कविता, मिथक, विज्ञान और समकालीन आवाज़ों के साथ जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल 2026 का समापन


० आशा पटेल ० 
जयपुर : जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल 2026 का कविता, मांगा क़ॉमिक्स, मिथक, विज्ञान, इतिहास, चिकित्सा और समकालीन कथा साहित्य पर मनोरंजक और ज्ञानवद्धर्क चर्चाओं के नाम रहा। फ़ेस्टिवल ने एक बार फिर अपनी उस भूमिका को पूरी जिम्मेदारी से निभाया जो उसे न सिर्फ़ किताबों और विचारों का संगम कहती है, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा उत्सव भी बनाती है।
वेदांता द्वारा प्रस्तुत जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल 2026 के अंतिम दिन, ब्रिटिश कवयित्री एलिस ऑसवाल्ड ने सुबह के सत्र में दर्शकों को कविता और साहित्य के जादू से परिचित करवाया। ए जर्नी थ्रू वर्ड्स एंड वर्ल्ड्स नाम के सत्र की शुरुआत इंद्रधनुष की ग्रीक देवी आइरिस के आह्वान से हुई। ऑसवाल्ड की कविताएँ समय, जल, मृत्यु, स्मृति और मानवीय संबंध जैसे विषयों के बीच बहुत ख़ूबसूरत आवाजाही करती हैं।
अ शॉर्ट स्टोरी ऑफ़ फ़ॉलिंग और अ बैरिस्टर फ़ॉर द डॉन से पाठ शामिल थे, जहाँ ऑसवाल्ड ने कविता में दोहराव को एक बुनियादी तत्व के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने मेमोरियल से एक अंश भी प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने होमर की इलियड को अपने अंदाज में प्रस्तुत किया है और युद्ध में मारे गए साधारण सैनिकों के जीवन को केंद्र में रखा है।

दृश्यात्मक कहानी कहने की परंपरा और लोकप्रिय वैश्विक संस्कृति पर केंद्रित सत्र सेलिब्रेटिंग मांगा एंड ग्राफ़िक नॉवेल्स में, दुनिया की सबसे प्रभावशाली कॉमिक्स में से एक मांगा और ग्राफ़िक नॉवेल्स पर चर्चा हुई। जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल के 5वें दिन आयोजित इस सत्र में अ साइलेंट वॉइस की लेखिका योशितोकी ओइमा, उनकी अनुवादक तोमोको किकुची, और ज़ोरावर एंड द लॉस्ट गॉड्स के सह-लेखक उजान दत्ता और अबीर कपूर, राधिका झा के साथ बातचीत में शामिल हुए। 

ओइमा ने अपनी श्रृंखला अ साइलेंट वॉइस में बुलीइंग, दोस्ती और संवाद जैसे विषयों पर अपने रचनात्मक चुनावों पर विस्तार से बात की। सभी लेखकों ने कॉमिक्स में पाठ के साथ तस्वीरों की ताक़त पर चर्चा की। अबीर कपूर ने कहा कि मांगा में दृढ़ता, साहस, परिवार, दोस्ती जैसे विषयों को व्यक्त करने की प्रभावशाली क्षमता होती है, जिसे उपन्यास या फ़िल्म जैसी अन्य रचनात्मक विधाएँ उसी तरह व्यक्त नहीं कर पातीं।

मिथक और कल्पना ने द लीजेंड ऑफ़ कुमारीकंदम सत्र को आकार दिया, जहाँ आनंद नीलकंठन और मृदुला रमेश ने लुप्त सभ्यताओं, मिथकों की स्थाई शक्ति पर चर्चा करते हुए बताया कि किस तरह कहानी कहने की परंपरा सांस्कृतिक स्मृति और पहचान को लगातार गढ़ती रहती है। सत्र की शुरुआत आनंद नीलकंठन की पुस्तक ‘महिषासुर: द लीजेंड ऑफ़ कुमारीकंदम’ के एक आकर्षक वीडियो ट्रेलर से हुई, जो मिथक, साइंस फ़िक्शन और फ़ैंटेसी को सहजता से जोड़ता है।

 इस पुस्तक की प्रेरणा पर बात करते हुए नीलकंठन ने बताया कि उनके बच्चे केवल मार्वल की फ़ैंटेसी फ़िल्में देखते थे और भारतीय मिथकों को बहुत ज़्यादा भक्ति-आधारित मानते थे। वे भारतीय मिथकों को केवल धार्मिक दृष्टि से देखने की सोच को बदलना चाहते थे और भारतीय मिथकीय संसार में वैज्ञानिक सोच और तर्क को केंद्र में लाकर कुछ नया रचना चाहते थे।

लेजेंडा: द रियल वीमेन बिहाइंड द मिथ्स सत्र में इतिहासकार जनीना रामिरेज़ ने नारायणी बासु के साथ इतिहास और किंवदंतियों में महिलाओं की आवाज़ों को सामने लाने पर बातचीत की। इस संवाद में लंबे समय से चली आ रही धारणाओं को चुनौती दी गई और भुला दी गई कहानियों को ऐतिहासिक विमर्श के केंद्र में लाने की बात हुई। इसी सत्र में, इतिहासकार

और टेलीविज़न प्रस्तोता जनीना रामिरेज़ ने बताया कि कैसे सदियों से महिलाओं के जीवन को मिटाया गया, तोड़ा-मरोड़ा गया और मनचाहे रूप में ढाला गया। अपनी पुस्तक लेजेंडा के हवाले से रामिरेज़ ने बताया कि जोन ऑफ़ आर्क, लेडी गोडाइवा और रानी लक्ष्मीबाई जैसी शख़्सियतों को बार-बार राष्ट्रवादी और बड़े प्रचार तंत्रों के लिए इस्तेमाल किया गया, जिससे उनके जीवन की बारीकियों और मानवीय जटिलताओं के लिए बहुत कम जगह बची।

आज के समाज और पीढ़ियों के बीच बदलाव पर जेन ज़ी, द मिलेनियल्स एंड मम्मीजी सत्र में चर्चा हुई, जिसमें अनुराग माइनस वर्मा, संतोष देसाई और रिया चोपड़ा, चिराग ठक्कर के साथ संवाद में शामिल हुए। इस सत्र में भारत में बदलते पारिवारिक ढांचे, डिजिटल संस्कृति और सामाजिक मूल्यों में आ रहे बदलावों पर चर्चा की गई। सत्र में प्रेम, उपभोक्तावाद और क्रांति जैसे कई विषयों पर चर्चा हुई। इन सभी विषयों को जोड़ने वाला एक मुख्य विचार पहचान के निर्माण और उसके अभिव्यक्त होने का था, जो इंटरनेट के माध्यम से और उसके प्रभाव के कारण सामने आता है।

पुरस्कार-विजेता लेखिका रैचेल क्लार्क ने अंबरीश सात्विक के साथ अपनी पुस्तक द स्टोरी ऑफ़ अ हार्ट लिखने के अनुभव पर बातचीत की। यह किताब दो 9 साल के बच्चों के बीच हुए हार्ट ट्रांसप्लांट की एक असाधारण यात्रा की कहानी है। उन्होंने डोनर परिवार के साथ हुई बातचीत और उसके भावनात्मक असर के बारे में भी बताया। क्लार्क ने अंगदान से जुड़े अहम सामाजिक बदलावों की ज़रूरत पर अपने विचार साझा किए। वेदांता द्वारा प्रस्तुत जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल 2026 में जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा के विकल्पों पर एक और विचारोत्तेजक सत्र में प्रेम शंकर झा, अव्यन्ना मेहता और मृदुला रमेश ने बातचीत की। इस सत्र में सतत विकास, जलवायु और भारत के ऊर्जा पर चर्चा हुई, जिसने तात्कालिक वैश्विक मुद्दों पर संवाद के प्रति फ़ेस्टिवल की प्रतिबद्धता को और मज़बूत किया।

बहुप्रतीक्षित क्लोज़िंग डिबेट, फ़्रीडम ऑफ़ स्पीच इज़ अ डेंजरस आइडिया, में इयान हिस्लॉप, पवन वर्मा, एलिस ऑसवाल्ड, अनिश गावंडे, नवतेज सरना, प्रियंका चतुर्वेदी, नवदीप सूरी और फ़ारा डभोईवाला शामिल हुए। इस चर्चा का संचालन वीर सांघवी ने किया। बातचीत में इस सवाल पर विचार किया गया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जिसे आमतौर पर एक लोकतांत्रिक आदर्श माना जाता है, क्या असमान राजनीतिक परिस्थितियों में जटिल और जोखिमपूर्ण हो सकती है। संचालक वीर संघवी ने शुरुआत में कहा कि प्रस्ताव को बहुत चतुराई से गढ़ा गया है। उनके अनुसार असली सवाल यह नहीं है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरनाक है या नहीं, बल्कि यह है कि यह किसके लिए खतरनाक है।

प्रस्ताव के पक्ष में तर्क रखते हुए फ़ारा डभोईवाला ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सत्ता से गहराई से जुड़ी हुई है और अक्सर उन लोगों द्वारा हथियार की तरह इस्तेमाल की जाती है, जो पहले से ही सार्वजनिक विमर्श पर हावी हैं, जिससे हाशिये की आवाज़ें जोखिम में पड़ जाती हैं। इयान हिस्लॉप ने इन खतरों को स्वीकार करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हासिल करने के लिए किए गए ऐतिहासिक बलिदानों को रेखांकित किया। उन्होंने दुनिया भर में जेल में बंद या मारे गए पत्रकारों की बढ़ती संख्या की ओर ध्यान दिलाया और यह भी कहा कि विडंबना यह है कि पूर्ण स्वतंत्रता अक्सर सिर्फ़ ताक़तवर लोगों के लिए ही उपलब्ध दिखाई देती है।

प्रस्ताव के विरोध में पवन वर्मा ने बहस को नैतिक साहस के प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि असहमति को लगातार अपराध की तरह देखा जा रहा है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग समान रूप से नहीं हो रहा है। इस बहस ने समकालीन लोकतंत्रों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सत्ता के बीच मौजूद स्थायी विरोधाभास को उजागर किया।

जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल 2026 के 19वें संस्करण के अंतिम दिन ने फ़ेस्टिवल की स्थायी और समावेशी भावना को प्रस्तुत किया—जहाँ अलग-अलग विचारों, आवाज़ों और विषयों ने सीमाओं और पीढ़ियों से परे संवाद, जिज्ञासा और प्रेरणा को आगे बढ़ाया।

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