बोन मैरो ट्रांसप्लांट से थैलेसीमिया मरीजों को मिल सकती है नई जिंदगी

० आशा पटेल ० 
जयपुर। थैलेसीमिया एक गंभीर अनुवांशिक रक्त विकार है, लेकिन आधुनिक चिकित्सा तकनीकों और बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) की मदद से इसका स्थायी उपचार संभव हो चुका है। बीएमटी की वजह से आज के सयम में थैलेसीमिया से पीड़ित लोगों की जान भी बचाई जा रही है। यह जानकारी भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल के वरिष्ठ ब्लड कैंसर एवं बीएमटी विशेषज्ञ डॉ प्रकाश सिंह शेखावत ने दी।

 डॉ शेखावत ने बताया कि थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों को हर 15 से 20 दिन में रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। लंबे समय तक बार-बार रक्त चढ़ाने से शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे हृदय, लिवर, हार्मोन एवं ग्रोथ संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे मरीजों के लिए नियमित उपचार और विशेषज्ञ निगरानी अत्यंत आवश्यक होती है।

बोन मैरो ट्रांसप्लांट वर्तमान में थैलेसीमिया का सबसे प्रभावी और स्थायी उपचार माना जाता है। इस प्रक्रिया में मरीज के खराब बोन मैरो को स्वस्थ स्टेम सेल्स से बदला जाता है, जिससे शरीर सामान्य रूप से स्वस्थ रक्त बनाना शुरू कर देता है। उन्होंने कहा कि यदि मरीज को समय पर उपयुक्त डोनर मिल जाए, विशेष रूप से भाई-बहन में मैचिंग डोनर होने पर, तो बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सफलता दर काफी बेहतर होती है। 

अब हैप्लो-आइडेंटिकल ट्रांसप्लांट जैसी आधुनिक तकनीकों के कारण परिवार के अन्य सदस्यों से भी ट्रांसप्लांट संभव हो रहा है, जिससे अधिक मरीजों को उपचार का अवसर मिल पा रहा है। कम उम्र में किया गया बोन मैरो ट्रांसप्लांट बेहतर परिणाम देता है और इससे मरीज को भविष्य में बार-बार रक्त चढ़ाने और आयरन संबंधी दवाइयों की आवश्यकता से राहत मिल सकती है। सफल ट्रांसप्लांट के बाद बच्चे सामान्य शिक्षा, खेलकूद और दैनिक जीवन की गतिविधियां कर सकते हैं।

 राजस्थान सरकार की मां योजना और केन्द्र स्तर पर कॉल इंडिया प्रोग्राम के तहत थैलेसीमिया रोगी का निःशुल्क बीएमटी होता है। बीएमसीएच की बाल कैंसर एवं रक्त रोग विषेषज्ञ डॉ शिवानी माथुर ने बताया कि थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों में शुरुआती छह माह से एक साल के बीच ही खून की कमी होने लगती है। इसके प्रमुख लक्षणों में शरीर में अत्यधिक कमजोरी, चेहरा पीला पड़ना, बार-बार बुखार या संक्रमण होना, भूख कम लगना, 

वजन और लंबाई का सही तरीके से विकास नहीं होना, पेट का फूलना, सांस फूलना तथा बच्चे का जल्दी थक जाना शामिल हैं। बच्चों में बार-बार रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। डॉ माथुर ने बताया कि यदि बच्चे में यह लक्षण दिखाई दें तो तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेकर थैलेसीमिया की जांच करानी चाहिए। समय पर पहचान होने से उपचार बेहतर तरीके से संभव हो पाता है। बार-बार ब्लड चढ़ाने पर ऐलो इम्यूनाइजेशन का खतरा रहता है।

थैलेसीमिया की रोकथाम के लिए विवाह पूर्व और गर्भावस्था के दौरान थैलेसीमिया स्क्रीनिंग अत्यंत आवश्यक है। यदि दोनों माता-पिता थैलेसीमिया माइनर हों तो बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने का खतरा करीब 25 फीसदी रहता है। ऐसे में समय पर जांच और जेनेटिक काउंसलिंग से इस बीमारी को रोका जा सकता।

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