैयारी भी कर रहा हूं।

         

इस प्रकार उपन्यास का नायक उसकी बातों से प्रेरित होकर और स्वयं की सामर्थ्य शक्ति टटोलकर बच्चों को शिक्षित करने का काम करने पर चिन्तन मनन करते हुए अपने स्वप्न को पूरा करने में जुट गया ।देखते ही देखते निःशुल्क बच्चों को शिक्षित करने का नेक कार्य करते हुए वह जीवन की डगर पर चलते हुए सफलता के शिखर पर पहुंच जाता है। धीरे-धीरे उसके नेक काम में लोग साथ देते हैं और पांच बच्चों से शुरू होने वाला विद्यालयरूपी पौधा एक वट वृक्ष का रूप धारण कर लेता है । जिसमें न जाने कितने लोगों को रोजगार मिल जाता है ।

 

उपन्यास में सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली का सकारात्मक रूप सामने आया है।अन्यथा सरकारी व्यवस्था कभी भी किसी को ठीक लगी हो ऐसा कम ही सुनने व देखने में आया है ।सरकारी व्यवस्था में भीतर रहकर देखने के अनुभव ने भी उपन्यास को एक नई धारा दी है।संपूर्ण व्यवस्था को देखने के कारण  उनके वर्णन  में गजब की बारीकी और जीवन्तता है।उपन्यास में चुनौती का  निर्वहन बहुत अच्छी तरह हुआ है ।उपन्यास कहीं ऊब पैदा नही करता।विशेषकर चरित्रों और स्थानों वर्णन अत्यंत रोचक है। जैसे एक  बड़े से विद्यालय के बाहर बने खेल के मैदान में स्कूल के बच्चे फुटबाल खेल रहे हैं,वहां का दृश्य देखिए खेल के मैदान के  एक ओर पब्लिक स्कूल, दूसरी ओर बस स्टॉप, पीछे की ओर बड़ा सा गंदा नाला बह रहा है उसी के किनारे एक वृक्ष के नीचे नायक चिन्तनशीलबैठा है। वही तीन बालक रद्दी बीनने वाले अपने-अपने  बोरों के साथ विश्राम कर रहे है।मैदान में खेलते हुए बच्चों को खेलते हुए देखकर बोले-' साले बडे किस्मत वाले हैं।'

मुनिया -अपनी-अपनी किस्मत है।

दीनू-हमारे बाप ने तो हमें पढ़ाया ही नहीं।

जगन-अरे, वे कौन से पढ़े हैं।

मुनिया - पढ़ने को तो मेरा दिल भी बहुत है।

दीनू - हम तो पढने की सोच भी नही सकते ।

जगन-मैं तो सुबह से शाम तक चाय की दुकान पर बर्तन साफ करने का काम करता हूं।

मुनिया -मैं तो कांच और प्लास्टिक ही बीनती हूं। मां लाला के यहां देकर 1 /-रूपये ले आती है।

 

वही से नायक को एक नई राह मिल गई ।उसका अन्तर्मन बच्चों से जा मिला ।

उपन्यास के चरित्रों के नाम भी काफी सोच-विचार कर लिखे गये हैं। जो उनकी कार्यशैली को परिभाषित करते हैं। 'अपना हाथ जगन्नाथ ' यह पंक्ति उपन्यास यात्रा में साथ-साथ चलती है और उसी की हमसफर  ' अपना हाथ सुलताने कायनात ' भी है। जिससे उपन्यास की सार्थकता सिद्ध होती हो जाती है। रचनाकार संस्कृत के विद्वान हैं तो रचना में संस्कृत श्लोकों व प्रसंगों का प्रयोग स्वाभाविक हो जाता है । मजहब और धर्म, वैदिक संस्कृति व इस्लाम धर्म पर विस्तृत चर्चा उपन्यास का मुख्य अंग रहा है । उपन्यास पढ़ते हुए ऐसे अनेक रहस्यमय विषय हमारे सामने आए हैं जिनसे हम अनभिज्ञ थे।इसके लिए लेखक बधाई के पात्र हैं। उपन्यास में भारत के दो प्रसिद्ध महा विश्वविद्यालयों का जिक्र आया है जिनका विस्तार काबुल से  म्यांमार तक था।एक तक्षशिला में भौतिक शास्त्र तथा दूसरा गया में रासायन शास्त्र था।तक्षशिला में जो योगी विद्वान थे उनका नाम था मुमुक्षु ।ऋषि मुमुक्षु ने वैदिक परंपरा अनुसार जन्म लिया, विद्या ग्रहण की ,उसका दान किया और प्रकृति का अनुसरण करते हुए विवाह किया ।पत्नी गर्भवती हुई तो सारी संपत्ति दान कर यौगिक क्रिया से देह त्याग कर दी। बेटे मुहिम ने वैदिक संस्कृति के विपरीत एक नई संस्कृति स्थापित की।

 

भाषा शैली, रोचक एवं प्रवाहममयी है।हिन्दी, उर्दू संस्कृत के शब्दों का भरपूर प्रयोग किया गया है ।संस्कृतनिष्ठ शब्दों व सरल भाषा के साथ उपन्यास के शीर्षक की सार्थकता सिद्ध की है । साहित्यिक दृष्टि से देखा जाए तो आज उपन्यास बहुत कम लिखे जा रहे हैं। लेकिन बहुमुखी प्रतिभा के धनी आदरणीय नरेंद्र लाहड़ जी हर वर्ष हमारे हाथों में एक उपन्यास थमा ही देते हैं।विवशता,दीक्षा, सरपंच, लब्बू खसमाखाणा की कड़ी मे अपना हाथ जगन्नाथ और जुड़ गया ।समस्या प्रधान उपन्यास त तक आते -आते समस्या निदान उपन्यास बन गया ।जिसमें 'तीन तलाक ' की समस्या का भी हल हो जाता है । साहित्य जगत के नए मान-मूल्यों के बीच  यह उपन्यास  विचार और भावनाओं की नई दुनिया में ले जाता है। हिन्दी साहित्य जगत को समृद्ध करने वाले आदरणीय लाहड़ जी स्वस्थ एवं दीर्घायु हों व साहित्य साधना रत रहें।साहित्य जगत में उपन्यास अपना हाथ जगन्नाथ का हृदय से स्वागत होगा ।

 

पुस्तक-अपना हाथ जगन्नाथ (उपन्यास )   


लेखक-नरेंद्र लाहड़,प्रकाशक-उमंग प्रकाशन

प्रथम संस्करण-2019,पृष्ठ-96,मूल्य -'300/-

 लेखिका /समीक्षक सुरेखा शर्मा



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