अच्छे दिन बीत गए,ये कैसे दिन आए


विजय सिंह बिष्ट


अच्छे दिन बीत गए,
ये कैसे दिन आए।
कैसी बिपदा आन पड़ी,
द्रुदिन धरती पर छाए।
ये द्रुदिन कैसे आए।


अच्छे दिनों के सपने थे संजोए।
ये विपदा भरे दिन कैसे आए।
शत्रु बड़ा भयंकर कैसे जाएं।
सारी दुनियां भयातुर ये कैसे दिन आए।


लाशों का अंबार लगा है,
कोई इससे बच न पाए।
जुदा जुदा अपनों से हैं,
कोई इनसे मिल न पाए।
ये द्रुदिन कैसे जाएं।


संदेशे आते अपनों के हैं,
कैसे हम मिलने को आएं।
गम भरी बेला में कैसे हाथ मिलाएं।
घिरे हुए हैं चार दीवाली में,
कैसे घर आंगन में आएं।
ये कैसी मजबूरी बना डाली,
कैसे तुमसे मिलने को आएं।
ये कैसे द्रुदिन लेकर आए।


अदृश्य चेहरा शत्रु लेकर आया,
जिसे हर कोई देख न पाए।
तुम सांसों में घुट रहे हो,
अपनी व्यथा बता न पाए।
ये कैसे द्रुदिन आए।।


धैर्य धारण कर प्रार्थना करें,
शत्रु भागे और हम उसे भगाएं।
आओ कोरोना को जड़ से मिटाएं।।
अच्छे दिन लौटाने होंगे,
आओ मिलकर हाथ बढ़ाएं।।


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