देर आऐ, दुरुस्त आऐ

एक मछुआरे ने अपना जाल उठाया और नदी की ओर चल पड़ा। नदी पहुंचकर उसने देखा कि अभी दिन पूरी तरह से नहीं निकला है तो वह नदी के किनारे-किनारे टहलने लगा। टहलते-टहलते अचानक उसके पैरों से कोई सख्त सी चीज टकराई। उसने झुककर वह चीज उठाई तो पाया कि नन्हे-नन्हे पत्थरों से भरी हुई एक छोटी-सी थैली है।



सूरज निकलने में अभी भी कुछ देर थी इसलिए मछुआरे ने जाल एक तरफ रख दिया और समय गुजारने के लिए उन छोटे-छोटे पत्थरों से खेलने लगा। फिर वह एक के बाद एक उन पत्थरों को नदी में फेंकने लगा। ऐसा करते-करते आखिर में अब मछुआरे के हाथ में अंतिम पत्थर बचा था। इसे भी वह फेंकने जा रहा था लेकिन तभी सूरज निकल आया। सूरज की रोशनी में उसने देखा कि उसके हाथ में पत्थर नहीं बल्कि एक बहुमूल्य हीरा था। 


मछुआरे को अपनी नादानी पर बहुत अफसोस हुआ कि वह बेशकीमती हीरों को यूं ही फेंकता रहा। लेकिन अब "पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत ।"हमारे साथ भी अक्सर ऐसा ही होता है। हम मछुआरे की तरह ही हीरे जैसी कीमती चीजों को अपनी अज्ञानता के कारण नष्ट करते रहते हैं अथवा उनका सदुपयोग नहीं करते।  ऐसी बहुत सी चीजें और कार्य होते हैं। समय भी उनमें से एक है और सबसे महत्त्वपूर्ण भी है। शुरू में हम उसकी कीमत नहीं समझते और जिस दिन कीमत समझ में आती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।


सबसे बड़ी बात यह है कि हमारा जीवन अथवा जीवन में मिला हुआ समय हीरे से भी कीमती है। हीरे की तरह कीमती और दुर्लभ समय सिर्फ गुजार दिया जाए, यह किसी भी तरह से उचित अथवा सार्थक नहीं। देर आऐ, दुरुस्त आऐ। अभी भी समय रूपी जो हीरे बचे हुए हैं, अंधेरे का बहाना बनाकर उस मछुआरे की तरह उन्हें नष्ट मत कीजिए। जागरूक होकर कम से कम उन्हें तो संभालकर रख लीजिए।


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