जीत या हार का कारण किसी भी चुनाव में लोक कल्याण के लिए करना आवश्यक है


विजय सिंह बिष्ट


वर्तमान में दिल्ली के चुनाव का सही विश्लेषण यदि इस प्रकार किया जाय कि आप वाली पार्टी विकास के नाम पर चुनाव लड़ने का वादा भूतकाल वर्तमान और भविष्य को लेकर करती रही है, वह लगभग वाक्युद्ध से दूर नज़र आती रही है। उसने पानी बिजली और यात्रा को लेकर जो सुविधाएं दी है उसे भाजपा वाले मुफ्त दी जाने और लोगों को मुफ्ती की संज्ञा देती रही। इसका कारण भी लोगों में एक आक्रोष आया है।


जब कि अशिक्षित और पढ़ा लिखा व्यक्ति भी जानता है कि सरकार में बैठे लोग कितने मुफ्तखोर हैं। यदि भाजपा गैस , शौचालय मुफ्त में बनवाती है या देती है तो गांव का प्रधान या विचौलिया कितना लाभ उठाता है। लाभ देने और उसका सम्यक उपयोग हुआ है नहीं इसकी जानकारी साफ और स्पष्ट छवि वाली सरकार को चाहिए। देखने आया है कि भाजपा को चाहने वाले बुद्धिमान और उच्च श्रेणी में आते हैं।वे निम्नवर्ग को उकसाने और भड़काने काम तो करते हैं किंतु वोट देने नहीं आते। क्योंकि सुविधा सम्पन्न व्यक्ति को  कोई फर्क नहीं पड़ता।वह भले किसी भी पार्टी की बैठक में भाग लेकर भरोसा दे देता है अथवा अपने साथ औरों को जोड़ने की बात करते हैं। लेकिन ऐसा करते नहीं हैं।


धरातल पर बिछा गरीब ऊपर उठाने वाले का साथ करता है यही कारण था कि केजरीवाल धरातलीय लोगों से जुड़े रहे।
मध्यम वर्ग वाले दोनों ओर देखते हैं उसका प्रतिशत लगभग निचले वर्ग की ओर अधिक होता है।  राममंदिर,धारा 370, लोगों का पेट नहीं भरता।उन्हें पेट पालने के नौकरी  चाहिए।आज के बेरोजगार नवयुवकों को नौकरी चाहिए।वह हर चीज पर जीयसटी तो समझता है किंतु यन आर  सी लाने से अपना हिस्सा छिनता देखता है। राष्ट्रवाद उसके लिए इतना महत्व नहीं रखता जितना क्षेत्रवाद को वह समझता है।


हमारा जन्म गुलाम भारत में हुआ। बड़े बुजुर्गो के पीछे हम भी स्वतंत्रता के नारे लगाते थे।हां अधिकांश लोग अनपढ़ थे , लेकिन मर्यादित थे।आज शिक्षा की बाहुल्यता पर लोग छिन्न भिन्न मानसिकता वाले हैं।  राज करने के लिए राजा को ईश्वर की तरह प्रतिपालक होना चाहिए।  देश के प्रधानमंत्री सबके हैं। हर राज्य का मुख्यमंत्री सभी दलों और प्रदेश वासियों के हैं। किंतु जब भाषायी वाक्युद्ध होता है तब ऐसा लगता है हर पार्टी  भारत मां की उपज नहीं ,शौतेली की जाया है। समभाव का पाठ संसद से पढ़ाया जाना आवश्यक है। सरकारें आती हैं और जाती हैं, चुनाव आते रहेंगे,जब तक देश रहेगा मानवता जीवित रहेगी। लेकिन राजनीति में द्वेश धृणा, कटुता और छिन्न भिन्न का वातावरण नहीं होना चाहिए। आशा है दिल्ली में किसी की भी सरकार बने, एक आदर्श और पारदर्शी सरकार बने। जनमत को स्वीकार्य करते हुए "सर्वजन सुखाय सर्व जन हिताय"को लेकर आगे बढ़ें।


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