भारत में हर 1,000 लोगों में लगभग 0.8 व्यक्ति पार्किंसन रोग से प्रभावित

० आशा पटेल ० 
जयपुर। पार्किंसन रोग एक प्रगतिशील न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है, जो शरीर की गतिशीलता, स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। भारत में बढ़ती उम्रदराज़ आबादी के साथ इसके मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। ऐसे में जागरूकता बढ़ाना, समय पर पहचान सुनिश्चित करना और दीर्घकालिक उपचार तक पहुंच बनाना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।

भारत में अनुमानतः हर 1,000 लोगों में लगभग 0.8 व्यक्ति पार्किंसन रोग से प्रभावित हैं, हालांकि कम पहचान (अंडरडायग्नोसिस) के कारण यह संख्या अधिक भी हो सकती है। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक वैश्विक स्तर पर पार्किंसन रोग के बढ़ते बोझ में भारत का महत्वपूर्ण योगदान होगा।

डॉ. ईशु गोयल, कंसल्टेंट, न्यूरोलॉजी, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल, जयपुर ने बताया, “पार्किंसन रोग मस्तिष्क में डोपामिन बनाने वाली कोशिकाओं के धीरे-धीरे क्षय होने के कारण होता है। डोपामिन शरीर की सुचारू और समन्वित गतिविधियों के लिए आवश्यक है। जैसे-जैसे इसकी मात्रा कम होती है, लक्षण प्रकट होने लगते हैं और समय के साथ बढ़ते जाते हैं। जागरूकता की कमी, न्यूरोलॉजिस्ट की सीमित उपलब्धता और निदान में देरी के कारण इस बीमारी का उपचार कठिन हो रहा है।

पार्किंसन रोग के लिए कोई एक निश्चित परीक्षण नहीं है। हालांकि पार्किंसन रोग का पूर्ण इलाज अभी संभव नहीं है, लेकिन विभिन्न उपचारों के माध्यम से इसे प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है • लेवोडोपा और अन्य डोपामिन बढ़ाने वाली दवाएं • फिजियोथेरेपी (शारीरिक संतुलन सुधारने के लिए। डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS): एक उन्नत उपचार विकल्प पार्किंसन रोग के उपचार में डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) एक महत्वपूर्ण प्रगति है, जो अब फोर्टिस हॉस्पिटल्स में उपलब्ध है।

 यह एक विशेष प्रकार की मस्तिष्क सर्जरी है, जिसमें मरीज सामान्यतः जागृत अवस्था में होता है, ताकि प्रक्रिया के दौरान प्रतिक्रिया को सटीक रूप से मॉनिटर किया जा सके। इस तकनीक में मस्तिष्क के विशिष्ट हिस्सों में दो पतले इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं, जिन्हें त्वचा के नीचे लगाए गए पेसमेकर जैसे उपकरण से जोड़ा जाता है। यह उपकरण नियंत्रित विद्युत संकेत भेजकर मस्तिष्क की असामान्य गतिविधियों को नियंत्रित करता है। इससे मोटर लक्षणों में काफी सुधार होता है और दवाओं की आवश्यकता भी कम हो सकती है।

पार्किंसन रोग केवल एक चिकित्सा स्थिति नहीं है, बल्कि यह मरीज और उसके परिवार के लिए जीवनभर की यात्रा है। भारत में इसके बढ़ते मामलों को देखते हुए जागरूकता बढ़ाना, समय पर पहचान सुनिश्चित करना और उन्नत उपचार जैसे DBS तक पहुंच का विस्तार करना अत्यंत आवश्यक है। समय पर और समग्र देखभाल के माध्यम से पार्किंसन रोग से पीड़ित व्यक्ति अधिक स्वतंत्र और संतोषजनक जीवन जी सकते हैं।

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