एससी ईसाइयों को आरक्षण से वंचित करना असंवैधानिक : एआईयूसीएमईआर

० योगेश भट्ट ० 
नई दिल्ली: ऑल इंडिया यूनाइटेड क्रिश्चियन्स मूवमेंट फॉर इक्वल राइट्स (एआईयूसीएमईआर) ने अनुसूचित जाति (एससी) ईसाइयों को आरक्षण के लाभ से वंचित करने की कड़ी निंदा की है और इसे असंवैधानिक और सांप्रदायिक करार दिया है। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलने को संबोधित करते हुए एआईयूसीएमईआर के पदाधिकारियों ने कहा कि एआईयूसीएमईआर ने 1950 के संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश के पैरा 3 को हटाने या संशोधित करने की मांग की, जो जातिगत आधार पर अनुसूचित जाति का दर्जा देने से ईसाई धर्म के अनुयायियों को वंचित करता है।

एआईयूसीएमईआर के अध्यक्ष ब्रदर जोस डेनियल ने कहा, “अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण का उद्देश्य उन सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को दूर करना था, जिनका सामना वे परंपरागत रूप से करते आए हैं। धर्म के आधार पर इस लाभ से ईसाई अनुसूचित जातियों को बाहर रखना पूरी तरह से असंवैधानिक है और उनके साथ दोहरा अन्याय है। हम सरकार और न्यायपालिका से अनुरोध करते हैं कि इस भेदभावपूर्ण पैरा 3 को तुरंत हटाया जाए या इसमें संशोधन किया जाए, ताकि सभी अनुसूचित जातियों को समान रूप से अधिकार मिल सकें।”

 इस बात पर जोर दिया कि अनुसूचित जाति के लोगों को अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव का सामना उनके धर्म परिवर्तन के बावजूद करना पड़ता है। मंडल आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, अनुसूचित जाति और जनजाति पर उच्च स्तरीय समिति और रंगनाथ मिश्रा आयोग जैसे विभिन्न रिपोर्टों ने अनुसूचित जाति के ईसाइयों के लगातार हो रहे सामाजिक शोषण को मान्यता दी है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी मंडल आयोग के मामले में अपने फैसले में कहा था कि अनुसूचित जाति के लोगों को उनके धर्म परिवर्तन के बावजूद समान चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

ब्रदर जोस डेनियल ने यह भी कहा कि अनुसूचित जाति के ईसाइयों ने लगातार पैरा 3 को हटाने या इसमें संशोधन की मांग की है ताकि उन्हें भी आरक्षण का लाभ मिल सके। लेकिन हाल ही में न्यायमूर्ति के.जी. बालकृष्णन आयोग को सौंपी गई जिम्मेदारियों के जरिए अनुसूचित जाति की सूची में बदलाव का इशारा किया जा रहा है, जिसका समूह विरोध करता है। उनका मानना है कि धार्मिक आधार पर किए गए भेदभाव को समाप्त करना ही असली मुद्दा है।

सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले में, एआईयूसीएमईआर ने यह स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति के ईसाइयों को आरक्षण नीति में शामिल करना अब समय की मांग है। इस मुद्दे को लेकर समुदाय के साथ-साथ विभिन्न राजनीतिक दल और सामाजिक संगठनों ने भी समर्थन दिया है, लेकिन तथ्यों की गलत व्याख्या के कारण इसे रोका जा रहा है।

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