भाषायी अशुद्धि : समस्या और समाधान’ पर कार्यशाला

० योगेश भट्ट ० 
नई दिल्ली|- दिल्ली विश्वविद्यालय के विवेकानंद महाविद्यालय के हिंदी विभाग और दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मेलन के संयुक्त तत्त्वावधान में विद्यार्थियों में निरंतर बढ़ती हुई भाषायी अशुद्धियों के प्रति जागरूकता फैलाने और सुधारने हेतु एक कार्यशाला का आयोजन किया गया| इसका विषय था - ‘भाषायी अशुद्धि : समस्या और समाधान’| मुख्य वक्ता की भूमिका में भाषाविद्, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित महाविद्यालय श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स के हिंदी विभागाध्यक्ष, प्रसिद्ध साहित्यकार, दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मेलन के महामंत्री और नव उन्नयन साहित्यिक सोसाइटी के उपाध्यक्ष प्रो. रवि शर्मा और बाल साहित्यकार, भाषाविद्, दिल्ली पब्लिक स्कूल, राम कृष्ण पुरम की पूर्व वरिष्ठ अध्यापिका डॉ. सुधा शर्मा थे।
कार्यक्रम में अतिथि वक्ताओं ने विभागाध्यक्ष डॉ. योजना कालिया और विभाग के सभी सदस्यों के साथ मिलकर कार्यशाला का शुभारंभ किया।  कार्यशाला की संयोजिक डॉ..मीणा पांडे ने भाषायी अशुद्धि की समस्या पर चिंता प्रकट करते हुए इसे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के विकास में बाधक माना। हिंदी मातृभाषा, राष्ट्रभाषा, राजभाषा और शिक्षा की भाषा होते हुए भी ग़लत प्रयोगों की शिकार है। शिक्षण संस्थानों में इस विषय पर चर्चा-परिचर्चा का होना समय की अत्यंत आवश्यक माँग है, अन्यथा शिक्षा और हिंदी-शिक्षण पर समय प्रश्न चिह्न अवश्य लगाएगा। विभागाध्यक्ष डॉ. योजना कालिया ने अतिथि वक्ताओं का स्वागत करते हुए नन्हा पादप भेंट किया।
द्वितीय सत्र विषय की संकल्पना और भावभूमि तैयार करने का था। प्रो. रवि शर्मा ने हिंदी भाषा के विकास और अन्य भाषाओं के साथ उसके संबंध की बात करते हुए उन्हें आपस में बहनें कहा, क्योंकि अधिकतर भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत है; हिंदी की भी उत्पत्ति संस्कृत से ही हुई है। हिंदी भाषा के शुद्ध और व्याकरण सम्मत प्रयोग के लिए उन्होंने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के विशिष्ट योगदान को याद किया और उनके युग प्रवर्तक कार्य की चर्चा की। 

उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा, “कल आप बड़े अधिकारी बनेंगे और अशुद्ध भाषा का प्रयोग करेंगे, तो अर्थ के अनर्थ होने की स्थिति पर आप हँसी के पात्र बन जाएँगे| इसलिए समय रहते चेतना आवश्यक है।” डॉ. सुधा शर्मा ने काव्यात्मक शैली में अपना परिचय दिया और छात्राओं को भी अपना परिचय कविता के रूप में देने के लिए कहा। उन्होंने छात्राओं से अपना अनुभव बाँटते हुए बताया, "शब्द ही ब्रह्म है और ब्रह्म में भ्रम नहीं होना चाहिए।”

 उन्होंने 40 तरह के भाषायी भ्रम का विद्यार्थियों के समक्ष श्यामपट्ट पर निवारण किया और प्रभावी ढंग से बच्चों की वर्तनी अशुद्धि को सुधारने का प्रयास किया और उनसे सही शब्द लिखवाए। डॉ. सुधा शर्मा ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अपने अनुभवों पर आधारित उदाहरण देते हुए कहा कि भाषायी अशुद्धि मेवे मिश्रित स्वादिष्ट खीर में एक बूँद जहर के समान है। मुँह के निवाले में कंकड़ के समान है और आज खीर में कंकड़-ही-कंकड़ हैं, स्थिति बड़ी गंभीर है। प्रो. रवि शर्मा ने कहा, "हर विद्यार्थी के पास कम-से-कम एक और ज़्यादा से ज़्यादा छह शब्दकोश होने ही चाहिए।"

 उनका मानना है कि भाषा को समझने का सबसे सरल उपाय शब्दकोश को देखना है। अंतिम सत्र में भाषायी अशुद्धियों का निवारण किया गया। केंद्रीय हिंदी निदेशालय की समिति द्वारा स्वीकृत हिंदी की मानक वर्तनी को समझाया गया। विद्यार्थियों को कई तरह के भाषागत प्रयोग करवाए गए। गृह कार्य के लिए कुछ पत्रक वितरित किए गए|

कार्यक्रम के अंतिम सत्र में संयोजिका ने विद्यार्थियों से कार्यशाला से संबंधित राय ली, जिसमें सभी विद्यार्थियों ने लिखा कि उन्हें इस तरह की कार्यशाला की आवश्यकता है। ऐसी कार्यशालाएँ बार-बार होती रहनी चाहिए। अंत में, हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.. योजना कालिया ने अतिथि वक्ताओं के साथ-साथ उपस्थित सभी श्रोताओं का धन्यवाद किया। 

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