कविता // नभ में सप्त इंद्र धनुषी आभा



विजय सिंह बिष्ट
दूर क्षैतिज में स्वच्छ नीले आकाश में,
बादलों का चित्रांकन ,स्वर्णिम रश्मियों से।
बन बैठता हिमालयी सुंदर चित्रण,
नभ में सप्त इंद्र धनुषी आभा,
पहाड़ों के ऊपर सूर्य किरणों से,
रिम झिम बर्षा की फुहार,


केवल परछाइयां सी लगती है,
अब तो स्वपनिल सी लगती हैं।
हरित भूमि उसमें घनेरे चीड़ बृक्ष,
कर देती गांवों की यादों से उदास,
कल कल करती बहती बक्री नदियां,
याद दिलाती अपने पहाड़  की,
अब तो दूर देश में स्वपनिल लगती हैं।
केवल परछाइयां सी लगती हैं।


हरित भूमि उसमें उगी घास,
कर देती गांव की यादों को उदास,
ये हमने देखी और परखी थी,
अब तो  स्वपनिल सी लगती हैं।
कलरव करते विहंग बृन्द,


इन ईंट गारों से बनी गगन चुम्बी इमारतें,
उनके ऊपर बने बादलों का चित्रांकन
बीते दिनों अपने गांव की याद दिलाता है।
 अब प्र्रदेश में रहकर परछायी सी लगती है।
  केवल स्वपनिल सी लगती है बिष्ट।


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